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श्री स्तम्भेश्वर महादेव - जहां समुद्र द्वारा स्वयं होता है महादेव का अभिषेक

भारत एक ऐसा देश है जहां आस्था और चमत्कारों की कहानियां सदियों से लोगों को आकर्षित करती आई हैं। यहां के मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना के स्थान नहीं, बल्कि रहस्यों और अनोखी घटनाओं के केंद्र भी माने जाते हैं। कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी घटनाएं आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं और जिनके रहस्यों को विज्ञान भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है।

 

इन्हीं रहस्यमयी स्थलों में एक है स्तंभेश्वर महादेव मंदिर, जो अपने अनोखे और चौंकाने वाले चमत्कार के लिए जाना जाता है, यह मंदिर हर दिन कुछ समय के लिए गायब हो जाता है। यही वजह है कि यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए गहरी आस्था और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

 

यह पवित्र स्थल गुजरात के भरूच जिले के जंबुसर तहसील में कावी-कंबोई समुद्र तट पर स्थित है। वडोदरा से लगभग 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगवान शिव का यह अनोखा मंदिर समुद्र के किनारे होने के कारण अपने आप में बेहद खास है।

 

मंदिर का इतिहास

 

हिंदू धर्म के अठारह पुराणों में एक कथा मिलती है, जिसमें कार्तिकेय और तारकासुर का उल्लेख है। जब देवताओं ने तारकासुर के वध के बाद कार्तिकेय की प्रशंसा की, तो वे स्वयं इस कार्य से दुखी हो गए। उन्होंने कहा, “मुझे इस बात का खेद है कि मैंने तारकासुर का वध किया, क्योंकि वह भगवान शिव का सच्चा भक्त था। क्या मेरे इस पाप का कोई प्रायश्चित है?

 

तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया, “जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट देता है, उसका वध करना पाप नहीं है। फिर भी यदि तुम्हें ऐसा लगता है, तो भगवान शिव की पूजा करना सबसे अच्छा प्रायश्चित है। तुम शिवलिंग स्थापित करके उनकी सच्चे मन से आराधना करो।

 

इसके बाद कार्तिकेय ने विश्वकर्मा जी से तीन दिव्य शिवलिंग बनवाए। उन्होंने इन शिवलिंगों को तीन अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किया और विधि-विधान से उनकी पूजा की। समय के साथ ये स्थान प्रतिज्ञेश्वर, कपलेश्वर और कुमारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

 

कपलेश्वर में पूजा करते समय कार्तिकेय ने शिवलिंग पर पवित्र जल चढ़ाया और तारकासुर की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। उन्होंने तिल अर्पित करते हुए कहा, “मेरी यह भेंट तारकासुर तक पहुंचे।” इस प्रकार उनकी सच्ची भक्ति और श्रद्धा से उनके मन का भार हल्का हुआ और उन्हें शांति मिली।

 

दिन में दो बार होता है जलाभिषेक

 

स्कन्द पुराण में स्तम्भेश्वर तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है। महीसागर संगम जैसे पवित्र स्थान पर स्थित यह शिवलिंग भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय द्वारा स्थापित माना जाता है।  कहा जाता है कि इसकी खोज लगभग 150 वर्ष पहले हुई थी। यहां स्थित शिवलिंग लगभग 4 फीट ऊंचा और 2 फीट व्यास का है।

 

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां दिन में दो बार प्राकृतिक रूप से जलाभिषेक होता है। जब समुद्र में ज्वार आता है, तो पूरा मंदिर पानी में डूब जाता है और शिवलिंग का अभिषेक स्वयं समुद्र के जल से हो जाता है। ज्वार उतरने के बाद मंदिर फिर से दिखाई देने लगता है।

 

बांटी जाती है पर्ची

 

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में आने वाले भक्तों की सुविधा का खास ध्यान रखा जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक विशेष पर्ची दी जाती है, जिसमें समुद्र में ज्वार आने और जाने का सही समय लिखा होता है। इससे भक्तों को पहले से जानकारी मिल जाती है और वे सुरक्षित तरीके से दर्शन कर पाते हैं।

 

ज्वार के समय मंदिर के चारों ओर पानी भर जाता है और पूरा परिसर समुद्र में डूब जाता है। इस दौरान शिवलिंग के दर्शन संभव नहीं होते। लेकिन जैसे ही ज्वार उतरता है, मंदिर फिर से दिखाई देने लगता है और भक्त भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं।

 

यही अनोखी व्यवस्था और प्राकृतिक घटना इस मंदिर को और भी खास बनाती है, जहां आस्था के साथ-साथ प्रकृति का अद्भुत रूप भी देखने को मिलता है।

 

भक्त यहां अपने जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने की प्रार्थना करते हैं और विश्वास रखते हैं कि बाबा स्तंभेश्वर उनकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे। समुद्र की लहरों के बीच प्रकट और गायब होता यह मंदिर न केवल प्रकृति का अद्भुत नजारा प्रस्तुत करता है, बल्कि आस्था, विश्वास और भक्ति का एक जीवंत प्रतीक भी है। यही कारण है कि स्तंभेश्वर महादेव मंदिर हर भक्त के लिए एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

