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22 जून से अम्बुबाची मेला, जानिए मां कामख्या और भव्य मेले की महिमा

भारत की आध्यात्मिक और तांत्रिक परंपराओं में अम्बुबाची मेले का विशेष स्थान है। यह मेला शक्ति उपासना का एक अनूठा पर्व माना जाता है, जो हर वर्ष असम की राजधानी गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में आयोजित किया जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु, साधु-संत, तांत्रिक, अघोरी और पर्यटक देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं। पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन देवी शक्ति के साथ ही प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

 

अम्बुबाची मेला क्या है ?

 

अम्बुबाची मेला देवी कामाख्या के वार्षिक रजस्वला (मासिक धर्म) काल का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि वर्ष में एक बार माता कामाख्या तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। इस अवधि में मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और कोई भी नियमित पूजा-अर्चना नहीं होती। हिंदू धर्म में यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति, सृजन और प्रकृति की उर्वरता के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। "अम्बुबाची" शब्द का अर्थ है – जल का उद्गम या पृथ्वी की उर्वरता का जागरण। माना जाता है कि इसी समय वर्षा ऋतु के आगमन के साथ धरती भी नई ऊर्जा प्राप्त करती है।

 

अम्बुबाची मेला कहाँ लगता है ?

 

अम्बुबाची मेला असम के गुवाहाटी शहर में स्थित नीलांचल पर्वत पर बने विश्व प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में आयोजित होता है। यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है । कामाख्या मंदिर की विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक रूप से बनी एक पवित्र शिला और जलधारा की पूजा की जाती है, जिसे देवी शक्ति का स्वरूप माना जाता है।

 

कामाख्या मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव अत्यंत व्याकुल होकर उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के अनेक भाग कर दिए। जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई । मान्यता है कि गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर में माता सती का योनि भाग गिरा था। इसी कारण यह स्थान शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसी पौराणिक विश्वास के कारण यहां स्त्रीत्व और मातृत्व शक्ति का विशेष सम्मान किया जाता है तथा अम्बुबाची पर्व को देवी के रजस्वला होने के रूप में मनाया जाता है।

 

अम्बुबाची मेले का धार्मिक महत्व

 

अम्बुबाची मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और स्त्री शक्ति के सम्मान का उत्सव है। इस दौरान यह संदेश दिया जाता है कि मासिक धर्म कोई अपवित्र अवस्था नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन का आधार है। इस पर्व के दौरान देशभर से आने वाले साधु-संत, नागा साधु, अघोरी और तांत्रिक विशेष साधनाएं करते हैं। तंत्र साधना के लिए कामाख्या धाम को विश्व के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। इसलिए यह मेला तांत्रिक परंपराओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

अम्बुबाची मेले की तारीख

 

इस वर्ष अम्बुबाची मेला 22 जून (ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष अष्टमी) से 26 जून (ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष द्वादशी) तक आयोजित होगा। 22 जून को सुबह से मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे। 25 जून की रात तक गर्भगृह में प्रवेश और पूजा-अर्चना पूरी तरह बंद रहेगी। इस दौरान देवी के विश्राम काल को सम्मान दिया जाता है। 26 जून की सुबह मंदिर के कपाट पुनः खोले जाएंगे। इसके बाद सामान्य भक्त माता के दर्शन कर सकेंगे।

 

विशेष प्रसाद का महत्व

 

मंदिर के पुनः खुलने के बाद श्रद्धालुओं को दो विशेष प्रसाद प्रदान किए जाते हैं -

1. अंगवस्त्र - यह लाल रंग का पवित्र वस्त्र होता है, जिसे देवी की कृपा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

2. अंगोदक - यह गर्भगृह से प्राप्त पवित्र जल होता है, जिसे अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। भक्त इन दोनों प्रसादों को अपने घरों में श्रद्धापूर्वक स्थापित करते हैं।

 

मेले में कैसे हिस्सा लें ?

 

अम्बुबाची मेले के दौरान अत्यधिक भीड़ रहती है। इसलिए यात्रियों को पहले से योजना बनाकर जाना चाहिए।

1. लंबी कतार के लिए तैयार रहें -  मुफ्त दर्शन (Free Queue) में कई बार 5 घंटे या उससे अधिक का समय लग सकता है।

2. विशेष दर्शन पास - जो श्रद्धालु कम समय में दर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए लगभग 501 रुपये का विशेष दर्शन (VIP) पास उपलब्ध कराया जाता है, जिससे प्राथमिकता के आधार पर दर्शन की सुविधा मिलती है।

3. यात्रा की अग्रिम तैयारी करें -  गुवाहाटी में इस समय होटल और परिवहन की मांग बहुत बढ़ जाती है, इसलिए टिकट और आवास की बुकिंग पहले से करना बेहतर होता है।

4. आवश्यक वस्तुएं साथ रखें -  पानी की बोतल, छाता, हल्के कपड़े और आवश्यक दवाइयां साथ रखना उपयोगी रहेगा, क्योंकि जून के महीने में अक्सर असम में वर्षा का आगमन हो जाता है।

 

अम्बुबाची मेले का धार्मिक महत्व

 

अम्बुबाची मेला भारतीय संस्कृति, शक्ति उपासना और प्रकृति के प्रति सम्मान का अद्भुत उदाहरण है। कामाख्या धाम में आयोजित यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्त्री शक्ति और सृजन के महत्व का भी संदेश देता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु माता कामाख्या के दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं।

 

वर्ष 2026 में 22 जून से 26 जून तक आयोजित होने वाला अम्बुबाची मेला श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और सांस्कृतिक अनुभव का एक अनुपम अवसर होगा। माता कामाख्या की कृपा से यह पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे।

 

:- रमन शर्मा

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22 जून से अम्बुबाची मेला, जानिए मां कामख्या और भव्य मेले की महिमा

भारत की आध्यात्मिक और तांत्रिक परंपराओं में अम्बुबाची मेले का विशेष स्थान है। यह मेला शक्ति उपासना का एक अनूठा पर्व माना जाता है, जो हर वर्ष असम की राजधानी गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में आयोजित किया जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु, साधु-संत, तांत्रिक, अघोरी और पर्यटक देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं। पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन देवी शक्ति के साथ ही प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

 

अम्बुबाची मेला क्या है ?

