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सोमवार को ही क्यों की जाती है भगवान शिव की पूजा? जानें महत्व, पौराणिक कथा और पूजन विधि

सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। वैसे तो उनकी आराधना किसी भी दिन की जा सकती है, लेकिन सोमवार को शिव पूजा का सबसे शुभ दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु सोमवार का व्रत रखते हैं और शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।

 

सोमवार का भगवान शिव से क्या संबंध है?

 

'सोमवार' शब्द का पहला भाग 'सोम' है, जिसका अर्थ चंद्रमा होता है। भगवान शिव अपने मस्तक पर चंद्रदेव को धारण करते हैं, इसलिए उन्हें चंद्रशेखर भी कहा जाता है। चंद्रमा शीतलता, शांति और सौम्यता का प्रतीक है और भगवान शिव का स्वभाव भी अत्यंत शांत एवं करुणामय माना गया है। इसी कारण सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना गया।

 

धार्मिक मान्यता यह भी है कि 'सोम' का अर्थ अमृत और शीतलता से भी जुड़ा है। भगवान शिव अपने भक्तों के जीवन के दुख, भय और कष्टों को हरकर उन्हें शांति प्रदान करते हैं, इसलिए सोमवार के दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

 

सोमवार से जुड़ी पौराणिक कथा

 

पौराणिक कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से हुआ था। ये 27 पुत्रियां 27 नक्षत्रों का प्रतीक मानी जाती हैं। लेकिन चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से केवल रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। इससे अन्य पुत्रियां दुखी होकर अपने पिता दक्ष के पास पहुंचीं।

 

दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करने की सलाह दी, लेकिन चंद्रदेव ने उनकी बात नहीं मानी। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें क्षय रोग होने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव का तेज और प्रकाश दिन-प्रतिदिन क्षीण होने लगा।

 

अपने कष्ट से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उन्होंने कई वर्षों तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया और पूरे मन से शिव आराधना की। अंततः भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें श्राप से आंशिक मुक्ति प्रदान की। इसी कारण चंद्रमा कृष्ण पक्ष में घटते और शुक्ल पक्ष में बढ़ते हैं। भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर स्थान भी दिया, जिससे उन्हें चंद्रशेखर नाम प्राप्त हुआ।

 

इसी घटना के बाद से सोमवार का दिन भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाने लगा।

 

16 सोमवार व्रत की कथा

 

एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और लगातार 16 सोमवार का व्रत किया। उनकी अटूट श्रद्धा, भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।

 

तभी से अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति और विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए 16 सोमवार का व्रत रखती हैं। पुरुष भी मनोकामना पूर्ति, सफलता और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इस व्रत का पालन करते हैं।

 

सोमवार को कैसे करें भगवान शिव की पूजा?

 

सोमवार के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल, जल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से अभिषेक करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, भस्म, सफेद चंदन और मौसमी फल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें तथा शिव चालीसा या शिव पुराण का पाठ करें।

 

सोमवार की पूजा का महत्व

 

मान्यता है कि सोमवार के दिन भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी, दांपत्य जीवन में मधुरता, संतान सुख तथा कार्यों में सफलता की प्राप्ति होती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई शिव आराधना कभी निष्फल नहीं जाती और महादेव अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखते हैं।

 

:- लता रानी

 

 

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सोमवार को ही क्यों की जाती है भगवान शिव की पूजा? जानें महत्व, पौराणिक कथा और पूजन विधि

सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। वैसे तो उनकी आराधना किसी भी दिन की जा सकती है, लेकिन सोमवार को शिव पूजा का सबसे शुभ दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु सोमवार का व्रत रखते हैं और शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।

 

सोमवार का भगवान शिव से क्या संबंध है?

 

'सोमवार' शब्द का पहला भाग 'सोम' है, जिसका अर्थ चंद्रमा होता है। भगवान शिव अपने मस्तक पर चंद्रदेव को धारण करते हैं, इसलिए उन्हें चंद्रशेखर भी कहा जाता है। चंद्रमा शीतलता, शांति और सौम्यता का प्रतीक है और भगवान शिव का स्वभाव भी अत्यंत शांत एवं करुणामय माना गया है। इसी कारण सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना गया।

 

धार्मिक मान्यता यह भी है कि 'सोम' का अर्थ अमृत और शीतलता से भी जुड़ा है। भगवान शिव अपने भक्तों के जीवन के दुख, भय और कष्टों को हरकर उन्हें शांति प्रदान करते हैं, इसलिए सोमवार के दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

 

सोमवार से जुड़ी पौराणिक कथा

 

पौराणिक कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से हुआ था। ये 27 पुत्रियां 27 नक्षत्रों का प्रतीक मानी जाती हैं। लेकिन चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से केवल रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। इससे अन्य पुत्रियां दुखी होकर अपने पिता दक्ष के पास पहुंचीं।

 

दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करने की सलाह दी, लेकिन चंद्रदेव ने उनकी बात नहीं मानी। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें क्षय रोग होने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव का तेज और प्रकाश दिन-प्रतिदिन क्षीण होने लगा।

 

अपने कष्ट से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उन्होंने कई वर्षों तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया और पूरे मन से शिव आराधना की। अंततः भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें श्राप से आंशिक मुक्ति प्रदान की। इसी कारण चंद्रमा कृष्ण पक्ष में घटते और शुक्ल पक्ष में बढ़ते हैं। भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर स्थान भी दिया, जिससे उन्हें चंद्रशेखर नाम प्राप्त हुआ।

 

इसी घटना के बाद से सोमवार का दिन भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाने लगा।

 

16 सोमवार व्रत की कथा

 

एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और लगातार 16 सोमवार का व्रत किया। उनकी अटूट श्रद्धा, भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।

 

तभी से अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति और विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए 16 सोमवार का व्रत रखती हैं। पुरुष भी मनोकामना पूर्ति, सफलता और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इस व्रत का पालन करते हैं।

 

सोमवार को कैसे करें भगवान शिव की पूजा?

 

सोमवार के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल, जल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से अभिषेक करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, भस्म, सफेद चंदन और मौसमी फल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें तथा शिव चालीसा या शिव पुराण का पाठ करें।

 

सोमवार की पूजा का महत्व

 

मान्यता है कि सोमवार के दिन भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी, दांपत्य जीवन में मधुरता, संतान सुख तथा कार्यों में सफलता की प्राप्ति होती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई शिव आराधना कभी निष्फल नहीं जाती और महादेव अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखते हैं।

 

:- लता रानी