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हिंदू धर्म में प्रकृति को ईश्वर का साक्षात स्वरूप माना गया है और इसे पूजनीय स्थान प्राप्त है। पंचतत्वों में शामिक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को पंचमहाभूत कहा जाता है और इन्हें ईश्वरीय माना जाता है। इसी तरह वृक्ष सेवा और जीव पूजा के रूप में वट, पीपल, और तुलसी जैसे पौधों और गाय, सर्प व हाथी जैसे जीवों को धार्मिक महत्व देकर संरक्षित किया जाता है। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है कि "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" अर्थात पृथ्वी माता है और हम उसकी संतान हैं।
इसी तरह बौद्ध धर्म मानता है कि सभी जीव-जंतु और मनुष्य परस्पर जुड़े हुए हैं। भगवान बुद्ध का जीवन प्रकृति से जुड़ा था (जैसे बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति)। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना कर्म के सिद्धांत के अनुसार अनुचित माना गया है। वहीं जैन धर्म में 'अहिंसा परमो धर्मः' का सिद्धांत किसी भी जीव को चोट न पहुँचाने की शिक्षा देता है, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका है । गुरु ग्रंथ साहिब में 'पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु' (हवा गुरु है, पानी पिता है और धरती माता है) के माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के अटूट रिश्ते को दर्शाया गया है। धार्मिक आस्था के कारण लोग सदियों से अनजाने में ही पर्यावरण का संरक्षण करते आ रहे हैं। पवित्र उपवन और पवित्र नदियों में कचरा न डालना और त्योहारों पर प्रकृति की पूजा इसी का हिस्सा हैं।
यूं तो इस अवसर पर पूरे देश में पौधरोपण और प्रकृति संरक्षण को समर्पित कई अभियान चलाए जाते हैं लेकिन उत्तराखंड के मसूरी में आर्यम इंटरनेशनल फाउंडेशन का अभियान विशेष रूप से उल्लेखनीय है । प्रो. पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी की अगुवाई में फ़ाउंडेशन के तत्त्वावधान में संचालित भगवान शंकर आश्रम द्वारा आनंद वाटिका प्रकल्प के अंतर्गत हस्त अहोरात्र नक्षत्र की दशमी तिथि गंगा दशहरा और विश्व पर्यावरण दिवस के शुभ अवसर पर 'मेरा पौधा, मेरा जीवन, मेरे संग' अभियान चलाया जाता है जिसके तहत अब तक लाखों वृक्ष लगाए जा चुके हैं । आर्यम जी महाराज को उनके पर्यावरण और प्रकृति प्रेम को देखते हुए ‘ग्रीन गुरु’ के रूप में जाना जाता है।
फाउंडेशन द्वारा पिछल 10 साल से जारी इस अभियान का उद्देश्य है - बढ़ती गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग के बीच केवल वृक्षारोपण ही हमारे और पृथ्वी के स्वास्थ को संतुलित रख सकते हैं। बाढ़, सूखा, प्रदूषण और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की वजह वृक्षों की कटाई ही है। आर्यम जी कहते हैं कि जो व्यक्ति पेड़-पौधों के संग साथ है, उनकी सेवा में रत है और प्रकृति में ईश्वरीय ऊर्जा की झलक देखता है वो दीर्घजीवी ही नहीं बल्कि सचेत मनुष्य के रूप में स्थापित होता है। इस तरह पौधरोपण सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि समूची पृथ्वी और प्रकृति के संरक्षण से जुड़ा संकल्प है।