 

अम्बुबाची मेला देवी कामाख्या के वार्षिक रजस्वला (मासिक धर्म) काल का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि वर्ष में एक बार माता कामाख्या तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। इस अवधि में मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और कोई भी नियमित पूजा-अर्चना नहीं होती। हिंदू धर्म में यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति, सृजन और प्रकृति की उर्वरता के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। "अम्बुबाची" शब्द का अर्थ है – जल का उद्गम या पृथ्वी की उर्वरता का जागरण। माना जाता है कि इसी समय वर्षा ऋतु के आगमन के साथ धरती भी नई ऊर्जा प्राप्त करती है।

 

अम्बुबाची मेला कहाँ लगता है ?

 

अम्बुबाची मेला असम के गुवाहाटी शहर में स्थित नीलांचल पर्वत पर बने विश्व प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में आयोजित होता है। यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है । कामाख्या मंदिर की विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक रूप से बनी एक पवित्र शिला और जलधारा की पूजा की जाती है, जिसे देवी शक्ति का स्वरूप माना जाता है।

 

कामाख्या मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव अत्यंत व्याकुल होकर उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के अनेक भाग कर दिए। जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई । मान्यता है कि गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर में माता सती का योनि भाग गिरा था। इसी कारण यह स्थान शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसी पौराणिक विश्वास के कारण यहां स्त्रीत्व और मातृत्व शक्ति का विशेष सम्मान किया जाता है तथा अम्बुबाची पर्व को देवी के रजस्वला होने के रूप में मनाया जाता है।

 

अम्बुबाची मेले का धार्मिक महत्व

 

अम्बुबाची मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और स्त्री शक्ति के सम्मान का उत्सव है। इस दौरान यह संदेश दिया जाता है कि मासिक धर्म कोई अपवित्र अवस्था नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन का आधार है। इस पर्व के दौरान देशभर से आने वाले साधु-संत, नागा साधु, अघोरी और तांत्रिक विशेष साधनाएं करते हैं। तंत्र साधना के लिए कामाख्या धाम को विश्व के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। इसलिए यह मेला तांत्रिक परंपराओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

अम्बुबाची मेले की तारीख

 

इस वर्ष अम्बुबाची मेला 22 जून (ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष अष्टमी) से 26 जून (ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष द्वादशी) तक आयोजित होगा। 22 जून को सुबह से मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे। 25 जून की रात तक गर्भगृह में प्रवेश और पूजा-अर्चना पूरी तरह बंद रहेगी। इस दौरान देवी के विश्राम काल को सम्मान दिया जाता है। 26 जून की सुबह मंदिर के कपाट पुनः खोले जाएंगे। इसके बाद सामान्य भक्त माता के दर्शन कर सकेंगे।

 

विशेष प्रसाद का महत्व

 

मंदिर के पुनः खुलने के बाद श्रद्धालुओं को दो विशेष प्रसाद प्रदान किए जाते हैं -

1. अंगवस्त्र - यह लाल रंग का पवित्र वस्त्र होता है, जिसे देवी की कृपा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

2. अंगोदक - यह गर्भगृह से प्राप्त पवित्र जल होता है, जिसे अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। भक्त इन दोनों प्रसादों को अपने घरों में श्रद्धापूर्वक स्थापित करते हैं।

 

मेले में कैसे हिस्सा लें ?

 

अम्बुबाची मेले के दौरान अत्यधिक भीड़ रहती है। इसलिए यात्रियों को पहले से योजना बनाकर जाना चाहिए।

1. लंबी कतार के लिए तैयार रहें -  मुफ्त दर्शन (Free Queue) में कई बार 5 घंटे या उससे अधिक का समय लग सकता है।

2. विशेष दर्शन पास - जो श्रद्धालु कम समय में दर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए लगभग 501 रुपये का विशेष दर्शन (VIP) पास उपलब्ध कराया जाता है, जिससे प्राथमिकता के आधार पर दर्शन की सुविधा मिलती है।

3. यात्रा की अग्रिम तैयारी करें -  गुवाहाटी में इस समय होटल और परिवहन की मांग बहुत बढ़ जाती है, इसलिए टिकट और आवास की बुकिंग पहले से करना बेहतर होता है।

4. आवश्यक वस्तुएं साथ रखें -  पानी की बोतल, छाता, हल्के कपड़े और आवश्यक दवाइयां साथ रखना उपयोगी रहेगा, क्योंकि जून के महीने में अक्सर असम में वर्षा का आगमन हो जाता है।

 

अम्बुबाची मेले का धार्मिक महत्व

 

अम्बुबाची मेला भारतीय संस्कृति, शक्ति उपासना और प्रकृति के प्रति सम्मान का अद्भुत उदाहरण है। कामाख्या धाम में आयोजित यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्त्री शक्ति और सृजन के महत्व का भी संदेश देता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु माता कामाख्या के दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं।

 

वर्ष 2026 में 22 जून से 26 जून तक आयोजित होने वाला अम्बुबाची मेला श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और सांस्कृतिक अनुभव का एक अनुपम अवसर होगा। माता कामाख्या की कृपा से यह पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे।

 

:- रमन शर्मा