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प्रयागराज की द्वादश माधव परिक्रमा: विष्णु जी के 12 स्वरूपों के दर्शन का महापुण्य

गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम से सुशोभित प्रयागराज को सनातन परंपरा में 'तीर्थराज' कहा गया है। मान्यता है कि जिस प्रकार सभी नदियों में गंगा और सभी पर्वतों में हिमालय का सर्वोच्च स्थान है, उसी प्रकार सभी तीर्थों में प्रयागराज का स्थान सर्वोपरि है। इसी पवित्र भूमि पर स्थित है द्वादश माधव परिक्रमा, जिसे वैष्णव परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक द्वादश माधव परिक्रमा करने से अनेक तीर्थों के दर्शन और पुण्य का फल प्राप्त होता है तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।

 

क्या है द्वादश माधव परिक्रमा?

 

'द्वादश' अर्थात बारह और 'माधव' भगवान श्रीविष्णु का एक प्रमुख नाम है। प्रयागराज में भगवान विष्णु के बारह प्राचीन स्वरूप विभिन्न स्थानों पर विराजमान हैं। इन सभी बारह स्वरूपों के दर्शन और पूजा-अर्चना को ही द्वादश माधव परिक्रमा कहा जाता है।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने तीर्थराज प्रयाग की रक्षा के लिए अपने इन बारह स्वरूपों की स्थापना की थी। इसलिए प्रयागराज की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक श्रद्धालु द्वादश माधव के दर्शन न कर लें।

 

पौराणिक महत्व

 

पुराणों में प्रयागराज को यज्ञों की प्रथम भूमि और देवताओं का प्रिय तीर्थ बताया गया है। कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने सृष्टि का प्रथम यज्ञ यहीं संपन्न किया था। इसी कारण इस क्षेत्र में भगवान विष्णु ने माधव रूप में निवास किया। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि द्वादश माधव के दर्शन करने वाला श्रद्धालु अनेक जन्मों के पापों से मुक्त होकर पुण्य का भागी बनता है।

 

मान्यता यह भी है कि संगम स्नान के साथ यदि द्वादश माधव परिक्रमा की जाए तो उसका धार्मिक फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि माघ मेला, कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान लाखों श्रद्धालु इस परिक्रमा को विशेष श्रद्धा के साथ करते हैं।

 

द्वादश माधव के प्रमुख स्वरूप

प्रयागराज में स्थित द्वादश माधव के स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में विराजमान हैं, जो इस प्रकार हैं...

 

वेणी माधव

 

यह मंदिर संगम क्षेत्र में दारागंज के पास गंगा किनारे स्थित है। वेणी माधव प्रयागराज के प्रधान नगर देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वेणी माधव चतुर्भुज रूप में लक्ष्मी जी के साथ विराजमान हैं, और उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म हैं। यहाँ त्रिवेणी की पूजा भी होती है और यह मंदिर प्रयाग की रक्षा का मुख्य केंद्र है।

 

अनंत माधव

 

द्वादश माधव में दूसरा स्थान अनंत माधव का है। यह मंदिर भी दारागंज वेदी क्षेत्र के अंतर्गत ही आता है और परिक्रमा का दूसरा पड़ाव है। अनंत माधव भगवान की अनंत कृपा के प्रतीक हैं। यहाँ अनंत भक्ति और शक्ति के रूप में माधव जी का पूजन होता है।

 

असि माधव

 

यह स्थान दारागंज के अस्सी घाट क्षेत्र में गंगा किनारे स्थित है। असि माधव भगवान के पाप-नाशक स्वरूप में विराजमान हैं। द्वादश माधव परिक्रमा का यह तीसरा पड़ाव है।

 

मनोहर माधव

 

दारागंज क्षेत्र में पड़ने वाला यह अगला माधव मंदिर है। भक्तों के मन में विष्णु भक्ति जगाने वाले मनोहर माधव के दर्शन करने से मन के सारे दोष दूर हो जाते हैं और ईश्वर में ध्यान लग जाता है।

