Sanskar

वट अमावस्या : जानिए, क्या है वट वृक्ष की महिमा ?                                               

भारत तीज-त्योहारों का देश है। हर वर्ष कई ऐसे छोटे बड़े त्यौहार आते हैं जो धर्म-ग्रंथों, पुराणों और हमारी भारतीय परमराओं से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक व्रत है वट अमावस्या, जो हर सौभाग्यवती स्त्री अपने विवाहित जीवन में प्रेम, पति के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए करती है। जिस प्रकार सिर्फ वट वृक्ष ही विशाल घना और फलता-फूलता है और कई सौ वर्ष की आयु तक जीवन पाता है, उसी प्रकार अपने जीवन की मंगल कामना के लिए हर विवाहिता स्त्री वट वृक्ष की पूजा करती है। हमारे भारत वर्ष में चार ऐसे सिद्ध वटवृक्ष हैं जो सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग के बाद इस कलयुग में भी श्रद्धा और आस्था का केंद्र बने हुए हैं। वटवृक्ष को आम भाषा में बड़ का पेड़ और बरगद का पेड़ भी कहा जाता है । इस वृक्ष की पूजा वट अमावस्या और वट पूर्णिमा पर विशेष रूप से की जाती है। वृक्ष की महिमा का वर्णन शिवमहापुराण, देवीपुराण, मत्स्यपुराण आदि ग्रंथों में मिलता है।

वटमूले स्थितो ब्रह्मा वटमध्ये जनार्दनः ।

वटाग्रे तु शिवो देवः सावित्री वटसंश्रिता ।।

माना जाता है कि वटवृक्ष के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु, अग्रभाग में शिव और सम्पूर्ण वृक्ष की शाखाओं में माता सावित्री वास करती हैं । साथ ही इस वृक्ष में पितरों का वास भी माना जाता है। वट अमावस 16 मई (शनिवार) को है ।

 

चार सिद्ध वटवृक्ष

 

वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श, परिक्रमा तथा सेवा से पाप दूर होते हैं तथा दुःख, समस्याएँ एवं रोग नष्ट होते हैं । वटवृक्ष रोपने से अशेष (अपार) पुण्य-संचय होता है । वैशाख आदि पुण्यमासों में इस वृक्ष की जड़ में जल देने से पापों का नाश होता है एवं नाना प्रकार की सुख-सम्पदा प्राप्त होती है । जैन धर्म में मान्यता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी। यह स्थान प्रयाग में ऋषभदेव तपस्थली के नामसे जाना जाता है। यूं तो हिंदू धर्म में सभी वट वृक्ष पूजनीय हैं किंतु भारत में कई ऐसे वट वृक्ष हैं जो अपनी प्राचीनता, पवित्रता और पौराणिक संदर्भों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । आइए इनके बारे में जानते हैं ।

 

प्रयागराज का अक्षय वट -

 

सबसे पहले बात करते हैं प्रयागराज के अक्षय वट की ।  भगवान राम ने अपने वनवास काल में प्रयागराज में मौजूद इस वृक्ष की छाया में रात बिताने की अनुमति मांगी थी। वटवृक्ष ने भगवान राम को अनुमति प्रदान की जिससे प्रसन्न होकर रघुबीर ने वट वृक्ष को अक्षय वट होने का वरदान दिया और कहा कि जो भी तुम्हारी छाया में क्षण मात्र भी समय बिताएगा उसे अक्षय पुण्य फल प्राप्त होगा । साथ ही माता सीता ने आर्शीवाद दिया कि मेरे सुहाग को आश्रय देने वाले, हे वट महाराज ! जो भी सुहागन स्त्री तुम्हारी पूजा और व्रत करे तुम उसके सुहाग की रक्षा करना और तब से यह वृक्ष इतिहास के पन्नों में भी अक्षय हो गया। आज भी इस वृक्ष के दर्शन-पूजन के लिए लोगों का तांता लगा रहता है ।

 

गया जी का वट वृक्ष -

 

