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27 मई को पद्मिनी एकादशी: अधिक मास की सबसे पुण्यदायी एकादशी का महत्व जानिए

सनातन धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है । अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। है। इस साल पद्मिनी एकादशी 27 मई को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसका व्रत करने से मनुष्य को मोक्ष, यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

 

अधिक मास को मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन अधिक मास आने पर इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास में आने वाली दो विशेष एकादशियों को पद्मिनी एकादशी और परमा एकादशी कहा जाता है।

 

क्या है पद्मिनी एकादशी की कथा?

 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीहरि से पूछा कि अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी व्रत विधि क्या है। तब भगवान विष्णु ने कहा कि अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी “पद्मिनी एकादशी” कहलाती है। श्रीविष्णु ने बताया कि “त्रेतायुग में हैहय वंश के कृतवीर्य नामक राजा महिष्मतीपुरी में राज्य करते थे। उनकी एक हजार रानियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राजपाट को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि के माध्यम से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब निष्फल रहा।

 

अंततः राजा ने कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया। उनकी प्रिय रानी जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, वो भी राजा के साथ वन में चली गईं। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए। दोनों ने गंधमादन पर्वत पर 10 हजार वर्षों तक तपस्या की, लेकिन फिर भी उन्हें पुत्र प्राप्त नहीं हुआ।

 

इसके बाद रानी पद्मिनी ने सती अनुसूया के सामने अपना दुख प्रकट किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। तब सती अनुसूया ने कहा कि वर्ष के 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे।

 

रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍तीं। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए, जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। तीनों लोकों में भगवान के सिवाय उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था।

 

सो हे धर्मराज! जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं।“ धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीनारायण को पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा और महत्व सुनाने हेतु आभार ज्ञापित किया।

 

क्या है पद्मिनी एकादशी व्रत की विधि?

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पद्मिनी एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से की जाती है। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना जाता है।

 

एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। स्नान में तिल, कुशा, आंवला और पवित्र मिट्टी का प्रयोग शुभ माना गया है। इसके बाद श्वेत वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और रात्रि में भजन-कीर्तन तथा जागरण करते हैं।

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने वाला व्यक्ति यश, कीर्ति और वैकुंठ धाम की प्राप्ति करता है। भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि “जो श्रद्धालु पद्मिनी एकादशी की कथा को सुनते या पढ़ते हैं, उन्हें भी पुण्य फल प्राप्त होता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।“

 

:- लता रानी

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27 मई को पद्मिनी एकादशी: अधिक मास की सबसे पुण्यदायी एकादशी का महत्व जानिए

सनातन धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है । अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। है। इस साल पद्मिनी एकादशी 27 मई को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसका व्रत करने से मनुष्य को मोक्ष, यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

 

अधिक मास को मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन अधिक मास आने पर इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास में आने वाली दो विशेष एकादशियों को पद्मिनी एकादशी और परमा एकादशी कहा जाता है।

 

क्या है पद्मिनी एकादशी की कथा?

 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीहरि से पूछा कि अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी व्रत विधि क्या है। तब भगवान विष्णु ने कहा कि अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी “पद्मिनी एकादशी” कहलाती है। श्रीविष्णु ने बताया कि “त्रेतायुग में हैहय वंश के कृतवीर्य नामक राजा महिष्मतीपुरी में राज्य करते थे। उनकी एक हजार रानियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राजपाट को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि के माध्यम से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब निष्फल रहा।

 

अंततः राजा ने कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया। उनकी प्रिय रानी जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, वो भी राजा के साथ वन में चली गईं। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए। दोनों ने गंधमादन पर्वत पर 10 हजार वर्षों तक तपस्या की, लेकिन फिर भी उन्हें पुत्र प्राप्त नहीं हुआ।

 

इसके बाद रानी पद्मिनी ने सती अनुसूया के सामने अपना दुख प्रकट किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। तब सती अनुसूया ने कहा कि वर्ष के 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे।

 

रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍तीं। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए, जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। तीनों लोकों में भगवान के सिवाय उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था।

 

सो हे धर्मराज! जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं।“ धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीनारायण को पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा और महत्व सुनाने हेतु आभार ज्ञापित किया।

 

क्या है पद्मिनी एकादशी व्रत की विधि?

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पद्मिनी एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से की जाती है। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना जाता है।

 

एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। स्नान में तिल, कुशा, आंवला और पवित्र मिट्टी का प्रयोग शुभ माना गया है। इसके बाद श्वेत वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और रात्रि में भजन-कीर्तन तथा जागरण करते हैं।

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने वाला व्यक्ति यश, कीर्ति और वैकुंठ धाम की प्राप्ति करता है। भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि “जो श्रद्धालु पद्मिनी एकादशी की कथा को सुनते या पढ़ते हैं, उन्हें भी पुण्य फल प्राप्त होता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।“

 

:- लता रानी