 

गदा माधव

 

धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु यहाँ गदा धारण किए हुए हैं। श्री गदा माधव भगवान का प्राचीन मंदिर यमुना पार नैनी क्षेत्र में स्थित है और माधव मंदिरों में से इसे दक्षिणी बिंदु माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से भक्तों के सारे कष्ट और काल-भय शीघ्र ही दूर हो जाते हैं।
 

पद्म माधव

 

श्री पद्म माधव का प्राचीन मंदिर प्रयागराज के यमुना पार घूरपुर क्षेत्र के बीकर-देवरिया गाँव में स्थित है। हाथ में कमल (पद्म) धारण किए हुए यह माधव स्वरूप शुद्धता, शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।

 

चक्र माधव

 

सातवें माधव के रूप में श्री चक्र माधव की पूजा होती है, जो यमुना पार अरैल क्षेत्र में स्थित है। श्री चक्र माधव का यह मंदिर प्रसिद्ध सोमेश्वर नाथ मंदिर के निकट है। 12 माधव में चक्र माधव को कालचक्र और धर्मचक्र का प्रतीक माना जाता है।

 

बिंदु माधव

 

परमात्मा के सूक्ष्म तत्व के प्रतीक के रूप में बिंदु माधव का स्थान द्रौपदी घाट पर स्थित है। यह एक बेहद रमणीय स्थल है और बिंदु माधव परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। ​मान्यता है कि यहाँ बिंदु माधव के पूजन से जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।

 

शंख माधव

 

भगवान विष्णु के माधव रूपों में से एक ‘श्री शंख माधव’ का भव्य मंदिर छतनाग क्षेत्र (मुंशी बगीचा) में स्थित है। शंखधारी माधव की शंखध्वनि से सभी अशुभ तत्वों का नाश होता है।

 

संकटहर माधव

 

दसवें माधव के रूप में भगवान संकटहर (संकष्टहर) माधव प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में स्थित हैं। भक्तों के सभी संकटों और कष्टों को हरने वाले इस माधव स्वरूप का दर्शन करना बेहद कल्याणकारी माना जाता है।

 

अक्षय वट माधव

 

त्रिवेणी संगम क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध अक्षय वट के नजदीक ही अक्षय वट माधव का स्थान है। इस वट वृक्ष को अविनाशी (कभी न नष्ट होने वाला) कहा गया है।

 

आदि माधव / योग माधव

 

झूंसी क्षेत्र में आदि माधव जिन्हें योग माधव या आदि वट माधव भी कहा जाता है। यह माधव मंदिर आदि सृष्टि और योग मार्ग का प्रतीक है।

 

परिक्रमा की विधि

 

धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान कर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। फिर भगवान विष्णु का ध्यान कर द्वादश माधव परिक्रमा का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु निर्धारित क्रम से सभी माधव मंदिरों के दर्शन करते हैं, भगवान विष्णु को तुलसी दल, पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करते हैं तथा विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं। अंत में पुनः संगम पहुंचकर पूजा-अर्चना कर परिक्रमा का समापन किया जाता है।

 

कब करना शुभ माना जाता है?

 

यूं तो वर्षभर द्वादश माधव परिक्रमा की जा सकती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से कुछ अवसर विशेष फलदायी माने गए हैं, जैसे - माघ मास (माघ मेला), कुंभ एवं महाकुंभ, अर्धकुंभ, एकादशी, अक्षय तृतीया, देवउठनी एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा इत्यादि। इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रहती है।

 

द्वादश माधव परिक्रमा केवल मंदिरों की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, श्रद्धा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण की आध्यात्मिक यात्रा है। यह परिक्रमा मनुष्य को सेवा, भक्ति, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। तीर्थराज प्रयागराज में स्थित भगवान माधव के इन दिव्य स्वरूपों का दर्शन श्रद्धालुओं के मन में नई ऊर्जा, आस्था और सकारात्मकता का संचार करता है।

 

:- रजत द्विवेदी

 

 

 

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प्रयागराज की द्वादश माधव परिक्रमा: विष्णु जी के 12 स्वरूपों के दर्शन का महापुण्य

गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम से सुशोभित प्रयागराज को सनातन परंपरा में 'तीर्थराज' कहा गया है। मान्यता है कि जिस प्रकार सभी नदियों में गंगा और सभी पर्वतों में हिमालय का सर्वोच्च स्थान है, उसी प्रकार सभी तीर्थों में प्रयागराज का स्थान सर्वोपरि है। इसी पवित्र भूमि पर स्थित है द्वादश माधव परिक्रमा, जिसे वैष्णव परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक द्वादश माधव परिक्रमा करने से अनेक तीर्थों के दर्शन और पुण्य का फल प्राप्त होता है तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।

 

क्या है द्वादश माधव परिक्रमा?

 

'द्वादश' अर्थात बारह और 'माधव' भगवान श्रीविष्णु का एक प्रमुख नाम है। प्रयागराज में भगवान विष्णु के बारह प्राचीन स्वरूप विभिन्न स्थानों पर विराजमान हैं। इन सभी बारह स्वरूपों के दर्शन और पूजा-अर्चना को ही द्वादश माधव परिक्रमा कहा जाता है।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने तीर्थराज प्रयाग की रक्षा के लिए अपने इन बारह स्वरूपों की स्थापना की थी। इसलिए प्रयागराज की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक श्रद्धालु द्वादश माधव के दर्शन न कर लें।

 

पौराणिक महत्व

 

पुराणों में प्रयागराज को यज्ञों की प्रथम भूमि और देवताओं का प्रिय तीर्थ बताया गया है। कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने सृष्टि का प्रथम यज्ञ यहीं संपन्न किया था। इसी कारण इस क्षेत्र में भगवान विष्णु ने माधव रूप में निवास किया। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि द्वादश माधव के दर्शन करने वाला श्रद्धालु अनेक जन्मों के पापों से मुक्त होकर पुण्य का भागी बनता है।

 

मान्यता यह भी है कि संगम स्नान के साथ यदि द्वादश माधव परिक्रमा की जाए तो उसका धार्मिक फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि माघ मेला, कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान लाखों श्रद्धालु इस परिक्रमा को विशेष श्रद्धा के साथ करते हैं।

 

द्वादश माधव के प्रमुख स्वरूप

प्रयागराज में स्थित द्वादश माधव के स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में विराजमान हैं, जो इस प्रकार हैं...

 

वेणी माधव

 

यह मंदिर संगम क्षेत्र में दारागंज के पास गंगा किनारे स्थित है। वेणी माधव प्रयागराज के प्रधान नगर देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वेणी माधव चतुर्भुज रूप में लक्ष्मी जी के साथ विराजमान हैं, और उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म हैं। यहाँ त्रिवेणी की पूजा भी होती है और यह मंदिर प्रयाग की रक्षा का मुख्य केंद्र है।

 

अनंत माधव

 

द्वादश माधव में दूसरा स्थान अनंत माधव का है। यह मंदिर भी दारागंज वेदी क्षेत्र के अंतर्गत ही आता है और परिक्रमा का दूसरा पड़ाव है। अनंत माधव भगवान की अनंत कृपा के प्रतीक हैं। यहाँ अनंत भक्ति और शक्ति के रूप में माधव जी का पूजन होता है।

 

असि माधव

 

यह स्थान दारागंज के अस्सी घाट क्षेत्र में गंगा किनारे स्थित है। असि माधव भगवान के पाप-नाशक स्वरूप में विराजमान हैं। द्वादश माधव परिक्रमा का यह तीसरा पड़ाव है।

 

मनोहर माधव

 

दारागंज क्षेत्र में पड़ने वाला यह अगला माधव मंदिर है। भक्तों के मन में विष्णु भक्ति जगाने वाले मनोहर माधव के दर्शन करने से मन के सारे दोष दूर हो जाते हैं और ईश्वर में ध्यान लग जाता है।

 

गदा माधव

 

धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु यहाँ गदा धारण किए हुए हैं। श्री गदा माधव भगवान का प्राचीन मंदिर यमुना पार नैनी क्षेत्र में स्थित है और माधव मंदिरों में से इसे दक्षिणी बिंदु माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से भक्तों के सारे कष्ट और काल-भय शीघ्र ही दूर हो जाते हैं।
 

पद्म माधव

 

श्री पद्म माधव का प्राचीन मंदिर प्रयागराज के यमुना पार घूरपुर क्षेत्र के बीकर-देवरिया गाँव में स्थित है। हाथ में कमल (पद्म) धारण किए हुए यह माधव स्वरूप शुद्धता, शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।

 

चक्र माधव

 

सातवें माधव के रूप में श्री चक्र माधव की पूजा होती है, जो यमुना पार अरैल क्षेत्र में स्थित है। श्री चक्र माधव का यह मंदिर प्रसिद्ध सोमेश्वर नाथ मंदिर के निकट है। 12 माधव में चक्र माधव को कालचक्र और धर्मचक्र का प्रतीक माना जाता है।

 

बिंदु माधव

 

परमात्मा के सूक्ष्म तत्व के प्रतीक के रूप में बिंदु माधव का स्थान द्रौपदी घाट पर स्थित है। यह एक बेहद रमणीय स्थल है और बिंदु माधव परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। ​मान्यता है कि यहाँ बिंदु माधव के पूजन से जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।

 

शंख माधव

 

भगवान विष्णु के माधव रूपों में से एक ‘श्री शंख माधव’ का भव्य मंदिर छतनाग क्षेत्र (मुंशी बगीचा) में स्थित है। शंखधारी माधव की शंखध्वनि से सभी अशुभ तत्वों का नाश होता है।

 

संकटहर माधव

 

दसवें माधव के रूप में भगवान संकटहर (संकष्टहर) माधव प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में स्थित हैं। भक्तों के सभी संकटों और कष्टों को हरने वाले इस माधव स्वरूप का दर्शन करना बेहद कल्याणकारी माना जाता है।

 

अक्षय वट माधव

 

त्रिवेणी संगम क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध अक्षय वट के नजदीक ही अक्षय वट माधव का स्थान है। इस वट वृक्ष को अविनाशी (कभी न नष्ट होने वाला) कहा गया है।

 

आदि माधव / योग माधव

 

झूंसी क्षेत्र में आदि माधव जिन्हें योग माधव या आदि वट माधव भी कहा जाता है। यह माधव मंदिर आदि सृष्टि और योग मार्ग का प्रतीक है।

 

परिक्रमा की विधि

 

धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान कर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। फिर भगवान विष्णु का ध्यान कर द्वादश माधव परिक्रमा का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु निर्धारित क्रम से सभी माधव मंदिरों के दर्शन करते हैं, भगवान विष्णु को तुलसी दल, पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करते हैं तथा विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं। अंत में पुनः संगम पहुंचकर पूजा-अर्चना कर परिक्रमा का समापन किया जाता है।

 

कब करना शुभ माना जाता है?

 

यूं तो वर्षभर द्वादश माधव परिक्रमा की जा सकती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से कुछ अवसर विशेष फलदायी माने गए हैं, जैसे - माघ मास (माघ मेला), कुंभ एवं महाकुंभ, अर्धकुंभ, एकादशी, अक्षय तृतीया, देवउठनी एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा इत्यादि। इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रहती है।

 

द्वादश माधव परिक्रमा केवल मंदिरों की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, श्रद्धा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण की आध्यात्मिक यात्रा है। यह परिक्रमा मनुष्य को सेवा, भक्ति, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। तीर्थराज प्रयागराज में स्थित भगवान माधव के इन दिव्य स्वरूपों का दर्शन श्रद्धालुओं के मन में नई ऊर्जा, आस्था और सकारात्मकता का संचार करता है।

 

:- रजत द्विवेदी