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देहरादून का प्रसिद्ध सिद्धपीठ ‘मां डाट काली मंदिर’

देहरादून का डाट काली मंदिर अचानक चर्चा में। ऐसा इसलिए क्यों कि हाल ही में दिल्ली-देहरादून इकॉनमिक कॉरिडोर के तहत नए बने हाई-वे का उद्घाटन करने से पहले यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दर्शन-पूजन किया । इस दौरान बच्चियों के एक ग्रुप ने उन्हें महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का सस्वर पाठ भी सुनाया जिससे वो काफी अभिभूत दिखे । आइये, इस मंदिर की महिमा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

 

देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में बसा देहरादून अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ गहरी आस्था के केंद्रों के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं में से एक है मां डाट काली मंदिर, जहां श्रद्धा और विश्वास का संगम हर दिन देखने को मिलता है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच स्थित यह सिद्धपीठ देहरादून के आईएसबीटी से करीब 7 किलोमीटर दूर और देहरादून-सहारनपुर मार्ग के किनारे बना हुआ है। पत्थर और लकड़ी से बना यह मंदिर उत्तराखंड के प्रवेश द्वार पर स्थित है, जिससे इसकी खास पहचान है। मान्यता है कि मां काली रास्तों और वाहनों की रक्षा करती हैं। इसलिए यहां से गुजरने वाले लोग और वाहन चालक रुककर माता के दर्शन करते हैं और अपनी यात्रा सुरक्षित होने की प्रार्थना करते हैं। यह मंदिर लोगों के विश्वास और आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

 

222 साल पुराना मंदिर का गौरवशाली इतिहास

 

मां डाट काली मंदिर का इतिहास बेहद दिलचस्प और प्राचीन है। इस मंदिर की स्थापना 13 जून 1804 को की गई थी। उस दौर में जब देहरादून और सहारनपुर को जोड़ने वाले मार्ग का निर्माण हो रहा था, तब इस मंदिर की नींव रखी गई थी। यह इलाका शिवालिक की पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। आज यह मंदिर न केवल उत्तराखंड बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी अटूट श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। इसे इलाके के सबसे पुराने और जागृत मंदिरों में गिना जाता है।         

                   

अंग्रेजी उच्चारण से बदला मंदिर का नाम

 

मंदिर के नाम 'डाट काली' के पीछे की कहानी भी काफी अनूठी है। असल में 'डाट' शब्द का सीधा संबंध 'दांत' से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी काली के उग्र रूप में उनके दांत बाहर निकले हुए दिखाई देते हैं, इसलिए इसका असली नाम 'दंतकाली' मंदिर था।  लेकिन जब अंग्रेज अफसर इस क्षेत्र में आए तो उनके लिए संस्कृत निष्ठ 'दंतकाली' शब्द का सही उच्चारण करना मुश्किल था। वे इसे 'डाट' बोलने लगे और धीरे-धीरे बोलचाल की भाषा में यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि आज पूरी दुनिया इसे डाट काली मंदिर के नाम से ही जानती है।

 

मंदिर का धार्मिक महत्व

 

मां डाट काली मंदिर का धार्मिक महत्व काफी अधिक माना जाता है। खासकर नए वाहन खरीदने वाले लोग यहां आकर मां का आशीर्वाद लेते हैं और अपनी गाड़ी की सुरक्षित शुरुआत करते हैं। मंदिर में पुरोहितों द्वारा विशेष पूजा कराई जाती है, जिसमें नारियल चढ़ाया जाता है और वाहन पर काला धागा बांधा जाता है। मान्यता है कि इससे बुरी नजर, दुर्घटनाओं और अन्य खतरों से बचाव होता है। कई लोग अपने वाहन में सुरक्षा के लिए विशेष यंत्र भी लगवाते हैं। देहरादून-सहारनपुर मार्ग के पास होने के कारण यहां से गुजरने वाले वाहन चालक अक्सर मंदिर में रुककर दर्शन करते हैं और अपनी यात्रा की सुरक्षा की कामना करते हैं। यही वजह है कि यह मंदिर यात्रियों के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।

 

मां डाट काली का यह दरबार समय के साथ और भी अधिक प्रभावशाली बनता गया है, जहां हर प्रार्थना में विश्वास और हर दर्शन में सुकून मिलता है। यही वजह है कि इस मंदिर में आम लोगों के साथ-साथ विशिष्ट व्यक्तियों की भी आस्था है। दिल्ली-देहरादून हाई-वे बनने के बाद से यह स्थान श्रद्धालुओं की सुगम पहुंच में आ गया है । आने वाले दिनों में यहां और अधिक भक्तों के पहुंचने की संभावना है । 

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

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देहरादून का प्रसिद्ध सिद्धपीठ ‘मां डाट काली मंदिर’

देहरादून का डाट काली मंदिर अचानक चर्चा में। ऐसा इसलिए क्यों कि हाल ही में दिल्ली-देहरादून इकॉनमिक कॉरिडोर के तहत नए बने हाई-वे का उद्घाटन करने से पहले यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दर्शन-पूजन किया । इस दौरान बच्चियों के एक ग्रुप ने उन्हें महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का सस्वर पाठ भी सुनाया जिससे वो काफी अभिभूत दिखे । आइये, इस मंदिर की महिमा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

 

देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में बसा देहरादून अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ गहरी आस्था के केंद्रों के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं में से एक है मां डाट काली मंदिर, जहां श्रद्धा और विश्वास का संगम हर दिन देखने को मिलता है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच स्थित यह सिद्धपीठ देहरादून के आईएसबीटी से करीब 7 किलोमीटर दूर और देहरादून-सहारनपुर मार्ग के किनारे बना हुआ है। पत्थर और लकड़ी से बना यह मंदिर उत्तराखंड के प्रवेश द्वार पर स्थित है, जिससे इसकी खास पहचान है। मान्यता है कि मां काली रास्तों और वाहनों की रक्षा करती हैं। इसलिए यहां से गुजरने वाले लोग और वाहन चालक रुककर माता के दर्शन करते हैं और अपनी यात्रा सुरक्षित होने की प्रार्थना करते हैं। यह मंदिर लोगों के विश्वास और आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

 

222 साल पुराना मंदिर का गौरवशाली इतिहास

 

मां डाट काली मंदिर का इतिहास बेहद दिलचस्प और प्राचीन है। इस मंदिर की स्थापना 13 जून 1804 को की गई थी। उस दौर में जब देहरादून और सहारनपुर को जोड़ने वाले मार्ग का निर्माण हो रहा था, तब इस मंदिर की नींव रखी गई थी। यह इलाका शिवालिक की पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। आज यह मंदिर न केवल उत्तराखंड बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी अटूट श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। इसे इलाके के सबसे पुराने और जागृत मंदिरों में गिना जाता है।         

                   

अंग्रेजी उच्चारण से बदला मंदिर का नाम

 

मंदिर के नाम 'डाट काली' के पीछे की कहानी भी काफी अनूठी है। असल में 'डाट' शब्द का सीधा संबंध 'दांत' से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी काली के उग्र रूप में उनके दांत बाहर निकले हुए दिखाई देते हैं, इसलिए इसका असली नाम 'दंतकाली' मंदिर था।  लेकिन जब अंग्रेज अफसर इस क्षेत्र में आए तो उनके लिए संस्कृत निष्ठ 'दंतकाली' शब्द का सही उच्चारण करना मुश्किल था। वे इसे 'डाट' बोलने लगे और धीरे-धीरे बोलचाल की भाषा में यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि आज पूरी दुनिया इसे डाट काली मंदिर के नाम से ही जानती है।

 

मंदिर का धार्मिक महत्व

 

मां डाट काली मंदिर का धार्मिक महत्व काफी अधिक माना जाता है। खासकर नए वाहन खरीदने वाले लोग यहां आकर मां का आशीर्वाद लेते हैं और अपनी गाड़ी की सुरक्षित शुरुआत करते हैं। मंदिर में पुरोहितों द्वारा विशेष पूजा कराई जाती है, जिसमें नारियल चढ़ाया जाता है और वाहन पर काला धागा बांधा जाता है। मान्यता है कि इससे बुरी नजर, दुर्घटनाओं और अन्य खतरों से बचाव होता है। कई लोग अपने वाहन में सुरक्षा के लिए विशेष यंत्र भी लगवाते हैं। देहरादून-सहारनपुर मार्ग के पास होने के कारण यहां से गुजरने वाले वाहन चालक अक्सर मंदिर में रुककर दर्शन करते हैं और अपनी यात्रा की सुरक्षा की कामना करते हैं। यही वजह है कि यह मंदिर यात्रियों के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।

 

मां डाट काली का यह दरबार समय के साथ और भी अधिक प्रभावशाली बनता गया है, जहां हर प्रार्थना में विश्वास और हर दर्शन में सुकून मिलता है। यही वजह है कि इस मंदिर में आम लोगों के साथ-साथ विशिष्ट व्यक्तियों की भी आस्था है। दिल्ली-देहरादून हाई-वे बनने के बाद से यह स्थान श्रद्धालुओं की सुगम पहुंच में आ गया है । आने वाले दिनों में यहां और अधिक भक्तों के पहुंचने की संभावना है । 

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव