16 Views
होली का पर्व नजदीक आते ही वातावरण में उत्साह बढ़ने लगता है, लेकिन इसके ठीक पहले के आठ दिनों को हिंदू धर्म में विशेष सावधानी और साधना का समय माना जाता है। इस अवधि को होलाष्टक कहा जाता है जो इस वर्ष 24 फरवरी से आरंभ हो चुका है । यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर पूर्णिमा यानी होलिका दहन तक चलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों में शुभ कार्यों पर रोक रहती है जबकि पूजा-पाठ और भक्ति करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
क्या है होलाष्टक का अर्थ और महत्व
होलाष्टक शब्द ‘होली’ और ‘अष्टक’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है होली से पहले के आठ दिन। यह अवधि होलिका दहन की तैयारियों की शुरुआत का संकेत भी देती है। इस दिन से ही स्थान का चयन कर उसे गंगाजल से शुद्ध किया जाता है और होलिका दहन के लिए लकड़ियां इत्यादि एकत्र करना शुरू किया जाता है। धीरे-धीरे यह ढेर बढ़ता जाता है और होलिका दहन के साथ इसका समापन होता है।
होलाष्टक में क्या नहीं करना चाहिए
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक के दौरान विवाह, सगाई, नामकरण, मुंडन और अन्य 16 संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। नया घर बनवाना, गृह प्रवेश करना, वाहन या संपत्ति खरीदना और नया व्यापार शुरू करना भी इस अवधि में वर्जित माना गया है। ज्योतिष के अनुसार, इन दिनों ग्रहों की स्थिति उग्र मानी जाती है जिससे नए कार्यों में बाधा आने की आशंका रहती है।
होलाष्टक में क्या करना चाहिए
होलाष्टक को साधना और भक्ति का उत्तम समय माना गया है। इस दौरान भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा, मंत्र जाप, ध्यान और तप करना शुभ माना जाता है। भक्त इस अवधि में अपने जीवन से नकारात्मकता दूर करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास करते हैं।
क्यों माने जाते हैं होलाष्टक के दिन अशुभ
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकश्यप ने भक्ति से रोकने के लिए कई यातनाएं दी थीं। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई। होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती और इसीलिए हिरण्यकश्यप ने उसे आदेश दिया कि होलिका अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ जाए। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन मनाया जाता है और उससे पहले के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से यह यातनाओं का सिलसिला प्रारंभ हुआ। अष्टमी को प्रह्लाद को बंदीगृह में डाला गया। नवमी से चतुर्दशी तक प्रतिदिन नई-नई यातनाएं दी जाती रहीं। पूर्णिमा के दिन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक प्रत्येक तिथि पर एक-एक ग्रह उग्र और रुद्र रूप में रहता है। अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को बृहस्पति, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु उग्र अवस्था में रहते हैं। इस कारण इन दिनों में मानवीय निर्णय और कार्यों पर प्रभाव पड़ता है। अतः शुभ कार्यों को टाला जाता है, ताकि कोई अशुभ परिणाम न हो।

