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श्री जगन्नाथ रथ यात्रा : आइये मन के भावों से करें यात्रा का अलौकिक दर्शन

भारत के पावन चार धामों में से तीसरे स्थान पर ओडिशा के जगन्नाथ पुरी धाम का नाम है। लेकिन हमारी सांसारिक माया मोह में आसक्त हमारा चित्त नहीं सोच पाता कि हमें धरती के इन पुण्य तीर्थस्थानों पर भी जाते रहना है । मन में ख्याल आता भी है तो हम कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने यात्रा टालते रहते हैं । ऐसे में भगवान भी मंदिर में बैठे- बैठे सोचते हैं कि मैंने संसार के जीवों के लिए इतनी सुविधाएं कर दीं, साधु- संतों के माध्यम से प्रेरणा दी, वेद-पुराण में महिमा दी, फिर भी मेरे द्वारा रचित जीव ही हमारे दर्शनों से वंचित रहता है । ऐसे में करुणा निधान भगवान जगन्नाथ संसार को दर्शन देने के लिए स्वयं अपने स्थान से बाहर आते हैं और रथ पर सवार हो कर पूरे नगर का भ्रमण करते हैं। भगवान के साक्षात मूल विग्रहों को तीन रथों के माध्यम से शोभा यात्रा के रूप में जगन्नाथ रथ यात्रा हर वर्ष निकाले जाने की परंपरा है ।

 

ओडिशा में पुरी क्षेत्र का महत्त्व

 

जगन्नाथ, जो इस सम्पूर्ण जगत के नाथ हैं और पुरी - जहाँ सब की आस पूरी होती है। भारत वर्ष में मनाए जाने वाले महोत्सवों में श्री जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा की रस्सी खींचने का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो अपनी बेहतरीन नक्काशी व भव्यता लिए प्रसिद्ध है। समूचे पुरी क्षेत्र की रथोत्सव के समय छटा निराली होती है। जहां प्रभु जगन्नाथ को अपनी जन्मभूमि और बहन सुभद्रा को मायके का मोह यहां खींच लाता है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचने का मौका भी मिलता है।

 

जगन्नाथ रथ यात्रा का भव्य उत्सव 

 

रथ यात्रा दस दिन तक चलने वाला महोत्सव होता है। इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और देवी सुभद्रा के रथों का निर्माण शुरू होने से हो जाता है। यहाँ भक्ति का ऐसा सागर देखने को मिलता है जहाँ प्रेम, परिवार, संबंध और विश्वास है और यह सब एक साथ श्री मंदिर की विग्रह प्रतिमाओं में देखने को मिलता है। जहाँ प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई वीर बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी के साथ विराजमान हैं। कहा जाता है- भगवान कृष्ण के जितने भी स्वरुप हैं या अन्य देवी देवताओं के जितने भी रूप हैं फिर चाहे वह किसी भी मंदिर में हों..... परन्तु एक बार अगर प्राण प्रतिष्ठा हो गई, तो मूर्ति को उसकी जगह से नहीं हिलाया जा सकता और प्रतिमा मंदिर से बाहर नहीं आ सकती। किंतु सिर्फ जगन्नाथ जी ही अपने श्री मंदिर से बाहर निकलते हैं और रथ में सवार हो कर अपने दर्शन से सब को तृप्त करते हैं। अर्थात भगवान ने यह विधान स्वयं अपने लिए रचा है । वेद- पुराणों और शास्त्र में ऐसा वर्णित है कि सभी देवी- देवता महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा में अदृश्य या सूक्षम रूप से उपस्थित होते हैं।

 

क्या कहती है पौराणिक कथा ?

 

क्या आप जानते हैं कि हर साल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माता सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा एक विशेष प्रायोजन से आयोजित होती है ? इसके पीछे भाई-बहन के असीम प्रेम की भावनात्मक कथा है। एक बार माता सुभद्रा का मन पुरी नगरी घूमने का हुआ। उन्होंने अपने दोनों भाइयों-श्रीकृष्ण यानि जगन्नाथ जी और बलभद्र जी से ये इच्छा जताई। बस फिर क्या था! लाडली बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई भव्य रथों पर सवार होकर निकल पड़े अपनी मौसी के घर, जिसे हम 'गुंडिचा मंदिर' कहते हैं।

 

16 जुलाई से शुरू होगी रथ यात्रा

 

हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 16 जुलाई 2026 को है। इस रथ यात्रा में महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी के साथ प्रतिष्ठित विग्रह स्वरुप में श्री मंदिर से निकल कर अपनी मौसी के घर अर्थात गुंडीचा मंदिर में जाते हैं और रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी तिथि को महालक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए यहां दर्शन करने आती हैं। भगवान अपनी लीला से सन्देश दे रहे हैं। प्रभु का यहां भाई-बहन से प्रेम हैं, अपनी पत्नी से भी प्रेम बंधन है और अपनी मौसी से भी पूर्ण रिश्ता निभाते हैं । और सभी लोगों को दर्शन देकर भक्तों पर भी कृपा करते हैं।

 

क्या है जगन्नाथ जी के रथ की विशेषता ?

 

हर साल तीन रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है, इसलिए सबसे पहले नीम के पेड़ और दूसरे उन पेड़ों की पहचान की जाती है जिनसे रथ के विभिन्न हिस्सों को बनाया जाता है। किस रथ में कितने वृक्षों की आवश्यकता होगी, कितनी लकड़ी किसमें लगेगी उनका आकार व संख्या सब पहले से निर्धारित रहता है। रथयात्रा उत्सव के कई चरण होते हैं। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ होकर 58 दिनों तक चलता है। इसको परंपरागत कारीगर ही बनाते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे करते आ रहे हैं। इसके लिये 45, 44 व 43 फीट ऊंचे तीन रथ तैयार किए जाते हैं। प्रभु जगन्नाथ का रथ नंदी घोष 16 पहियों का है जिसके हर पहिए की ऊंचाई 6 फुट होती है ।  बलभद्र जी का रथ ‘तालध्वज’ कहलाता है और इसमें 14 पहिये होते है जिसकी ऊंचाई 6 फिट आठ इंच होती है । वहीं सुभद्रा देवी का रथ ‘देवदलन’ है जिसे 12 पहियों से बनाया जाता है और इसकी भी ऊंचाई 6 फिट आठ इंच होती है। रथों को सजाने के लिए लगभग 1090 मीटर कपड़ा लगता है। रथों को लाल वस्त्रों के अलावा जगन्नाथ जी के रथ को पीले वस्त्रों से, बलभद्र जी के रथ को हरे वस्त्रों से और सुभद्रा जी के रथ को काले वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है।

 

इन रथों के भी होते हैं सारथी

 

जगन्नाथ जी के रथ में चार सफेद रंग के घोड़े लगते हैं जिनका नाम- शंख, बलाखा, श्वेता और हरियाश्व हैं। बलदेव जी के घोड़े काले रंग के हैं और इन चारों का नाम है, तिबरा, गोहरा, दीर्घाश्रम और श्वमानव । देवी सुभद्रा के रथ के चार घोड़े लाल रंग के हैं जिन्हें रोचिक, मोचिक, जित और उपराजित कहते हैं। इसके अलावा रथ के लिए विशेष द्वारपाल व सारथी भी होते हैं। रथ को चलाने वाले सारथी का नाम दारुक कहलाता है जो जगन्नाथ जी का रथ चलाते हैं। मालती नाम के सारथी बलदेव जी का रथ चलाते हैं और अर्जुन नाम के सारथी सुभद्रा जी का रथ चलाते हैं।

 

छोटी से छोटी बात का रखते हैं ख्याल

 

रथों पर लगाने के लिए लकड़ी से ही अन्य देवों की मूर्तियां भी तैयार की जाती हैं। किस देव की मूर्ति किस रथ में होगी यह पहले से ही तय रहता है। रथों को खींचने के लिए चार मोटे रस्से लगे होते हैं जिसमें जगन्नाथ जी का रथ शंखचूड़ नामक रस्सी से खिंचा जाता है, बसुखि (वासुकी) नाम की रस्सी से बलदेव जी का रथ खींचा जाता है और स्वर्णचूढ़ नामक रस्सी से देवी सुभद्रा का रथ खींचा जाता है। इसी तरह से रथों पर लगने वाले ध्वजों के भी अलग-अलग नाम होते हैं जिसमें जगन्नाथ जी के रथ की ध्वजा का नाम है त्रिलोक्यमोहिणी है, बलदेव जी की ध्वजा का नाम उन्नानी और देवी सुभद्रा के रथ की ध्वजा का नाम नादम्बिका है। अगर इन रथों में रखे भगवान के शस्त्रों की बात करें तो जगन्नाथ जी के रथ में शंख और चक्र होते हैं, बलदेव जी के रथ में हल और मुसल होते है और सुभद्रा जी के रथ में पदम् और कल्हार नामक शस्त्र होते हैं। ये तीनो रथ चार हजार टुकड़ों से बनाए जाते हैं । साथ ही इन तीनो रथों की रक्षा करने वाले रक्षक भी नियुक्त किये जाते हैं जिसमें जगन्नाथ जी के रथ में गरुड़, बलराम जी और सुभद्रा जी के रथ में वासुदेव हैं।

 

रथ निर्माण में बेहतरीन नक्काशी का प्रयोग

 

भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता। इन रथों की नक्काशी उपनिषद के आधार पर की जाती है क्योंकि उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य का शरीर उपनिषद के समान है। जैसे शरीर एक रथ के समान, बुद्धि सारथि के समान और मन, लगाम और इन्द्रियां घोड़े के समान हैं।  इन तीनों रथों का निर्माण वास्तु शास्त्र और शिल्पकला के आधार पर किया जाता है। प्रति वर्ष नये रथ बनाये जाते हैं और रथ यात्रा के बाद रथ को खोल दिया जाता है और सभी चार हज़ार लकड़ियां महाप्रभु जगन्नाथ जी की रसोई में प्रसाद बनाने में इस्तेमाल की जाती हैं । इस रसोई की खासियत है कि यहां एक दिन में लगभग एक लाख लोगों का खाना एक साथ बनता है। इन रथों को बनाने में हर छोटी से छोटी चीज़ का ध्यान रखते हुए इन रथों का निर्माण किया जाता है। ये सब सुनकर ही मन भाव-विभोर हो जाता है। वाकई में, धन्य हैं श्री जगन्नाथ जी के भक्त और हमारा सनातन धर्म।

 

जगन्नाथ रथ यात्रा के अलौकिक दर्शन

 

रथ यात्रा की शुरुआत में एक के बाद एक पुष्पों से मंडित तीनों विग्रहों को रथ पर लाया जाता है। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज या उनके प्रतिनिधि रथों को सोने की झाड़ू से साफ करते हैं और चंदन छिड़कते हैं। इस यात्रा में सबसे पहले श्री बलराम जी का रथ होता हैं । इसके पश्चात देवी सुभद्रा का रथ और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ होता हैं। इन रथों के आगे भजन- कीर्तन करते भक्तों की टोलियां चलती हैं। रथों की रस्सी को खींचना या हाथ लगाना अत्यंत शुभ माना जाता हैं। जो व्यक्ति ऐसा नही कर पाता, वह केवल दर्शन मात्र से ही स्वयं को प्रसन्न कर लेते हैं क्योंकि भगवान जगन्नाथ के दर्शन ही बड़े सौभाग्य की बात है। तीनों रथ संध्याकाल तक गुंडीचा मंदिर के समीप पहुंचते है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलराम और देवी सुभद्रा यहीं विराजते हैं यही पर उनकी पूजा-अर्चना की जाती हैं। महाप्रभु जगन्नाथ जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं का जमावड़ा इस मंदिर में लगा रहता हैं। कड़ी धूप में भी लाखों की संख्या में भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

 

वापसी यात्रा कहलाती है ‘बाहुडा यात्रा’

 

आषाढ़ शुक्ल दशमी को पुनः अपने-अपने रथों में विराजमान होकर वे अपने मूल मंदिर को लौटते हैं । हजारों की सख्या में श्रद्धालुओं द्वारा रथों को खींचते देखने का अवसर श्रद्धालुओं को एक बार फिर मिलता हैं और इस वापसी यात्रा को ‘बाहुडायात्रा’ कहा जाता हैं। देवी महालक्ष्मी अपने जेठ बलभद्र और नन्द सुभद्रा का भव्य स्वागत करती हैं । महाप्रभु जगन्नाथ जी के चरण स्पर्श कर श्री मंदिर में पुनः मिलती हैं। फिर जगन्नाथ जी देवी लक्ष्मी को भेंट स्वरुप रसगुल्ला अर्पित करते हैं और इसी कारण इस दिन भगवान को रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है और यहाँ पर आए सभी भक्तों को बांटा जाता है।

 

पुरी में रथ महोत्सव एक वार्षिक अनुष्ठान की तरह है। इस रथ यात्रा से भक्तजनों को अपने आराध्य देव की एक झलक मिल जाती है। जैसे भगवान आम जनता से मिलने के लिए अपने मंदिर से बाहर आये हों । इस रथ यात्रा ने इतनी महिमा प्राप्त कर ली है, कि अब यह केवल पुरी तक ही सीमित नहीं है। इसी प्रकार के रथ महोत्सव देश के अलग-अलग स्थानों पर तथा विदेशों में भी मनाए जाने लगे हैं।

 

:- रमन शर्मा

 

 

 

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भारत के पावन चार धामों में से तीसरे स्थान पर ओडिशा के जगन्नाथ पुरी धाम का नाम है। लेकिन हमारी सांसारिक माया मोह में आसक्त हमारा चित्त नहीं सोच पाता कि हमें धरती के इन पुण्य तीर्थस्थानों पर भी जाते रहना है । मन में ख्याल आता भी है तो हम कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने यात्रा टालते रहते हैं । ऐसे में भगवान भी मंदिर में बैठे- बैठे सोचते हैं कि मैंने संसार के जीवों के लिए इतनी सुविधाएं कर दीं, साधु- संतों के माध्यम से प्रेरणा दी, वेद-पुराण में महिमा दी, फिर भी मेरे द्वारा रचित जीव ही हमारे दर्शनों से वंचित रहता है । ऐसे में करुणा निधान भगवान जगन्नाथ संसार को दर्शन देने के लिए स्वयं अपने स्थान से बाहर आते हैं और रथ पर सवार हो कर पूरे नगर का भ्रमण करते हैं। भगवान के साक्षात मूल विग्रहों को तीन रथों के माध्यम से शोभा यात्रा के रूप में जगन्नाथ रथ यात्रा हर वर्ष निकाले जाने की परंपरा है ।

 

ओडिशा में पुरी क्षेत्र का महत्त्व

 

जगन्नाथ, जो इस सम्पूर्ण जगत के नाथ हैं और पुरी - जहाँ सब की आस पूरी होती है। भारत वर्ष में मनाए जाने वाले महोत्सवों में श्री जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा की रस्सी खींचने का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो अपनी बेहतरीन नक्काशी व भव्यता लिए प्रसिद्ध है। समूचे पुरी क्षेत्र की रथोत्सव के समय छटा निराली होती है। जहां प्रभु जगन्नाथ को अपनी जन्मभूमि और बहन सुभद्रा को मायके का मोह यहां खींच लाता है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचने का मौका भी मिलता है।

 

जगन्नाथ रथ यात्रा का भव्य उत्सव 

 

रथ यात्रा दस दिन तक चलने वाला महोत्सव होता है। इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और देवी सुभद्रा के रथों का निर्माण शुरू होने से हो जाता है। यहाँ भक्ति का ऐसा सागर देखने को मिलता है जहाँ प्रेम, परिवार, संबंध और विश्वास है और यह सब एक साथ श्री मंदिर की विग्रह प्रतिमाओं में देखने को मिलता है। जहाँ प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई वीर बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी के साथ विराजमान हैं। कहा जाता है- भगवान कृष्ण के जितने भी स्वरुप हैं या अन्य देवी देवताओं के जितने भी रूप हैं फिर चाहे वह किसी भी मंदिर में हों..... परन्तु एक बार अगर प्राण प्रतिष्ठा हो गई, तो मूर्ति को उसकी जगह से नहीं हिलाया जा सकता और प्रतिमा मंदिर से बाहर नहीं आ सकती। किंतु सिर्फ जगन्नाथ जी ही अपने श्री मंदिर से बाहर निकलते हैं और रथ में सवार हो कर अपने दर्शन से सब को तृप्त करते हैं। अर्थात भगवान ने यह विधान स्वयं अपने लिए रचा है । वेद- पुराणों और शास्त्र में ऐसा वर्णित है कि सभी देवी- देवता महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा में अदृश्य या सूक्षम रूप से उपस्थित होते हैं।

 

क्या कहती है पौराणिक कथा ?

 

क्या आप जानते हैं कि हर साल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माता सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा एक विशेष प्रायोजन से आयोजित होती है ? इसके पीछे भाई-बहन के असीम प्रेम की भावनात्मक कथा है। एक बार माता सुभद्रा का मन पुरी नगरी घूमने का हुआ। उन्होंने अपने दोनों भाइयों-श्रीकृष्ण यानि जगन्नाथ जी और बलभद्र जी से ये इच्छा जताई। बस फिर क्या था! लाडली बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई भव्य रथों पर सवार होकर निकल पड़े अपनी मौसी के घर, जिसे हम 'गुंडिचा मंदिर' कहते हैं।

 

16 जुलाई से शुरू होगी रथ यात्रा

 

हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 16 जुलाई 2026 को है। इस रथ यात्रा में महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी के साथ प्रतिष्ठित विग्रह स्वरुप में श्री मंदिर से निकल कर अपनी मौसी के घर अर्थात गुंडीचा मंदिर में जाते हैं और रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी तिथि को महालक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए यहां दर्शन करने आती हैं। भगवान अपनी लीला से सन्देश दे रहे हैं। प्रभु का यहां भाई-बहन से प्रेम हैं, अपनी पत्नी से भी प्रेम बंधन है और अपनी मौसी से भी पूर्ण रिश्ता निभाते हैं । और सभी लोगों को दर्शन देकर भक्तों पर भी कृपा करते हैं।

 

क्या है जगन्नाथ जी के रथ की विशेषता ?

 

हर साल तीन रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है, इसलिए सबसे पहले नीम के पेड़ और दूसरे उन पेड़ों की पहचान की जाती है जिनसे रथ के विभिन्न हिस्सों को बनाया जाता है। किस रथ में कितने वृक्षों की आवश्यकता होगी, कितनी लकड़ी किसमें लगेगी उनका आकार व संख्या सब पहले से निर्धारित रहता है। रथयात्रा उत्सव के कई चरण होते हैं। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ होकर 58 दिनों तक चलता है। इसको परंपरागत कारीगर ही बनाते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे करते आ रहे हैं। इसके लिये 45, 44 व 43 फीट ऊंचे तीन रथ तैयार किए जाते हैं। प्रभु जगन्नाथ का रथ नंदी घोष 16 पहियों का है जिसके हर पहिए की ऊंचाई 6 फुट होती है ।  बलभद्र जी का रथ ‘तालध्वज’ कहलाता है और इसमें 14 पहिये होते है जिसकी ऊंचाई 6 फिट आठ इंच होती है । वहीं सुभद्रा देवी का रथ ‘देवदलन’ है जिसे 12 पहियों से बनाया जाता है और इसकी भी ऊंचाई 6 फिट आठ इंच होती है। रथों को सजाने के लिए लगभग 1090 मीटर कपड़ा लगता है। रथों को लाल वस्त्रों के अलावा जगन्नाथ जी के रथ को पीले वस्त्रों से, बलभद्र जी के रथ को हरे वस्त्रों से और सुभद्रा जी के रथ को काले वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है।

 

इन रथों के भी होते हैं सारथी

 

जगन्नाथ जी के रथ में चार सफेद रंग के घोड़े लगते हैं जिनका नाम- शंख, बलाखा, श्वेता और हरियाश्व हैं। बलदेव जी के घोड़े काले रंग के हैं और इन चारों का नाम है, तिबरा, गोहरा, दीर्घाश्रम और श्वमानव । देवी सुभद्रा के रथ के चार घोड़े लाल रंग के हैं जिन्हें रोचिक, मोचिक, जित और उपराजित कहते हैं। इसके अलावा रथ के लिए विशेष द्वारपाल व सारथी भी होते हैं। रथ को चलाने वाले सारथी का नाम दारुक कहलाता है जो जगन्नाथ जी का रथ चलाते हैं। मालती नाम के सारथी बलदेव जी का रथ चलाते हैं और अर्जुन नाम के सारथी सुभद्रा जी का रथ चलाते हैं।

 

छोटी से छोटी बात का रखते हैं ख्याल

 

रथों पर लगाने के लिए लकड़ी से ही अन्य देवों की मूर्तियां भी तैयार की जाती हैं। किस देव की मूर्ति किस रथ में होगी यह पहले से ही तय रहता है। रथों को खींचने के लिए चार मोटे रस्से लगे होते हैं जिसमें जगन्नाथ जी का रथ शंखचूड़ नामक रस्सी से खिंचा जाता है, बसुखि (वासुकी) नाम की रस्सी से बलदेव जी का रथ खींचा जाता है और स्वर्णचूढ़ नामक रस्सी से देवी सुभद्रा का रथ खींचा जाता है। इसी तरह से रथों पर लगने वाले ध्वजों के भी अलग-अलग नाम होते हैं जिसमें जगन्नाथ जी के रथ की ध्वजा का नाम है त्रिलोक्यमोहिणी है, बलदेव जी की ध्वजा का नाम उन्नानी और देवी सुभद्रा के रथ की ध्वजा का नाम नादम्बिका है। अगर इन रथों में रखे भगवान के शस्त्रों की बात करें तो जगन्नाथ जी के रथ में शंख और चक्र होते हैं, बलदेव जी के रथ में हल और मुसल होते है और सुभद्रा जी के रथ में पदम् और कल्हार नामक शस्त्र होते हैं। ये तीनो रथ चार हजार टुकड़ों से बनाए जाते हैं । साथ ही इन तीनो रथों की रक्षा करने वाले रक्षक भी नियुक्त किये जाते हैं जिसमें जगन्नाथ जी के रथ में गरुड़, बलराम जी और सुभद्रा जी के रथ में वासुदेव हैं।

 

रथ निर्माण में बेहतरीन नक्काशी का प्रयोग

 

भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता। इन रथों की नक्काशी उपनिषद के आधार पर की जाती है क्योंकि उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य का शरीर उपनिषद के समान है। जैसे शरीर एक रथ के समान, बुद्धि सारथि के समान और मन, लगाम और इन्द्रियां घोड़े के समान हैं।  इन तीनों रथों का निर्माण वास्तु शास्त्र और शिल्पकला के आधार पर किया जाता है। प्रति वर्ष नये रथ बनाये जाते हैं और रथ यात्रा के बाद रथ को खोल दिया जाता है और सभी चार हज़ार लकड़ियां महाप्रभु जगन्नाथ जी की रसोई में प्रसाद बनाने में इस्तेमाल की जाती हैं । इस रसोई की खासियत है कि यहां एक दिन में लगभग एक लाख लोगों का खाना एक साथ बनता है। इन रथों को बनाने में हर छोटी से छोटी चीज़ का ध्यान रखते हुए इन रथों का निर्माण किया जाता है। ये सब सुनकर ही मन भाव-विभोर हो जाता है। वाकई में, धन्य हैं श्री जगन्नाथ जी के भक्त और हमारा सनातन धर्म।

 

जगन्नाथ रथ यात्रा के अलौकिक दर्शन

 

रथ यात्रा की शुरुआत में एक के बाद एक पुष्पों से मंडित तीनों विग्रहों को रथ पर लाया जाता है। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज या उनके प्रतिनिधि रथों को सोने की झाड़ू से साफ करते हैं और चंदन छिड़कते हैं। इस यात्रा में सबसे पहले श्री बलराम जी का रथ होता हैं । इसके पश्चात देवी सुभद्रा का रथ और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ होता हैं। इन रथों के आगे भजन- कीर्तन करते भक्तों की टोलियां चलती हैं। रथों की रस्सी को खींचना या हाथ लगाना अत्यंत शुभ माना जाता हैं। जो व्यक्ति ऐसा नही कर पाता, वह केवल दर्शन मात्र से ही स्वयं को प्रसन्न कर लेते हैं क्योंकि भगवान जगन्नाथ के दर्शन ही बड़े सौभाग्य की बात है। तीनों रथ संध्याकाल तक गुंडीचा मंदिर के समीप पहुंचते है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलराम और देवी सुभद्रा यहीं विराजते हैं यही पर उनकी पूजा-अर्चना की जाती हैं। महाप्रभु जगन्नाथ जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं का जमावड़ा इस मंदिर में लगा रहता हैं। कड़ी धूप में भी लाखों की संख्या में भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

 

वापसी यात्रा कहलाती है ‘बाहुडा यात्रा’

 

आषाढ़ शुक्ल दशमी को पुनः अपने-अपने रथों में विराजमान होकर वे अपने मूल मंदिर को लौटते हैं । हजारों की सख्या में श्रद्धालुओं द्वारा रथों को खींचते देखने का अवसर श्रद्धालुओं को एक बार फिर मिलता हैं और इस वापसी यात्रा को ‘बाहुडायात्रा’ कहा जाता हैं। देवी महालक्ष्मी अपने जेठ बलभद्र और नन्द सुभद्रा का भव्य स्वागत करती हैं । महाप्रभु जगन्नाथ जी के चरण स्पर्श कर श्री मंदिर में पुनः मिलती हैं। फिर जगन्नाथ जी देवी लक्ष्मी को भेंट स्वरुप रसगुल्ला अर्पित करते हैं और इसी कारण इस दिन भगवान को रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है और यहाँ पर आए सभी भक्तों को बांटा जाता है।

 

पुरी में रथ महोत्सव एक वार्षिक अनुष्ठान की तरह है। इस रथ यात्रा से भक्तजनों को अपने आराध्य देव की एक झलक मिल जाती है। जैसे भगवान आम जनता से मिलने के लिए अपने मंदिर से बाहर आये हों । इस रथ यात्रा ने इतनी महिमा प्राप्त कर ली है, कि अब यह केवल पुरी तक ही सीमित नहीं है। इसी प्रकार के रथ महोत्सव देश के अलग-अलग स्थानों पर तथा विदेशों में भी मनाए जाने लगे हैं।

 

:- रमन शर्मा