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निर्जला एकादशी 2026: क्यों मानी जाती है सबसे पुण्यदायी एकादशी?

 

सनातन धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है, लेकिन निर्जला एकादशी का महत्व सभी एकादशियों में सबसे अधिक बताया गया है। इस बार यह एकादशी 25 जून को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया व्रत पूरे वर्ष की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्रदान करता है। इसी कारण इसे सबसे पुण्यदायी एकादशी माना जाता है।

 

क्यों मनाई जाती है निर्जला एकादशी?

 

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी मनाई जाती है। "निर्जला" का अर्थ है बिना जल के। इस दिन श्रद्धालु अन्न और जल दोनों का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत आत्मसंयम, तपस्या और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है । जो श्रद्धालु किसी कारणवश वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते, उनके लिए निर्जला एकादशी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है।

 

निर्जला एकादशी का महत्व

 

पौराणिक कथा के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत, पूजा और दान करने से श्रद्धालु को वर्षभर की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि देशभर के विष्णु मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है।

 

भीमसेन और वेदव्यास की कथा

 

निर्जला एकादशी की महिमा महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा से जुड़ी हुई है। पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे, लेकिन उन्हें बहुत अधिक भूख लगती थी। माता कुंती और भीमसेन के चारों भाई नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखते थे, जबकि भीमसेन के लिए उपवास करना कठिन था।

 

एक दिन उन्होंने महर्षि वेदव्यास से पूछा कि क्या ऐसा कोई व्रत है, जिसे करने से सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इस दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करने से वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। महर्षि के कहने पर भीमसेन ने यह व्रत किया और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त की। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

 

निर्जला एकादशी की पूजा विधि

 

निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के समक्ष दीपक जलाकर पूजा करें। भगवान को पीले पुष्प और फल अर्पित करें। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं और अगले दिन द्वादशी तिथि में विधि-विधान से व्रत का पारण करते हैं।

 

दान का महत्व

 

निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जल से भरा कलश, पंखा, छाता, वस्त्र, फल और शरबत दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

 

:- लता रानी
 

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क्यों मनाई जाती है निर्जला एकादशी?

 

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी मनाई जाती है। "निर्जला" का अर्थ है बिना जल के। इस दिन श्रद्धालु अन्न और जल दोनों का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत आत्मसंयम, तपस्या और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है । जो श्रद्धालु किसी कारणवश वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते, उनके लिए निर्जला एकादशी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है।

 

निर्जला एकादशी का महत्व

 

पौराणिक कथा के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत, पूजा और दान करने से श्रद्धालु को वर्षभर की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि देशभर के विष्णु मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है।

 

भीमसेन और वेदव्यास की कथा

 

निर्जला एकादशी की महिमा महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा से जुड़ी हुई है। पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे, लेकिन उन्हें बहुत अधिक भूख लगती थी। माता कुंती और भीमसेन के चारों भाई नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखते थे, जबकि भीमसेन के लिए उपवास करना कठिन था।

 

एक दिन उन्होंने महर्षि वेदव्यास से पूछा कि क्या ऐसा कोई व्रत है, जिसे करने से सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इस दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करने से वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। महर्षि के कहने पर भीमसेन ने यह व्रत किया और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त की। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

 

निर्जला एकादशी की पूजा विधि

 

निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के समक्ष दीपक जलाकर पूजा करें। भगवान को पीले पुष्प और फल अर्पित करें। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं और अगले दिन द्वादशी तिथि में विधि-विधान से व्रत का पारण करते हैं।

 

दान का महत्व

 

निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जल से भरा कलश, पंखा, छाता, वस्त्र, फल और शरबत दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

 

:- लता रानी