दूसरा है बिहार में गया का वटवृक्ष । एक पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित बिहार के गया में फल्गु नदी के घाट पर अपने पिता दशरथ का श्राद्धकर्म करने पहुंचे थे । श्राद्ध कर्म के दौरान दोनों भाई श्राद्ध के लिए फल, फूल और कंदमूल इत्यादि लेने गए। इतने में राजा दशरथ के दोनों हाथ भूमि से प्रकट हुए और दोनों पुत्रों की अनुपस्थिति में ही देवी सीता को ही पिंडदान करने का निर्देश दिया। माता सीता ने अपने पति की अनुपस्थिति में ब्राह्मण, गाय, वटवृक्ष, केतकी के फूल और फल्गु नदी को साक्षी मानकर पिंडदान कर्म कर दिया। किंतु जब प्रभु राम वहां पहुंचे तो पूरी घटना कह सुनाई । इस पर प्रमाण माँगा गया तो माता सीता ने जिन्हें साक्षी बनाया था उनसे पूछा । सभी ने भगवान राम के डर से झूठ बोल दिया लेकिन वटवृक्ष ने सच बोलकर माता सीता की लाज रख ली। ऐसे में माता सीता ने उन चारों को श्राप दिया और वटवृक्ष को वरदान देते हुए कहा कि - हे वटवृक्ष ! तुमने आज मेरे पति व्रत धर्म की लाज रख ली, तुम्हारी ख्याति युगों तक जानी जाएगी। जिस तरह तुमने मेरी लाज बचाई है वैसे ही तुम्हारी पूजा करने वाली हर सुहागन स्त्री के सुहाग की रक्षा होगी और यहीं पर आज से अपने पूर्वजों की मुक्ति लिए पिंड दान आदि कर्म किए जाएंगे।  

 

वृंदावन का वंशीवट-

 

तीसरा है वृंदावन में वंशीवट । वृंदावन में कालिंदी यमुना के किनारे स्थित है वंशीवट। माना जाता है कि द्वापरयुग में श्रीकृष्ण अपने बालपल में यहीं खेला करते थे और गायों को चराते हुए विश्राम करते थे। इसी स्थान पर रास बिहारी ने तरह-तरह की लीलाएं कीं। इस वट का नाम वंशीवट इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी शाखाओं पर बैठकर श्रीकृष्ण बंसी बजाते थे। माना जाता है कि इस वटवृक्ष से आज भी कान लगाकर ध्यान से सुनने पर आपको ढोल, मृदंग और बंशी की आवाज सुनाई देती प्रतीत होती है। यहीं यमुना किनारे बृज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ कात्यायनी की अराधना की थी। इसलिए यह भी सुहाग का प्रतीक है।

 

उज्जैन का सिद्धवट-

चौथा है उज्जैन में स्थित सिद्धवट, जो पितरों के मोक्ष के साथ-साथ सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य भी देता है। ऐसा कहा जाता है कि इस वट वृक्ष को मां पार्वती ने अपने हाथों से लगाया था और इस वृक्ष के नीचे अपने पुत्र कार्तिकेय को अपने हाथों से भोजन भी कराया था। महिलाएं अपने पति और बच्चों के लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए इस पेड़ की पूजा करती हैं।  स्कन्दपुराण में ऐसा वर्णित है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पतिरूप में पाने के लिए कई सौ वर्ष तक इस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। माता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती माता को पत्नी रूप में स्वीकार किया । साथ ही यह वरदान भी दिया कि जो इस वटवृक्ष पर दूध चढ़ाएगा उसे मेरा आशीर्वाद मिलेगा और उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी ।  माता पार्वती ने भी वरदान दिया कि जो भी स्त्री इस वटवृक्ष की पूजा करेगी उसके जीवन में सौभाग्य की प्राप्ति होगी। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर के वध के लिए इसी वटवृक्ष के नीचे शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने भी घोर तप किया और फिर उन्हें यहीं पर देवताओं का सेनापति नियुक्त किया था । चूंकि यह वृक्ष माँ पार्वती और कार्तिकेय द्वारा सिद्ध होकर शक्तियों से परिपूर्ण हो गया था इसलिए इस वटवृक्ष को भगवान शिव ने सिद्धवट घोषित कर इसे युगों-युगो तक बने रहने का वरदान दिया। यहां दर्शन-पूजन से तीन तरह की सिद्धि प्राप्त होती हैं- संतति, संपत्ति और सद्गति।

ये सभी पेड़ आज तक यूँ ही बरक़रार हैं क्योंकि इनको अक्षय रहने का वरदान प्राप्त है। इसीलिए इन्हें ’अक्षयवट’ कहते हैं। वैसे तो हर लम्बा, घना और छायादार वटवृक्ष पूज्य है और साधारण से वट वृक्ष की आयु भी कई सौ साल की होती है। किंतु उपरोक्त वट वृक्षों की महिमा तो दुर्लभ है । यह देवी-देवताओं द्वारा पूजित तो हैं ही, सदा-सदा के लिए अमर होने का वरदान भी प्राप्त हैं।

 

