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छत्तीसगढ़: चंडी देवी मंदिर में मनुष्य और प्रकृति एक साथ होती हैं नतमस्तक

छत्तीसगढ़ में माँ चंडी का ऐसा मंदिर स्थित है जो अपनी अद्भुत मान्यताओं और अनोखी घटनाओं के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।  यहां चंडी देवी की स्वयंभू महाप्रतिमा विराजमान है और यहां प्रसाद ग्रहण करने भालुओं का पूरा परिवार आता है।

 

कहां स्थित है यह मंदिर?

 

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से लगभग 40 किलोमीटर दक्षिण दिशा में विकासखंड बागबाहरा के घूंचापाली गांव में स्थित है माँ चंडी देवी का प्रसिद्ध मंदिर।

 

क्या है मंदिर की विशेषता ?

 

पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर अपनी दिव्य महाप्रतिमा और अनोखी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। यहां विराजमान माता की स्वयंभू प्रतिमा लगभग 23.5 फुट ऊंची है। साथ ही माँ यहां दक्षिणमुखी रूप में विराजमान हैं। शांत जंगलों और प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह धाम श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

 

यहां माता की महिलाएं और पुरुष पूजा-अर्चना करते हैं। अनोखी बात यह है कि इस पूजा-अर्चना में भालुओं का पूरा परिवार भी शामिल होता है और यह किसी विशेष अवसर पर नहीं, बल्कि चंडी देवी मंदिर में प्रतिदिन होने वाली एक अद्भुत घटना है।

 

यहां भक्ति और प्रकृति के संगम को देखकर आस्था की ऐसी लहर उमड़ती है, जिसमें भौतिक और सांसारिक समस्याएं मानो बह जाती हैं। इस मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।

 

वर्षों से माता के मंदिर में शाम ढलते ही इन विशेष भक्तों का आगमन शुरू हो जाता है। हर शाम आरती के समय भालुओं का पूरा परिवार माता के दर्शन करने पहुंचता है। वे माता का प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर बिना किसी को नुकसान पहुंचाए शांतिपूर्वक जंगल की ओर लौट जाते हैं।

 

जब भालुओं का परिवार मंदिर पहुंचता है, तो उनमें से एक भालू मंदिर के बाहर खड़ा रहता है, जबकि बाकी भालू मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मंदिर में आने वाले ये भालू श्रद्धालुओं के साथ बेहद शांत और मित्रवत व्यवहार करते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि भालू कभी भी हिंसक नहीं होते और आज तक उन्होंने किसी श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया। हालांकि कभी-कभी वे अपनी नाराजगी जरूर जताते हैं, लेकिन किसी को परेशान नहीं करते। गांववालों ने इन भालुओं को “जामवंत परिवार” नाम दिया है।

 

यहां प्रतिवर्ष चैत्र एवं क्वार मास की नवरात्रि में विशाल मेला लगता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्योत प्रज्वलित करने और माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

क्या है मंदिर का इतिहास?

 

गांववालों के अनुसार, चंडी माता का यह मंदिर पहले तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध था। यहां कई साधु-संतों का डेरा हुआ करता था। तंत्र साधना करने वाले साधकों ने इस स्थान को लंबे समय तक गुप्त रखा था, लेकिन वर्ष 1950-51 में इसे आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव का भी प्रतीक है।

 

श्रद्धालुओं की भावनाएं

 

माँ चंडी देवी के इस दिव्य धाम में पहुंचकर श्रद्धालु अद्भुत शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं । जब आरती के समय भालुओं का परिवार माता के दरबार में शांत भाव से उपस्थित होकर प्रसाद ग्रहण करता है, तब यह दृश्य भक्तों के मन में गहरी श्रद्धा और आश्चर्य भर देता है। मानो स्वयं प्रकृति भी माँ चंडी के चरणों में नतमस्तक होकर यह संदेश दे रही हो कि ईश्वर की भक्ति में हर जीव समान है।

 

:- लता रानी

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छत्तीसगढ़: चंडी देवी मंदिर में मनुष्य और प्रकृति एक साथ होती हैं नतमस्तक

छत्तीसगढ़ में माँ चंडी का ऐसा मंदिर स्थित है जो अपनी अद्भुत मान्यताओं और अनोखी घटनाओं के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।  यहां चंडी देवी की स्वयंभू महाप्रतिमा विराजमान है और यहां प्रसाद ग्रहण करने भालुओं का पूरा परिवार आता है।

 

कहां स्थित है यह मंदिर?

 

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से लगभग 40 किलोमीटर दक्षिण दिशा में विकासखंड बागबाहरा के घूंचापाली गांव में स्थित है माँ चंडी देवी का प्रसिद्ध मंदिर।

 

क्या है मंदिर की विशेषता ?

 

पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर अपनी दिव्य महाप्रतिमा और अनोखी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। यहां विराजमान माता की स्वयंभू प्रतिमा लगभग 23.5 फुट ऊंची है। साथ ही माँ यहां दक्षिणमुखी रूप में विराजमान हैं। शांत जंगलों और प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह धाम श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

 

यहां माता की महिलाएं और पुरुष पूजा-अर्चना करते हैं। अनोखी बात यह है कि इस पूजा-अर्चना में भालुओं का पूरा परिवार भी शामिल होता है और यह किसी विशेष अवसर पर नहीं, बल्कि चंडी देवी मंदिर में प्रतिदिन होने वाली एक अद्भुत घटना है।

 

यहां भक्ति और प्रकृति के संगम को देखकर आस्था की ऐसी लहर उमड़ती है, जिसमें भौतिक और सांसारिक समस्याएं मानो बह जाती हैं। इस मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।

 

वर्षों से माता के मंदिर में शाम ढलते ही इन विशेष भक्तों का आगमन शुरू हो जाता है। हर शाम आरती के समय भालुओं का पूरा परिवार माता के दर्शन करने पहुंचता है। वे माता का प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर बिना किसी को नुकसान पहुंचाए शांतिपूर्वक जंगल की ओर लौट जाते हैं।

 

जब भालुओं का परिवार मंदिर पहुंचता है, तो उनमें से एक भालू मंदिर के बाहर खड़ा रहता है, जबकि बाकी भालू मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मंदिर में आने वाले ये भालू श्रद्धालुओं के साथ बेहद शांत और मित्रवत व्यवहार करते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि भालू कभी भी हिंसक नहीं होते और आज तक उन्होंने किसी श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया। हालांकि कभी-कभी वे अपनी नाराजगी जरूर जताते हैं, लेकिन किसी को परेशान नहीं करते। गांववालों ने इन भालुओं को “जामवंत परिवार” नाम दिया है।

 

यहां प्रतिवर्ष चैत्र एवं क्वार मास की नवरात्रि में विशाल मेला लगता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्योत प्रज्वलित करने और माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

क्या है मंदिर का इतिहास?

 

गांववालों के अनुसार, चंडी माता का यह मंदिर पहले तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध था। यहां कई साधु-संतों का डेरा हुआ करता था। तंत्र साधना करने वाले साधकों ने इस स्थान को लंबे समय तक गुप्त रखा था, लेकिन वर्ष 1950-51 में इसे आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव का भी प्रतीक है।

 

श्रद्धालुओं की भावनाएं

 

माँ चंडी देवी के इस दिव्य धाम में पहुंचकर श्रद्धालु अद्भुत शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं । जब आरती के समय भालुओं का परिवार माता के दरबार में शांत भाव से उपस्थित होकर प्रसाद ग्रहण करता है, तब यह दृश्य भक्तों के मन में गहरी श्रद्धा और आश्चर्य भर देता है। मानो स्वयं प्रकृति भी माँ चंडी के चरणों में नतमस्तक होकर यह संदेश दे रही हो कि ईश्वर की भक्ति में हर जीव समान है।

 

:- लता रानी