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श्री स्तम्भेश्वर महादेव - जहां समुद्र द्वारा स्वयं होता है महादेव का अभिषेक

भारत एक ऐसा देश है जहां आस्था और चमत्कारों की कहानियां सदियों से लोगों को आकर्षित करती आई हैं। यहां के मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना के स्थान नहीं, बल्कि रहस्यों और अनोखी घटनाओं के केंद्र भी माने जाते हैं। कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी घटनाएं आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं और जिनके रहस्यों को विज्ञान भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है।

 

इन्हीं रहस्यमयी स्थलों में एक है स्तंभेश्वर महादेव मंदिर, जो अपने अनोखे और चौंकाने वाले चमत्कार के लिए जाना जाता है, यह मंदिर हर दिन कुछ समय के लिए गायब हो जाता है। यही वजह है कि यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए गहरी आस्था और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

 

यह पवित्र स्थल गुजरात के भरूच जिले के जंबुसर तहसील में कावी-कंबोई समुद्र तट पर स्थित है। वडोदरा से लगभग 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगवान शिव का यह अनोखा मंदिर समुद्र के किनारे होने के कारण अपने आप में बेहद खास है।

 

मंदिर का इतिहास

 

हिंदू धर्म के अठारह पुराणों में एक कथा मिलती है, जिसमें कार्तिकेय और तारकासुर का उल्लेख है। जब देवताओं ने तारकासुर के वध के बाद कार्तिकेय की प्रशंसा की, तो वे स्वयं इस कार्य से दुखी हो गए। उन्होंने कहा, “मुझे इस बात का खेद है कि मैंने तारकासुर का वध किया, क्योंकि वह भगवान शिव का सच्चा भक्त था। क्या मेरे इस पाप का कोई प्रायश्चित है?

 

तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया, “जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट देता है, उसका वध करना पाप नहीं है। फिर भी यदि तुम्हें ऐसा लगता है, तो भगवान शिव की पूजा करना सबसे अच्छा प्रायश्चित है। तुम शिवलिंग स्थापित करके उनकी सच्चे मन से आराधना करो।

 

इसके बाद कार्तिकेय ने विश्वकर्मा जी से तीन दिव्य शिवलिंग बनवाए। उन्होंने इन शिवलिंगों को तीन अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किया और विधि-विधान से उनकी पूजा की। समय के साथ ये स्थान प्रतिज्ञेश्वर, कपलेश्वर और कुमारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

 

कपलेश्वर में पूजा करते समय कार्तिकेय ने शिवलिंग पर पवित्र जल चढ़ाया और तारकासुर की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। उन्होंने तिल अर्पित करते हुए कहा, “मेरी यह भेंट तारकासुर तक पहुंचे।” इस प्रकार उनकी सच्ची भक्ति और श्रद्धा से उनके मन का भार हल्का हुआ और उन्हें शांति मिली।

 

दिन में दो बार होता है जलाभिषेक

 

स्कन्द पुराण में स्तम्भेश्वर तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है। महीसागर संगम जैसे पवित्र स्थान पर स्थित यह शिवलिंग भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय द्वारा स्थापित माना जाता है।  कहा जाता है कि इसकी खोज लगभग 150 वर्ष पहले हुई थी। यहां स्थित शिवलिंग लगभग 4 फीट ऊंचा और 2 फीट व्यास का है।

 

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां दिन में दो बार प्राकृतिक रूप से जलाभिषेक होता है। जब समुद्र में ज्वार आता है, तो पूरा मंदिर पानी में डूब जाता है और शिवलिंग का अभिषेक स्वयं समुद्र के जल से हो जाता है। ज्वार उतरने के बाद मंदिर फिर से दिखाई देने लगता है।

 

बांटी जाती है पर्ची

 

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में आने वाले भक्तों की सुविधा का खास ध्यान रखा जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक विशेष पर्ची दी जाती है, जिसमें समुद्र में ज्वार आने और जाने का सही समय लिखा होता है। इससे भक्तों को पहले से जानकारी मिल जाती है और वे सुरक्षित तरीके से दर्शन कर पाते हैं।

 

ज्वार के समय मंदिर के चारों ओर पानी भर जाता है और पूरा परिसर समुद्र में डूब जाता है। इस दौरान शिवलिंग के दर्शन संभव नहीं होते। लेकिन जैसे ही ज्वार उतरता है, मंदिर फिर से दिखाई देने लगता है और भक्त भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं।

 

यही अनोखी व्यवस्था और प्राकृतिक घटना इस मंदिर को और भी खास बनाती है, जहां आस्था के साथ-साथ प्रकृति का अद्भुत रूप भी देखने को मिलता है।

 

भक्त यहां अपने जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने की प्रार्थना करते हैं और विश्वास रखते हैं कि बाबा स्तंभेश्वर उनकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे। समुद्र की लहरों के बीच प्रकट और गायब होता यह मंदिर न केवल प्रकृति का अद्भुत नजारा प्रस्तुत करता है, बल्कि आस्था, विश्वास और भक्ति का एक जीवंत प्रतीक भी है। यही कारण है कि स्तंभेश्वर महादेव मंदिर हर भक्त के लिए एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव