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आ रही है योगिनी एकादशी, जानें व्रत का महत्व, कथा, पूजा विधि और नियम

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक मानी जाती है। इस बार यह पावन दिन 10 जुलाई को है । धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस एकादशी का व्रत रखते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

 

योगिनी एकादशी का महत्व

 

धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पिछले जन्मों और वर्तमान जीवन के पापों का क्षय होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो रोग, मानसिक तनाव या किसी कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हों। सच्चे मन से किया गया यह व्रत भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करता है और जीवन के कष्टों को दूर करता है।

 

योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा

 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व पूछा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें योगिनी एकादशी की कथा सुनाई।

 

प्राचीन काल में अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके पास हेममाली नाम का एक यक्ष था, जिसका कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से सुगंधित पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करना था। हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यंत प्रेम करता था।

 

एक दिन वह पत्नी के प्रेम में इतना मग्न हो गया कि समय पर पुष्प लेकर कुबेर के पास नहीं पहुंचा। उधर भगवान शिव की पूजा का समय निकल गया। जब कुबेर को इसका कारण पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और हेममाली को श्राप दे दिया कि वह कोढ़ रोग से पीड़ित होकर अपनी पत्नी से दूर जंगलों में भटकता रहे।

 

श्राप के प्रभाव से हेममाली का शरीर कोढ़ से ग्रस्त हो गया। वह अत्यंत दुखी होकर हिमालय की ओर भटकते-भटकते महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा। महर्षि ने उसकी व्यथा सुनकर उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

 

हेममाली ने पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। भगवान विष्णु की कृपा से उसका कोढ़ रोग समाप्त हो गया और उसे पुनः सुख, सम्मान तथा अपनी पत्नी का साथ प्राप्त हुआ। तभी से यह मान्यता प्रचलित है कि योगिनी एकादशी का व्रत बड़े से बड़े पाप और रोगों का भी नाश कर देता है।

 

योगिनी एकादशी की पूजा विधि

 

योगिनी एकादशी के दिन श्रद्धालु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत, मौसमी फल और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीहरि की कथा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। रात्रि में भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करने का विशेष महत्व बताया गया है।

 

व्रत के नियम

 

योगिनी एकादशी के दिन सात्विक जीवनशैली अपनाना आवश्यक माना गया है। श्रद्धालुओं को क्रोध, झूठ, चुगली और तामसिक विचारों से दूर रहना चाहिए। इस दिन चावल और अन्य अनाज का सेवन वर्जित माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निर्जल, जल या फलाहार व्रत रख सकते हैं। पूरे दिन भगवान विष्णु का ध्यान और नाम-स्मरण करते हुए संयम का पालन करना चाहिए।

 

एकादशी व्रत का पारण कैसे करें?

 

एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। हरिवासर (प्रारंभिक लगभग 6 घंटे) समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलना शुभ माना गया है। पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, उन्हें भोग अर्पित करें और आवश्यकतानुसार दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत का समापन करें। धार्मिक मान्यता है कि विधिपूर्वक पारण करने से ही एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

 

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

 

देशभर में लाखों श्रद्धालु योगिनी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ रखते हैं। उनका मानना है कि भगवान विष्णु की कृपा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, रोगों से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यही कारण है कि आषाढ़ मास की यह एकादशी भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त करने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक मानी जाती है।

 

:- लता रानी

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आ रही है योगिनी एकादशी, जानें व्रत का महत्व, कथा, पूजा विधि और नियम

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक मानी जाती है। इस बार यह पावन दिन 10 जुलाई को है । धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस एकादशी का व्रत रखते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

 

योगिनी एकादशी का महत्व

 

धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पिछले जन्मों और वर्तमान जीवन के पापों का क्षय होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो रोग, मानसिक तनाव या किसी कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हों। सच्चे मन से किया गया यह व्रत भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करता है और जीवन के कष्टों को दूर करता है।

 

योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा

 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व पूछा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें योगिनी एकादशी की कथा सुनाई।

 

प्राचीन काल में अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके पास हेममाली नाम का एक यक्ष था, जिसका कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से सुगंधित पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करना था। हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यंत प्रेम करता था।

 

एक दिन वह पत्नी के प्रेम में इतना मग्न हो गया कि समय पर पुष्प लेकर कुबेर के पास नहीं पहुंचा। उधर भगवान शिव की पूजा का समय निकल गया। जब कुबेर को इसका कारण पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और हेममाली को श्राप दे दिया कि वह कोढ़ रोग से पीड़ित होकर अपनी पत्नी से दूर जंगलों में भटकता रहे।

 

श्राप के प्रभाव से हेममाली का शरीर कोढ़ से ग्रस्त हो गया। वह अत्यंत दुखी होकर हिमालय की ओर भटकते-भटकते महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा। महर्षि ने उसकी व्यथा सुनकर उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

 

हेममाली ने पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। भगवान विष्णु की कृपा से उसका कोढ़ रोग समाप्त हो गया और उसे पुनः सुख, सम्मान तथा अपनी पत्नी का साथ प्राप्त हुआ। तभी से यह मान्यता प्रचलित है कि योगिनी एकादशी का व्रत बड़े से बड़े पाप और रोगों का भी नाश कर देता है।

 

योगिनी एकादशी की पूजा विधि

 

योगिनी एकादशी के दिन श्रद्धालु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत, मौसमी फल और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीहरि की कथा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। रात्रि में भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करने का विशेष महत्व बताया गया है।

 

व्रत के नियम

 

योगिनी एकादशी के दिन सात्विक जीवनशैली अपनाना आवश्यक माना गया है। श्रद्धालुओं को क्रोध, झूठ, चुगली और तामसिक विचारों से दूर रहना चाहिए। इस दिन चावल और अन्य अनाज का सेवन वर्जित माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निर्जल, जल या फलाहार व्रत रख सकते हैं। पूरे दिन भगवान विष्णु का ध्यान और नाम-स्मरण करते हुए संयम का पालन करना चाहिए।

 

एकादशी व्रत का पारण कैसे करें?

 

एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। हरिवासर (प्रारंभिक लगभग 6 घंटे) समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलना शुभ माना गया है। पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, उन्हें भोग अर्पित करें और आवश्यकतानुसार दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत का समापन करें। धार्मिक मान्यता है कि विधिपूर्वक पारण करने से ही एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

 

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

 

देशभर में लाखों श्रद्धालु योगिनी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ रखते हैं। उनका मानना है कि भगवान विष्णु की कृपा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, रोगों से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यही कारण है कि आषाढ़ मास की यह एकादशी भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त करने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक मानी जाती है।

 

:- लता रानी