:- रमन शर्मा

Related News

वट अमावस्या : जानिए, क्या है वट वृक्ष की महिमा ?                                               

भारत तीज-त्योहारों का देश है। हर वर्ष कई ऐसे छोटे बड़े त्यौहार आते हैं जो धर्म-ग्रंथों, पुराणों और हमारी भारतीय परमराओं से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक व्रत है वट अमावस्या, जो हर सौभाग्यवती स्त्री अपने विवाहित जीवन में प्रेम, पति के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए करती है। जिस प्रकार सिर्फ वट वृक्ष ही विशाल घना और फलता-फूलता है और कई सौ वर्ष की आयु तक जीवन पाता है, उसी प्रकार अपने जीवन की मंगल कामना के लिए हर विवाहिता स्त्री वट वृक्ष की पूजा करती है। हमारे भारत वर्ष में चार ऐसे सिद्ध वटवृक्ष हैं जो सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग के बाद इस कलयुग में भी श्रद्धा और आस्था का केंद्र बने हुए हैं। वटवृक्ष को आम भाषा में बड़ का पेड़ और बरगद का पेड़ भी कहा जाता है । इस वृक्ष की पूजा वट अमावस्या और वट पूर्णिमा पर विशेष रूप से की जाती है। वृक्ष की महिमा का वर्णन शिवमहापुराण, देवीपुराण, मत्स्यपुराण आदि ग्रंथों में मिलता है।

वटमूले स्थितो ब्रह्मा वटमध्ये जनार्दनः ।

वटाग्रे तु शिवो देवः सावित्री वटसंश्रिता ।।

माना जाता है कि वटवृक्ष के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु, अग्रभाग में शिव और सम्पूर्ण वृक्ष की शाखाओं में माता सावित्री वास करती हैं । साथ ही इस वृक्ष में पितरों का वास भी माना जाता है। वट अमावस 16 मई (शनिवार) को है ।

 

चार सिद्ध वटवृक्ष

 

वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श, परिक्रमा तथा सेवा से पाप दूर होते हैं तथा दुःख, समस्याएँ एवं रोग नष्ट होते हैं । वटवृक्ष रोपने से अशेष (अपार) पुण्य-संचय होता है । वैशाख आदि पुण्यमासों में इस वृक्ष की जड़ में जल देने से पापों का नाश होता है एवं नाना प्रकार की सुख-सम्पदा प्राप्त होती है । जैन धर्म में मान्यता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी। यह स्थान प्रयाग में ऋषभदेव तपस्थली के नामसे जाना जाता है। यूं तो हिंदू धर्म में सभी वट वृक्ष पूजनीय हैं किंतु भारत में कई ऐसे वट वृक्ष हैं जो अपनी प्राचीनता, पवित्रता और पौराणिक संदर्भों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । आइए इनके बारे में जानते हैं ।

 

प्रयागराज का अक्षय वट -

 

सबसे पहले बात करते हैं प्रयागराज के अक्षय वट की ।  भगवान राम ने अपने वनवास काल में प्रयागराज में मौजूद इस वृक्ष की छाया में रात बिताने की अनुमति मांगी थी। वटवृक्ष ने भगवान राम को अनुमति प्रदान की जिससे प्रसन्न होकर रघुबीर ने वट वृक्ष को अक्षय वट होने का वरदान दिया और कहा कि जो भी तुम्हारी छाया में क्षण मात्र भी समय बिताएगा उसे अक्षय पुण्य फल प्राप्त होगा । साथ ही माता सीता ने आर्शीवाद दिया कि मेरे सुहाग को आश्रय देने वाले, हे वट महाराज ! जो भी सुहागन स्त्री तुम्हारी पूजा और व्रत करे तुम उसके सुहाग की रक्षा करना और तब से यह वृक्ष इतिहास के पन्नों में भी अक्षय हो गया। आज भी इस वृक्ष के दर्शन-पूजन के लिए लोगों का तांता लगा रहता है ।

 

गया जी का वट वृक्ष -

 

दूसरा है बिहार में गया का वटवृक्ष । एक पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित बिहार के गया में फल्गु नदी के घाट पर अपने पिता दशरथ का श्राद्धकर्म करने पहुंचे थे । श्राद्ध कर्म के दौरान दोनों भाई श्राद्ध के लिए फल, फूल और कंदमूल इत्यादि लेने गए। इतने में राजा दशरथ के दोनों हाथ भूमि से प्रकट हुए और दोनों पुत्रों की अनुपस्थिति में ही देवी सीता को ही पिंडदान करने का निर्देश दिया। माता सीता ने अपने पति की अनुपस्थिति में ब्राह्मण, गाय, वटवृक्ष, केतकी के फूल और फल्गु नदी को साक्षी मानकर पिंडदान कर्म कर दिया। किंतु जब प्रभु राम वहां पहुंचे तो पूरी घटना कह सुनाई । इस पर प्रमाण माँगा गया तो माता सीता ने जिन्हें साक्षी बनाया था उनसे पूछा । सभी ने भगवान राम के डर से झूठ बोल दिया लेकिन वटवृक्ष ने सच बोलकर माता सीता की लाज रख ली। ऐसे में माता सीता ने उन चारों को श्राप दिया और वटवृक्ष को वरदान देते हुए कहा कि - हे वटवृक्ष ! तुमने आज मेरे पति व्रत धर्म की लाज रख ली, तुम्हारी ख्याति युगों तक जानी जाएगी। जिस तरह तुमने मेरी लाज बचाई है वैसे ही तुम्हारी पूजा करने वाली हर सुहागन स्त्री के सुहाग की रक्षा होगी और यहीं पर आज से अपने पूर्वजों की मुक्ति लिए पिंड दान आदि कर्म किए जाएंगे।  

 

वृंदावन का वंशीवट-

 

तीसरा है वृंदावन में वंशीवट । वृंदावन में कालिंदी यमुना के किनारे स्थित है वंशीवट। माना जाता है कि द्वापरयुग में श्रीकृष्ण अपने बालपल में यहीं खेला करते थे और गायों को चराते हुए विश्राम करते थे। इसी स्थान पर रास बिहारी ने तरह-तरह की लीलाएं कीं। इस वट का नाम वंशीवट इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी शाखाओं पर बैठकर श्रीकृष्ण बंसी बजाते थे। माना जाता है कि इस वटवृक्ष से आज भी कान लगाकर ध्यान से सुनने पर आपको ढोल, मृदंग और बंशी की आवाज सुनाई देती प्रतीत होती है। यहीं यमुना किनारे बृज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ कात्यायनी की अराधना की थी। इसलिए यह भी सुहाग का प्रतीक है।

 

उज्जैन का सिद्धवट-

चौथा है उज्जैन में स्थित सिद्धवट, जो पितरों के मोक्ष के साथ-साथ सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य भी देता है। ऐसा कहा जाता है कि इस वट वृक्ष को मां पार्वती ने अपने हाथों से लगाया था और इस वृक्ष के नीचे अपने पुत्र कार्तिकेय को अपने हाथों से भोजन भी कराया था। महिलाएं अपने पति और बच्चों के लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए इस पेड़ की पूजा करती हैं।  स्कन्दपुराण में ऐसा वर्णित है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पतिरूप में पाने के लिए कई सौ वर्ष तक इस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। माता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती माता को पत्नी रूप में स्वीकार किया । साथ ही यह वरदान भी दिया कि जो इस वटवृक्ष पर दूध चढ़ाएगा उसे मेरा आशीर्वाद मिलेगा और उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी ।  माता पार्वती ने भी वरदान दिया कि जो भी स्त्री इस वटवृक्ष की पूजा करेगी उसके जीवन में सौभाग्य की प्राप्ति होगी। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर के वध के लिए इसी वटवृक्ष के नीचे शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने भी घोर तप किया और फिर उन्हें यहीं पर देवताओं का सेनापति नियुक्त किया था । चूंकि यह वृक्ष माँ पार्वती और कार्तिकेय द्वारा सिद्ध होकर शक्तियों से परिपूर्ण हो गया था इसलिए इस वटवृक्ष को भगवान शिव ने सिद्धवट घोषित कर इसे युगों-युगो तक बने रहने का वरदान दिया। यहां दर्शन-पूजन से तीन तरह की सिद्धि प्राप्त होती हैं- संतति, संपत्ति और सद्गति।

ये सभी पेड़ आज तक यूँ ही बरक़रार हैं क्योंकि इनको अक्षय रहने का वरदान प्राप्त है। इसीलिए इन्हें ’अक्षयवट’ कहते हैं। वैसे तो हर लम्बा, घना और छायादार वटवृक्ष पूज्य है और साधारण से वट वृक्ष की आयु भी कई सौ साल की होती है। किंतु उपरोक्त वट वृक्षों की महिमा तो दुर्लभ है । यह देवी-देवताओं द्वारा पूजित तो हैं ही, सदा-सदा के लिए अमर होने का वरदान भी प्राप्त हैं।

 

:- रमन शर्मा