Sanskar

बरसाना-नंदगांव की साझी ‘समाज गायन’ परंपरा

ब्रज की पवित्र भूमि में फाल्गुन का महीना आते ही वातावरण भक्ति, संगीत और रंगों से भर उठता है। बरसाना के श्रीलाडलीजी मंदिर और नंदगांव के नंदबाबा मंदिर में सदियों पुरानी समाज गायन की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जा रही है। यह परंपरा करीब 500 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है और ब्रज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

इतिहासकारों के अनुसार समाज गायन की शुरुआत 16वीं सदी में हुई, जब ब्रज में स्वामी हरिदास, नारायण भट्ट, हित हरिवंश, चैतन्य महाप्रभु और वल्लभाचार्य जैसे महान संतों ने ब्रज की लीलाओं को पुनः स्थापित किया। नारायण भट्ट ने 1602 में ब्रज आकर यहां के विलुप्त तीर्थ स्थलों और विग्रहों का प्राकट्य कराया और समाज गायन के पदों का संकलन किया। बरसाना में समाज गायन के लिए उपयोग की जाने वाली पुस्तक करीब 445 वर्ष पुरानी है, जिसे वर्षोत्सव की पोथी कहा जाता है।

 

बरसाना को राधाजी का मायका और नंदगांव को उनकी ससुराल माना जाता है । दोनों स्थानों पर समाज गायन की साझा परंपरा निभाई जाती है। बसंत पंचमी से धुलेंडी तक चलने वाले 40 दिवसीय होली उत्सव की शुरुआत समाज गायन से ही होती है। बसंत पंचमी के दिन होली का डांडा (डंडा) रोपा जाता है और मंदिरों में गुलाल उड़ने लगता है। पखावज और ढप की थाप के साथ रसिक संतों के पदों का गायन वातावरण को भक्तिमय बना देता है।

 

समाज गायन में प्रमुख गायक को मुखिया कहा जाता है, जबकि उनके साथ पदों को दोहराने वाले ‘सेला’ कहलाते हैं। आसपास बैठे भक्तों का समूह ‘समाज’ कहलाता है। इस गायन में जयदेव, हित हरिवंश, नंददास, चतुर्भुज, गोविंद, परमानंद दास और अन्य रसिक संतों के पद गाए जाते हैं। इन पदों में ब्रज की होली, राधा-कृष्ण की लीलाएं और धार्मिक उत्सवों का सुंदर वर्णन मिलता है।

 

लट्ठमार होली के दौरान बरसाना और नंदगांव के गोस्वामी समाज के बीच समाज गायन का विशेष मुकाबला भी होता है। इस दौरान दोनों पक्ष भक्तिरस से भरे पदों के माध्यम से एक-दूसरे को चुनौती देते हैं। नंदगांव के हुरियारे पहले बरसाना पहुंचते हैं, जहां उनका स्वागत किया जाता है और मंदिर परिसर में समाज गायन होता है।

 

वृंदावन और ब्रज के कई प्राचीन मंदिरों जैसे राधाबल्लभ, प्रियाबल्लभ, गोरेलाल और रसिक बिहारी मंदिरों में भी समाज गायन की परंपरा आज भी जीवित है। स्थानीय ब्रज संस्कृति शोध संस्थान और वृंदावन शोध संस्थान में समाज गायन से जुड़ी कई प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं।

 

समाज गायन केवल संगीत नहीं, बल्कि ब्रज की जीवित सांस्कृतिक धरोहर है। सदियों पुराने पदों में उस समय की भाषा, भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी महसूस की जा सकती है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

Related News

बरसाना-नंदगांव की साझी ‘समाज गायन’ परंपरा

ब्रज की पवित्र भूमि में फाल्गुन का महीना आते ही वातावरण भक्ति, संगीत और रंगों से भर उठता है। बरसाना के श्रीलाडलीजी मंदिर और नंदगांव के नंदबाबा मंदिर में सदियों पुरानी समाज गायन की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जा रही है। यह परंपरा करीब 500 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है और ब्रज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

इतिहासकारों के अनुसार समाज गायन की शुरुआत 16वीं सदी में हुई, जब ब्रज में स्वामी हरिदास, नारायण भट्ट, हित हरिवंश, चैतन्य महाप्रभु और वल्लभाचार्य जैसे महान संतों ने ब्रज की लीलाओं को पुनः स्थापित किया। नारायण भट्ट ने 1602 में ब्रज आकर यहां के विलुप्त तीर्थ स्थलों और विग्रहों का प्राकट्य कराया और समाज गायन के पदों का संकलन किया। बरसाना में समाज गायन के लिए उपयोग की जाने वाली पुस्तक करीब 445 वर्ष पुरानी है, जिसे वर्षोत्सव की पोथी कहा जाता है।

 

बरसाना को राधाजी का मायका और नंदगांव को उनकी ससुराल माना जाता है । दोनों स्थानों पर समाज गायन की साझा परंपरा निभाई जाती है। बसंत पंचमी से धुलेंडी तक चलने वाले 40 दिवसीय होली उत्सव की शुरुआत समाज गायन से ही होती है। बसंत पंचमी के दिन होली का डांडा (डंडा) रोपा जाता है और मंदिरों में गुलाल उड़ने लगता है। पखावज और ढप की थाप के साथ रसिक संतों के पदों का गायन वातावरण को भक्तिमय बना देता है।

 

समाज गायन में प्रमुख गायक को मुखिया कहा जाता है, जबकि उनके साथ पदों को दोहराने वाले ‘सेला’ कहलाते हैं। आसपास बैठे भक्तों का समूह ‘समाज’ कहलाता है। इस गायन में जयदेव, हित हरिवंश, नंददास, चतुर्भुज, गोविंद, परमानंद दास और अन्य रसिक संतों के पद गाए जाते हैं। इन पदों में ब्रज की होली, राधा-कृष्ण की लीलाएं और धार्मिक उत्सवों का सुंदर वर्णन मिलता है।

 

लट्ठमार होली के दौरान बरसाना और नंदगांव के गोस्वामी समाज के बीच समाज गायन का विशेष मुकाबला भी होता है। इस दौरान दोनों पक्ष भक्तिरस से भरे पदों के माध्यम से एक-दूसरे को चुनौती देते हैं। नंदगांव के हुरियारे पहले बरसाना पहुंचते हैं, जहां उनका स्वागत किया जाता है और मंदिर परिसर में समाज गायन होता है।

 

वृंदावन और ब्रज के कई प्राचीन मंदिरों जैसे राधाबल्लभ, प्रियाबल्लभ, गोरेलाल और रसिक बिहारी मंदिरों में भी समाज गायन की परंपरा आज भी जीवित है। स्थानीय ब्रज संस्कृति शोध संस्थान और वृंदावन शोध संस्थान में समाज गायन से जुड़ी कई प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं।

 

समाज गायन केवल संगीत नहीं, बल्कि ब्रज की जीवित सांस्कृतिक धरोहर है। सदियों पुराने पदों में उस समय की भाषा, भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी महसूस की जा सकती है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव