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ब्रज की होली : बसंत पंचमी से धुलंडी तक राधा-कृष्ण की भक्ति

जहां देश के अधिकतर हिस्सों में होली एक-दो दिन या हफ्तेभर मनाई जाती है, वहीं श्रीकृष्ण की पावन ब्रज भूमि में यह पर्व पूरे 40 दिनों तक चलता है। ब्रज की होली 2026 की शुरुआत बसंत पंचमी के साथ हो चुकी है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में यह रंगोत्सव केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और संस्कृति के जीवंत उत्सव की तरह मनाया जाता है जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।

 

ब्रज की होली की औपचारिक शुरुआत मंदिरों में होली का डंडा गाड़ने के साथ होती है। यह संकेत होता है कि अब ब्रज भूमि रंग और उल्लास में डूबने वाली है। पूरे फाल्गुन माह में मंदिरों में ठाकुरजी को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

 

ब्रज की होली श्रीकृष्ण और राधा रानी की लीलाओं से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों संग होली खेलते थे। उसी परंपरा को आज भी बरसाना, नंदगांव, वृंदावन और मथुरा में पूरे श्रद्धा भाव से निभाया जाता है। यहां रंग खेलना भी आराधना का एक रूप माना जाता है। 23 जनवरी को बसंत पंचमी से शुरू हुए होली उत्सव के अंतर्गत कई आयोजन होने हैं ।

 

ब्रज की होली 2026 की प्रमुख तिथियां-

 

24 फरवरी 2026 - लड्डूमार होली – श्रीजी मंदिर, बरसाना

25 फरवरी 2026 - लट्ठमार होली – बरसाना

26 फरवरी 2026 - लट्ठमार होली – नंदगांव

27 फरवरी 2026 - फूलों की होली – बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन

01 मार्च 2026 - छड़ीमार होली – गोकुल

02 मार्च 2026 - रमन रेती होली / विधवा होली – गोकुल व वृंदावन

03 मार्च 2026 - होलिका दहन – द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा

04 मार्च 2026 - धुलंडी – मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव

05 मार्च 2026 - दाऊजी का हुरंगा – दाऊजी मंदिर, मथुरा

 

इस वार्षिक उत्सव का दूसरा चरण शुरू होता है फुलेरा दूज (19 फरवरी 2026) से जो फाल्गुन मास के ही शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होती है । मान्यता है कि इस दिन राधा-कृष्ण ने फूलों की होली खेली थी । इस दिन ब्रज के मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन भगवान कृष्ण को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है और उनके कमर पर फेंटा (एक प्रकार का पटका) बांधा जाता है। यह संकेत है कि अब ठाकुर जी भी होली खेलने के लिए तैयार हैं। फुलेरा दूज को साल का सबसे 'अबूझ मुहूर्त' (सबसे शुभ दिन) माना जाता है अर्थात यह दिन दोषमुक्त होता है, इसलिए विवाह, सगाई और गृह प्रवेश जैसे बड़े कार्यों के लिए इसे सर्वोत्तम माना गया है।

 

पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व:

 

ब्रज होली अब केवल धार्मिक उत्सव नहीं रही, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आकर्षण बन चुकी है। होली के दौरान ब्रज क्षेत्र में पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ती है। स्थानीय बाजार, मंदिर और गलियां रंग, संगीत और लोक परंपराओं से जीवंत हो उठते हैं।

 

ब्रज की होली  रंगों का नहीं, भावनाओं और भक्ति का उत्सव है। 40 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व श्रद्धालुओं को राधा-कृष्ण की लीलाओं से जोड़ता है और भारतीय संस्कृति की अनोखी पहचान प्रस्तुत करता है। यदि आप इस बार होली को केवल खेलना नहीं, बल्कि महसूस करना चाहते हैं, तो ब्रज की होली आपके लिए एक यादगार अनुभव सिद्ध हो सकती है ।

 

होली खेलन आयो श्याम,आज याहि रंग में बोरो री।

कोरे-कोरे कलश मंगाओ,रंग केसर को घोरो री।

मुख ते केशर मलो, करो याहि कारे से गोरो री॥

रंग-बिरंगो करो आज, याहि कारे से गोरो री॥

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

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ब्रज की होली : बसंत पंचमी से धुलंडी तक राधा-कृष्ण की भक्ति

