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ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर केवल चार धामों में से एक पवित्र तीर्थ ही नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और रहस्यों का ऐसा संगम है, जिसने सदियों से लोगों को आश्चर्यचकित किया है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। यह पावन अवसर इस बार 16 जुलाई को है । किंतु इस यात्रा के साथ-साथ जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जिन्हें लेकर आज भी वैज्ञानिक कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाए हैं।
क्यों विशेष है जगन्नाथ रथ यात्रा?
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। इसे भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस यात्रा में भगवान के रथ का दर्शन और रथ को खींचने मात्र से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं?
जगन्नाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां पत्थर की नहीं, बल्कि पवित्र नीम की लकड़ी से बनी हैं। सबसे अनोखी बात यह है कि इन मूर्तियों के हाथ-पैर पूर्ण रूप से नहीं बने हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु की मूर्ति बनवाने का संकल्प लिया। तब देव शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध राजमिस्त्री के वेश में आए और उन्होंने शर्त रखी कि जब तक मूर्तियां पूरी न हो जाएं, तब तक कोई भी कमरे का द्वार नहीं खोलेगा। कई दिनों तक कोई आवाज न आने पर रानी गुंडिचा चिंतित हो गईं और राजा से द्वार खुलवा दिया। जैसे ही द्वार खुला, राजमिस्त्री अदृश्य हो गए और मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी स्वरूप में विराजमान रहना चाहते हैं और इस तरह उसी रूप में आज तक उनकी पूजा-अर्चना जारी है ।
हवा के विपरीत क्यों लहराता है मंदिर का ध्वज?
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक है। आश्चर्य की बात यह है कि यह ध्वज सामान्य नियमों के विपरीत हवा की दिशा के उलट लहराता हुआ दिखाई देता है। इसका कारण आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

