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भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने विखंडित हो चुके आध्यात्मिक परिदृश्य को पुनः एकसूत्र में पिरोया। मात्र 32 वर्षों के अल्प जीवन में उन्होंने जो आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक कार्य किए, वे आज भी भारतीय संस्कृति के मूल स्तंभों में गिने जाते हैं।
जन्म, बाल्यकाल और आध्यात्मिक झुकाव
आदि शंकराचार्य का जन्म माना जाता है की कालड़ी (केरल) में लगभग 788 ईस्वी के आसपास एक नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यम्बा था। वे वैशाख शुक्ल पंचमी को जन्मे थे, जिसे शंकराचार्य जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह दिन इस बार आगामी 21 अप्रैल को है। खैर, बाल्यकाल से ही उनमें अद्भुत प्रतिभा और वैदिक ज्ञान के प्रति गहरी रुचि दिखाई देने लगी थी। कहा जाता है कि उन्होंने बहुत कम आयु में ही वेदों, उपनिषदों और अन्य शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था। उनका झुकाव सांसारिक जीवन से अधिक आध्यात्मिक साधना की ओर था। बाल्यावस्था में ही उन्होंने संन्यास लेने का निश्चय किया और अंततः माता की अनुमति प्राप्त कर वे गुरु की खोज में निकल पड़े।
गुरु से दीक्षा और अद्वैत वेदांत का ज्ञान
आदि शंकराचार्य को उनके गुरु गोविन्द भगवत्पाद से अद्वैत वेदांत की दीक्षा प्राप्त हुई। यह दर्शन भारतीय चिंतन की एक अत्यंत गूढ़ और उच्च कोटि की विचारधारा है, जिसका मूल सिद्धांत है - “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
अर्थात ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, यह संसार माया है और जीव (आत्मा) तथा ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।
दार्शनिक योगदान और ग्रंथ-रचना
आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत को न केवल पुनर्जीवित किया, बल्कि उसे तर्क, शास्त्र और अनुभव के आधार पर सुदृढ़ भी किया। उन्होंने प्रमुख ग्रंथों-उपनिषद, भगवद गीता, ब्रह्मसूत्र लिखे, जो आज भी वेदांत दर्शन के मानक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाओं में भज गोविंदम, निर्वाण षट्कम्, सौन्दर्य लहरी और विवेकचूडामणि विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन ग्रंथों में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का अद्वितीय समन्वय देखने को मिलता है।
भारत-भ्रमण और शास्त्रार्थ
उस समय भारत में धर्म विभिन्न संप्रदायों, मतभेदों और अंधविश्वासों में बंट चुका था। ऐसे समय में आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत का व्यापक भ्रमण किया। उन्होंने विभिन्न विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ कर अद्वैत वेदांत की स्थापना की और सनातन धर्म की एकता को पुनः स्थापित किया।
उनका उद्देश्य केवल वाद-विवाद जीतना नहीं था, बल्कि सत्य की स्थापना और समाज में आध्यात्मिक चेतना का जागरण करना था।
चार मठों की स्थापना
धर्म और ज्ञान के स्थायी प्रचार-प्रसार के लिए आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा, वेदांत दर्शन और सनातन परंपरा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
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उत्तर में ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)
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दक्षिण में श्रृंगेरी मठ (कर्नाटक)
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पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (गुजरात)
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पूर्व में गोवर्धन मठ (ओडिशा)