जहां देश के अधिकतर हिस्सों में होली एक-दो दिन या हफ्तेभर मनाई जाती है, वहीं श्रीकृष्ण की पावन ब्रज भूमि में यह पर्व पूरे 40 दिनों तक चलता है। ब्रज की होली 2026 की शुरुआत बसंत पंचमी के साथ हो चुकी है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में यह रंगोत्सव केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और संस्कृति के जीवंत उत्सव की तरह मनाया जाता है जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।

 

ब्रज की होली की औपचारिक शुरुआत मंदिरों में होली का डंडा गाड़ने के साथ होती है। यह संकेत होता है कि अब ब्रज भूमि रंग और उल्लास में डूबने वाली है। पूरे फाल्गुन माह में मंदिरों में ठाकुरजी को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

 

ब्रज की होली श्रीकृष्ण और राधा रानी की लीलाओं से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों संग होली खेलते थे। उसी परंपरा को आज भी बरसाना, नंदगांव, वृंदावन और मथुरा में पूरे श्रद्धा भाव से निभाया जाता है। यहां रंग खेलना भी आराधना का एक रूप माना जाता है। 23 जनवरी को बसंत पंचमी से शुरू हुए होली उत्सव के अंतर्गत कई आयोजन होने हैं ।

 

ब्रज की होली 2026 की प्रमुख तिथियां-

 

24 फरवरी 2026 - लड्डूमार होली – श्रीजी मंदिर, बरसाना

25 फरवरी 2026 - लट्ठमार होली – बरसाना

26 फरवरी 2026 - लट्ठमार होली – नंदगांव

27 फरवरी 2026 - फूलों की होली – बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन

01 मार्च 2026 - छड़ीमार होली – गोकुल

02 मार्च 2026 - रमन रेती होली / विधवा होली – गोकुल व वृंदावन

03 मार्च 2026 - होलिका दहन – द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा

04 मार्च 2026 - धुलंडी – मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव

05 मार्च 2026 - दाऊजी का हुरंगा – दाऊजी मंदिर, मथुरा

 

इस वार्षिक उत्सव का दूसरा चरण शुरू होता है फुलेरा दूज (19 फरवरी 2026) से जो फाल्गुन मास के ही शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होती है । मान्यता है कि इस दिन राधा-कृष्ण ने फूलों की होली खेली थी । इस दिन ब्रज के मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन भगवान कृष्ण को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है और उनके कमर पर फेंटा (एक प्रकार का पटका) बांधा जाता है। यह संकेत है कि अब ठाकुर जी भी होली खेलने के लिए तैयार हैं। फुलेरा दूज को साल का सबसे 'अबूझ मुहूर्त' (सबसे शुभ दिन) माना जाता है अर्थात यह दिन दोषमुक्त होता है, इसलिए विवाह, सगाई और गृह प्रवेश जैसे बड़े कार्यों के लिए इसे सर्वोत्तम माना गया है।

 

पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व:

 

ब्रज होली अब केवल धार्मिक उत्सव नहीं रही, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आकर्षण बन चुकी है। होली के दौरान ब्रज क्षेत्र में पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ती है। स्थानीय बाजार, मंदिर और गलियां रंग, संगीत और लोक परंपराओं से जीवंत हो उठते हैं।

 

ब्रज की होली  रंगों का नहीं, भावनाओं और भक्ति का उत्सव है। 40 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व श्रद्धालुओं को राधा-कृष्ण की लीलाओं से जोड़ता है और भारतीय संस्कृति की अनोखी पहचान प्रस्तुत करता है। यदि आप इस बार होली को केवल खेलना नहीं, बल्कि महसूस करना चाहते हैं, तो ब्रज की होली आपके लिए एक यादगार अनुभव सिद्ध हो सकती है ।

 

होली खेलन आयो श्याम,आज याहि रंग में बोरो री।

कोरे-कोरे कलश मंगाओ,रंग केसर को घोरो री।

मुख ते केशर मलो, करो याहि कारे से गोरो री॥

रंग-बिरंगो करो आज, याहि कारे से गोरो री॥

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव