15 जून को सोमवती अमावस्या: यहां जानें संपूर्ण महात्म्य
सनातन धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त किये जाने वाले श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण इत्यादि के लिए जाना जाता है। लेकिन इसका महत्व तब और अधिक हो जाता है जब ये तिथि सोमवार को पड़ती है। इसीलिए सोमवती अमावस्या कहा जाता है, जो इस बार 15 जून को मनाई जाएगी। चूंकि अभी ज्येष्ठ अधिक मास चल रहा है जिसे पुरुषोतम या मल मास के नाम से भी जाना जाता है, इसलिए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अमावस्या का और भीअधिक महत्व बढ़ गया है जो कई गुना पुण्यफलों को देने वाला है ।
क्या है सोमवती अमावस्या का महत्व?
मान्यतानुसार सोमवती अमावस्या के दिन भगवान नारायण, महादेव, पीपल वृक्ष और पितरों के निमित्त पूजन करने का विधान है। पुरुषोत्तम मास में नारायण की पूजा को अधिक महत्व दिया गया है । मोक्ष के देवता महादेव मृत आत्माओं को सद्गति देते हैं । साथ ही पितरों के निमित्त पूजन और पिंड दान इत्यादि कर्म से पूर्वज संतुष्ट होते हैं। इसलिए अमावस्या तिथि पर पीपल के वृक्ष में जल, कच्चा दूध, काले तिल अवश्य चढ़ाने चाहिए। भगवान विष्णु की धूप-दीप, पुष्प, रोली, सफेद तिल, केले का फल, शक़्कर, मुनक्का, गुड़ आदि से पूजन करना चाहिए। साथ ही शिवलिंग पर जल, पंचामृत, काले तिल, गन्ने का रस, भस्म, बेल, शमी, आक के पत्ते, लाल व सफेद पुष्प, चंदन आदि से पूजन कर खीर का भोग लगाना चाहिए।
सोमवती अमावस्या पर क्या करें, पितृ पूजन कैसे करें ?
प्रातः काल सभी दैनिक कार्य से निवृत हो कर स्नान आदि के बाद भोजन बना कर विशेष रूप से सब्जी में तोरई, उड़द की दाल सहित मिष्ठान आदि बना कर भोजन पूर्ण करना चाहिए। संभव हो तो किसी ब्राह्मण को भोजन करा कर दक्षिणा आदि से संतुष्ट करना चाहिए । इसके साथ ही तर्पण इत्यादि की विधि पूर्ण करके कौवे, चील आदि पक्षियों को खाद्य सामग्री डालनी चाहिए। चींटी इत्यादि के लिए आटा भून कर चीनी अथवा गोले का बरुदा मिलाकर पीपल, बेल, बरगद आदि वृक्षों को नीचे डालना चाहिए। जरूरतमदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान दें। "ॐ नमः शिवाय" तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप भी करें तो अतिउत्तम होगा ।
सोमवती अमावस्या व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। उसने अपने सभी पुत्रों का विवाह कर दिया लेकिन अपनी पुत्री के विवाह को लेकर वह चिंतित रहता था क्योंकि उसकी कुंडली में वैधव्य योग था। एक दिन एक विद्वान ब्राह्मण ने साहूकार को बताया कि यदि उसकी पुत्री सोना नाम की पतिव्रता और पुण्यात्मा धोबिन का आशीर्वाद प्राप्त कर ले, तो उसका यह दोष दूर हो सकता है। साहूकार का सबसे छोटा पुत्र अपनी बहन को लेकर सोना धोबिन के घर की ओर निकल पड़ा। यात्रा के दौरान वे एक नदी किनारे विश्राम करने लगे। वहीं एक वृक्ष पर गिद्ध का घोंसला था। तभी एक विषैला सांप घोंसले में मौजूद गिद्ध के बच्चों को खाने के लिए पहुंच गया। साहूकार की पुत्री ने साहस दिखाते हुए सांप को मार दिया और गिद्ध के बच्चों की रक्षा की।
जब गिद्ध लौटकर आए और उन्हें पूरी घटना का पता चला तो वे प्रसन्न हुए। उन्होंने उस कन्या को सोना धोबिन के घर तक पहुंचने का मार्ग बता दिया। कन्या कई महीनों तक निष्ठापूर्वक सोना धोबिन की सेवा करती रही। उसकी सेवा और समर्पण से प्रसन्न होकर धोबिन ने उसे आशीर्वाद दिया तथा अपनी मांग का सिंदूर उसकी मांग में भर दिया। इसके प्रभाव से कन्या का दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया।
इसके बाद सोना धोबिन ने उसे सोमवती अमावस्या व्रत का महत्व और विधान भी बताया। घर लौटते समय सोमवती अमावस्या के दिन कन्या ने पीपल वृक्ष की श्रद्धापूर्वक 108 परिक्रमा की और पूजा-अर्चना की। कथा के अनुसार जब उसका विवाह हुआ, तो एक समय उसके पति के प्राण संकट में पड़ गए। लेकिन सोमवती अमावस्या व्रत और पीपल पूजा के पुण्य प्रभाव से उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हो गया। तभी से इस व्रत को अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु प्रदान करने वाला माना जाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था
सोमवती अमावस्या केवल एक व्रत नहीं बल्कि श्रद्धा, सौभाग्य और भगवान की कृपा प्राप्त करने का पावन अवसर माना जाता है। ये पितरों की कृपा प्राप्त का अवसर होता है। अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण कर आशीर्वाद लेने से जीवन में चल रही समस्याओं का समाधान होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। मान्यतानुसार अधिक मास में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या पर सच्चे मन से की गई पूजा, व्रत और दान से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
15 जून को सोमवती अमावस्या: यहां जानें संपूर्ण महात्म्य
सनातन धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त किये जाने वाले श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण इत्यादि के लिए जाना जाता है। लेकिन इसका महत्व तब और अधिक हो जाता है जब ये तिथि सोमवार को पड़ती है। इसीलिए सोमवती अमावस्या कहा जाता है, जो इस बार 15 जून को मनाई जाएगी। चूंकि अभी ज्येष्ठ अधिक मास चल रहा है जिसे पुरुषोतम या मल मास के नाम से भी जाना जाता है, इसलिए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अमावस्या का और भीअधिक महत्व बढ़ गया है जो कई गुना पुण्यफलों को देने वाला है ।
क्या है सोमवती अमावस्या का महत्व?
मान्यतानुसार सोमवती अमावस्या के दिन भगवान नारायण, महादेव, पीपल वृक्ष और पितरों के निमित्त पूजन करने का विधान है। पुरुषोत्तम मास में नारायण की पूजा को अधिक महत्व दिया गया है । मोक्ष के देवता महादेव मृत आत्माओं को सद्गति देते हैं । साथ ही पितरों के निमित्त पूजन और पिंड दान इत्यादि कर्म से पूर्वज संतुष्ट होते हैं। इसलिए अमावस्या तिथि पर पीपल के वृक्ष में जल, कच्चा दूध, काले तिल अवश्य चढ़ाने चाहिए। भगवान विष्णु की धूप-दीप, पुष्प, रोली, सफेद तिल, केले का फल, शक़्कर, मुनक्का, गुड़ आदि से पूजन करना चाहिए। साथ ही शिवलिंग पर जल, पंचामृत, काले तिल, गन्ने का रस, भस्म, बेल, शमी, आक के पत्ते, लाल व सफेद पुष्प, चंदन आदि से पूजन कर खीर का भोग लगाना चाहिए।
सोमवती अमावस्या पर क्या करें, पितृ पूजन कैसे करें ?
प्रातः काल सभी दैनिक कार्य से निवृत हो कर स्नान आदि के बाद भोजन बना कर विशेष रूप से सब्जी में तोरई, उड़द की दाल सहित मिष्ठान आदि बना कर भोजन पूर्ण करना चाहिए। संभव हो तो किसी ब्राह्मण को भोजन करा कर दक्षिणा आदि से संतुष्ट करना चाहिए । इसके साथ ही तर्पण इत्यादि की विधि पूर्ण करके कौवे, चील आदि पक्षियों को खाद्य सामग्री डालनी चाहिए। चींटी इत्यादि के लिए आटा भून कर चीनी अथवा गोले का बरुदा मिलाकर पीपल, बेल, बरगद आदि वृक्षों को नीचे डालना चाहिए। जरूरतमदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान दें। "ॐ नमः शिवाय" तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप भी करें तो अतिउत्तम होगा ।
सोमवती अमावस्या व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। उसने अपने सभी पुत्रों का विवाह कर दिया लेकिन अपनी पुत्री के विवाह को लेकर वह चिंतित रहता था क्योंकि उसकी कुंडली में वैधव्य योग था। एक दिन एक विद्वान ब्राह्मण ने साहूकार को बताया कि यदि उसकी पुत्री सोना नाम की पतिव्रता और पुण्यात्मा धोबिन का आशीर्वाद प्राप्त कर ले, तो उसका यह दोष दूर हो सकता है। साहूकार का सबसे छोटा पुत्र अपनी बहन को लेकर सोना धोबिन के घर की ओर निकल पड़ा। यात्रा के दौरान वे एक नदी किनारे विश्राम करने लगे। वहीं एक वृक्ष पर गिद्ध का घोंसला था। तभी एक विषैला सांप घोंसले में मौजूद गिद्ध के बच्चों को खाने के लिए पहुंच गया। साहूकार की पुत्री ने साहस दिखाते हुए सांप को मार दिया और गिद्ध के बच्चों की रक्षा की।
जब गिद्ध लौटकर आए और उन्हें पूरी घटना का पता चला तो वे प्रसन्न हुए। उन्होंने उस कन्या को सोना धोबिन के घर तक पहुंचने का मार्ग बता दिया। कन्या कई महीनों तक निष्ठापूर्वक सोना धोबिन की सेवा करती रही। उसकी सेवा और समर्पण से प्रसन्न होकर धोबिन ने उसे आशीर्वाद दिया तथा अपनी मांग का सिंदूर उसकी मांग में भर दिया। इसके प्रभाव से कन्या का दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया।
इसके बाद सोना धोबिन ने उसे सोमवती अमावस्या व्रत का महत्व और विधान भी बताया। घर लौटते समय सोमवती अमावस्या के दिन कन्या ने पीपल वृक्ष की श्रद्धापूर्वक 108 परिक्रमा की और पूजा-अर्चना की। कथा के अनुसार जब उसका विवाह हुआ, तो एक समय उसके पति के प्राण संकट में पड़ गए। लेकिन सोमवती अमावस्या व्रत और पीपल पूजा के पुण्य प्रभाव से उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हो गया। तभी से इस व्रत को अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु प्रदान करने वाला माना जाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था
सोमवती अमावस्या केवल एक व्रत नहीं बल्कि श्रद्धा, सौभाग्य और भगवान की कृपा प्राप्त करने का पावन अवसर माना जाता है। ये पितरों की कृपा प्राप्त का अवसर होता है। अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण कर आशीर्वाद लेने से जीवन में चल रही समस्याओं का समाधान होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। मान्यतानुसार अधिक मास में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या पर सच्चे मन से की गई पूजा, व्रत और दान से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं।