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400 साल पुरानी विरासत, धैर्य और कल्पनाशीलता का अद्भुत संगम - रोगन आर्ट। सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है, जो आज भी अपने अनोखे अंदाज़ से दुनिया को हैरान कर रही है।
गुजरात के कच्छ जिले के निरोणा गांव में पनपी यह कला ऐसी है, जो दिल में जन्म लेती है, ख्वाबों में आकार लेती है और बिना कपड़े को छुए उस पर बारीक डिज़ाइन उकेर देती है। न सुई-धागे की ज़रूरत, न ब्रश का सहारा । सिर्फ हाथों की नजाकत और वर्षों की साधना इस कला को संभव बनाती है।
रोगन आर्ट की अनोखी पहचान
“रोगन” शब्द फारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ होता है “तेल” । यह एक ऑयल-बेस्ड पेंटिंग तकनीक है, जिसमें रंगों को कपड़े पर सीधे नहीं लगाया जाता, बल्कि हवा में नियंत्रित करते हुए धागे जैसी पतली रेखाओं के रूप में डिजाइन बनाया जाता है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे दुर्लभ और जटिल टेक्सटाइल आर्ट फॉर्म्स में गिना जाता है।
ईरान से कच्छ तक का सफर
इतिहासकारों के अनुसार, रोगन आर्ट लगभग 400 साल पहले ईरान (पर्शिया) से भारत आई। यह कला गुजरात के कच्छ क्षेत्र में खूब फली-फूली, जहां इसे मुख्य रूप से स्थानीय समुदायों द्वारा अपनाया गया। पहले यह कला दुल्हनों के कपड़ों और खास अवसरों के वस्त्रों पर सजाने के लिए इस्तेमाल होती थी। समय के साथ मशीनों और आधुनिक प्रिंटिंग तकनीकों के आने से यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। एक समय ऐसा भी आया जब यह कला खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थी।
खत्री परिवार: परंपरा के असली संरक्षक
निरोणा गांव के अब्दुल गफ्फार खत्री और उनका परिवार इस कला के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण संरक्षक माने जाते हैं। खत्री परिवार की 8 से अधिक पीढ़ियां इस कला को जीवित रखे हुए हैं। जब यह कला विलुप्त होने के करीब थी, तब इस परिवार ने न सिर्फ इसे बचाया बल्कि इसे नई पहचान भी दिलाई। आज उनके प्रयासों के कारण रोगन आर्ट भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रसिद्ध हो चुकी है।
अब्दुल गफ्फार खत्री को इस कला के संरक्षण और प्रचार के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा खत्री परिवार को करीब 30 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान
रोगन आर्ट की खासियत और सुंदरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई विदेशी नेताओं को रोगन पेंटिंग उपहार में दे चुके हैं। इनमें जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा, डेनमार्क की महारानी मार्ग्रेथ द्वितीय और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इन उपहारों के बाद रोगन आर्ट को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली और इसकी मांग तेजी से बढ़ी।
कैसे बनती है रोगन आर्ट?
रोगन आर्ट की प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली होती है:
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सबसे पहले कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) को 2-3 दिन तक लगातार गर्म किया जाता है।
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ठंडा होने पर यह तेल गाढ़े, रबर जैसे पदार्थ में बदल जाता है।
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इस पदार्थ को प्राकृतिक रंगों के साथ मिलाकर अलग-अलग रंग तैयार किए जाते हैं।
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डिजाइन बनाने के लिए लगभग 6 इंच लंबी लोहे की पतली रॉड (सुई जैसी) का उपयोग किया जाता है।
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कलाकार अपने बाएं हाथ पर रंग को रगड़कर उससे पतली धागे जैसी रेखा निकालता है।
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फिर इस रेखा को हवा में नियंत्रित करते हुए कपड़े पर डिजाइन बनाया जाता है - बिना सीधे स्पर्श के।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस कला में किसी भी प्रकार का स्केच या ड्राफ्ट पहले से नहीं बनाया जाता। कलाकार जो कल्पना करता है, वही सीधे कपड़े पर उकेर देता है। यह कला सिर्फ कपड़ों पर डिजाइन नहीं बनाती, बल्कि इतिहास, संस्कृति और पीढ़ियों की मेहनत को एक धागे में पिरो देती है- वो भी, बिना उस धागे के वास्तव में मौजूद हुए।

