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25 मई को गंगा दशहरा, जानिये स्वर्ग से धरती पर आने की कथा

सनातन धर्म में हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा पर्व एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी अवसर माना जाता है। इस बार यह पर्व 25 मई, सोमवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

 

सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल एक नदी नहीं, बल्कि “मां” का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के पाप और दोष दूर हो जाते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण गंगा को “पापमोचिनी” और “मोक्षदायिनी” कहा जाता है।

 

क्यों मनाते हैं गंगा दशहरा ?

 

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार “दशहरा” शब्द का अर्थ है - दस प्रकार के पापों का नाश करने वाला। मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान, पूजा-पाठ और दान का विशेष महत्व माना गया है।

 

क्या कहती हैं पौराणिक कथा ?

 

गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। माना जाता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।

 

कथानुसार इक्ष्वाकु वंश के महान शासक राजा सगर ने अपनी शक्ति और अधिकार सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। परन्तु स्वर्ग के राजा इंद्र को ईर्ष्या हुई और उन्होंने बलि के घोड़े को चुराकर ऋषि कपिल के आश्रम में छिपा दिया।

 

सागर के 60,000 पुत्रों ने हर जगह खोज की और अंत में कपिल के आश्रम में घोड़ा पाया। यह सोचकर कि ऋषि ने घोड़ा चुरा लिया है, उन्होंने उनकी गहन ध्यान साधना में खलल डाला। उनके इस कृत्य से क्रोधित होकर कपिल ने एक ही दृष्टिपात से उन सभी को जलाकर राख कर दिया। उन्होंने उनकी आत्माओं को यह श्राप भी दिया कि तब तक उन्हें शांति नहीं मिलेगी, जब तक कि गंगा नदी का पवित्र जल उनकी राख पर न गिर जाए। इसके लिए राजा सगर ने तपस्या शुरू की किंतु बीच में ही उनकी मृत्यु हो गई ।

 

इसके बाद उनके पोते अंशुमान और फिर अंशुमान के बेटे दिलीप ने भी भारी तप किया लेकिन ब्रह्मा जी नहीं रीझे । इसके बाद दिलीप के पुत्र राजा भागीरथ अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की और उनसे स्वर्ग से गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने का अनुरोध किया । विष्णु जी के पैरों के नखों से निकली गंगा ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं । उधर, तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने प्रार्थना स्वीकार कर ली, परन्तु चेतावनी दी कि गंगा की प्रचंड शक्ति पृथ्वी को नष्ट कर सकती है। केवल भगवान शिव ही उसके शक्तिशाली वेग को नियंत्रित कर सकते हैं। भागीरथ ने अत्यंत श्रद्धा से भगवान शिव से प्रार्थना की। उनकी भक्ति से द्रवित होकर, शिव ने सहायता करने का वचन दिया।

 

जब गंगा अंततः स्वर्ग से प्रवाहित हुईं तो शिव जी ने उनका प्रवाह नियंत्रित करने के लिए अपनी घनी जटाओं में थाम लिया और धीरे-धीरे मुक्त किया । जिस स्थान पर गंगा ने पृथ्वी को स्पर्श किया, वह आज गंगोत्री के नाम से जाना जाता है।

 

इसके बाद भागीरथ गंगा नदी को अपने पूर्वजों की अस्थियों के पास ले गए। पवित्र जल के स्पर्श मात्र से ही उनकी आत्माएं मुक्त हो गईं और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ । तभी से इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। उस दिन से गंगा नदी पवित्रता का स्रोत बन गई और जो भी इसके जल में स्नान करता है, उसे आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

गंगा दशहरा पर स्नान-दान का महत्व

 

गंगा दशहरा का पर्व पूरे भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है, लेकिन गंगा नदी के तटों पर इसका विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज, गंगोत्री, ऋषिकेश और अन्य स्थानों पर लाखों श्रद्धालु स्नान-ध्यान, पूजा और दान के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा नदी या किसी पवित्र जलाशय में स्नान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जल, अन्न, फल, वस्त्र और पूजा सामग्री का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल प्रदान करता है।

 

:- लता रानी 

 

 

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सनातन धर्म में हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा पर्व एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी अवसर माना जाता है। इस बार यह पर्व 25 मई, सोमवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

 

सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल एक नदी नहीं, बल्कि “मां” का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के पाप और दोष दूर हो जाते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण गंगा को “पापमोचिनी” और “मोक्षदायिनी” कहा जाता है।

 

क्यों मनाते हैं गंगा दशहरा ?

 

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार “दशहरा” शब्द का अर्थ है - दस प्रकार के पापों का नाश करने वाला। मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान, पूजा-पाठ और दान का विशेष महत्व माना गया है।

 

क्या कहती हैं पौराणिक कथा ?

 

गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। माना जाता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।

 

कथानुसार इक्ष्वाकु वंश के महान शासक राजा सगर ने अपनी शक्ति और अधिकार सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। परन्तु स्वर्ग के राजा इंद्र को ईर्ष्या हुई और उन्होंने बलि के घोड़े को चुराकर ऋषि कपिल के आश्रम में छिपा दिया।

 

सागर के 60,000 पुत्रों ने हर जगह खोज की और अंत में कपिल के आश्रम में घोड़ा पाया। यह सोचकर कि ऋषि ने घोड़ा चुरा लिया है, उन्होंने उनकी गहन ध्यान साधना में खलल डाला। उनके इस कृत्य से क्रोधित होकर कपिल ने एक ही दृष्टिपात से उन सभी को जलाकर राख कर दिया। उन्होंने उनकी आत्माओं को यह श्राप भी दिया कि तब तक उन्हें शांति नहीं मिलेगी, जब तक कि गंगा नदी का पवित्र जल उनकी राख पर न गिर जाए। इसके लिए राजा सगर ने तपस्या शुरू की किंतु बीच में ही उनकी मृत्यु हो गई ।

 

इसके बाद उनके पोते अंशुमान और फिर अंशुमान के बेटे दिलीप ने भी भारी तप किया लेकिन ब्रह्मा जी नहीं रीझे । इसके बाद दिलीप के पुत्र राजा भागीरथ अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की और उनसे स्वर्ग से गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने का अनुरोध किया । विष्णु जी के पैरों के नखों से निकली गंगा ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं । उधर, तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने प्रार्थना स्वीकार कर ली, परन्तु चेतावनी दी कि गंगा की प्रचंड शक्ति पृथ्वी को नष्ट कर सकती है। केवल भगवान शिव ही उसके शक्तिशाली वेग को नियंत्रित कर सकते हैं। भागीरथ ने अत्यंत श्रद्धा से भगवान शिव से प्रार्थना की। उनकी भक्ति से द्रवित होकर, शिव ने सहायता करने का वचन दिया।

 

जब गंगा अंततः स्वर्ग से प्रवाहित हुईं तो शिव जी ने उनका प्रवाह नियंत्रित करने के लिए अपनी घनी जटाओं में थाम लिया और धीरे-धीरे मुक्त किया । जिस स्थान पर गंगा ने पृथ्वी को स्पर्श किया, वह आज गंगोत्री के नाम से जाना जाता है।

 

इसके बाद भागीरथ गंगा नदी को अपने पूर्वजों की अस्थियों के पास ले गए। पवित्र जल के स्पर्श मात्र से ही उनकी आत्माएं मुक्त हो गईं और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ । तभी से इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। उस दिन से गंगा नदी पवित्रता का स्रोत बन गई और जो भी इसके जल में स्नान करता है, उसे आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

गंगा दशहरा पर स्नान-दान का महत्व

 

गंगा दशहरा का पर्व पूरे भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है, लेकिन गंगा नदी के तटों पर इसका विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज, गंगोत्री, ऋषिकेश और अन्य स्थानों पर लाखों श्रद्धालु स्नान-ध्यान, पूजा और दान के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा नदी या किसी पवित्र जलाशय में स्नान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जल, अन्न, फल, वस्त्र और पूजा सामग्री का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल प्रदान करता है।

 

:- लता रानी