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माता हिंगलाज : पाकिस्तान में स्थित माता का इकलौता शक्तिपीठ

देशभर में चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं और हर ओर माता के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। इस बीच एक ऐसा मंदिर भी सुर्खियों में है, जो भारत की सीमा से बाहर यानी पाकिस्तान में स्थित है। खास बात तो यह है कि यह मंदिर केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का नाम है हिंगलाज माता मंदिर।

हिंगुलायां भगवती कोटराख्या भीमरूपिणी।

भैरवो भीमलोचनः सर्वसिद्धिप्रदायकः।।

( अर्थ - हिंगुला में भगवती कोटरी के नाम से जानी जाती हैं, जिनका रूप भयंकर है। उनके भैरव भीमलोचन हैं, जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं।)

हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासबेला जिले में स्थित है और इसे हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। हर साल यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भक्त यहां आकर माता के दर्शन करते हैं और अपनी आस्था प्रकट करते हैं। 1947 के विभाजन तक यह भारतीयों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल था । देवी का नाम हिंगलाज होने के पीछे का आशय है कि देवी के शरीर से अलग हुए सिर पर हिंगुल अर्थात सिंदूर लगा था अर्थात यह दर्शाता है कि उनका विवाह हो चुका है । इसीलिए उन्हें हिंगुला देवी भी कहते हैं । देवी भागवत पुराण में हिंगलाज माता का उल्लेख है।

'नमस्ते हिंगुले देवि नमस्ते कोटरे शुभे।

नमस्ते भीमलोचनप्रिये नमस्ते जगदम्बिके।।'

(अर्थ - हे हिंगुले देवी, आपको नमस्कार है। हे शुभ कोटरी, आपको नमस्कार है। हे भीमलोचन के प्रिय, आपको नमस्कार है। हे जगदम्बिके, आपको नमस्कार है।)

इस मंदिर की यात्रा अन्य तीर्थ स्थलों से थोड़ी अलग मानी जाती है, क्योंकि यहां आने वाले भक्तों को कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालुओं को दो शपथ लेनी पड़ती हैं। पहली शपथ के अनुसार, भक्तों को दर्शन करके लौटने तक साधु जैसा जीवन जीना होता है, यानी संयम और सादगी का पालन करना अनिवार्य होता है। दूसरी शपथ के अनुसार, यात्रा के दौरान कोई भी भक्त अपने साथ चल रहे दूसरे व्यक्ति को पानी नहीं दे सकता। यह नियम सुनने में भले ही अटपटा लगें, लेकिन इनका उद्देश्य यात्रा के अनुशासन और पवित्रता को बनाए रखना है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिंगलाज माता मंदिर का संबंध देवी सती से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब सती ने अपने पिता द्वारा पति शिव जी के अपमान से दुखी होकर अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए तब भगवान शिव उनका शरीर लेकर तांडव करने और शिव जी की पीड़ा कम करने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि हिंगलाज में सती का सिर गिरा था, इसलिए यह स्थान अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।

हिंगलाज माता मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लिए भी आस्था का केंद्र है। स्थानीय मुस्लिम इस मंदिर को ‘बीबी नानी’ या ‘नानी पीर’ के नाम से जानते हैं और इसे बेहद सम्मान देते हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय मुस्लिम समुदाय मंदिर की सुरक्षा और देखभाल में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। यह दृश्य धार्मिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की एक अनोखी मिसाल पेश करता है।

प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह मंदिर हिंगोल नदी के किनारे, मकरान क्षेत्र की पहाड़ियों के बीच स्थित है। यहां एक गुफा  में मंदिर है, जो अपनी सादगी और रहस्यमयी वातावरण के लिए जाना जाता है। यहां किसी प्रकार की भव्य मूर्ति नहीं है, बल्कि एक पवित्र शिला को ही हिंगलाज माता का रूप मानकर पूजा जाता है। यही इसकी विशेषता है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है।

नवरात्रि जैसे पावन पर्व के दौरान इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। भले ही यह मंदिर भारत की सीमा से बाहर स्थित हो, लेकिन भारतीय श्रद्धालुओं के लिए इसकी आस्था में कोई कमी नहीं है। भारत से भी हर वर्ष श्रद्धालु वहां दर्शन के लिए जाते हैं । हर वर्ष यहां एक भव्य मेले का भी आयोजन किया जाता है । यह मंदिर  दिखाता है कि आस्था और विश्वास किसी एक देश या धर्म तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह लोगों के दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव

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माता हिंगलाज : पाकिस्तान में स्थित माता का इकलौता शक्तिपीठ

देशभर में चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं और हर ओर माता के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। इस बीच एक ऐसा मंदिर भी सुर्खियों में है, जो भारत की सीमा से बाहर यानी पाकिस्तान में स्थित है। खास बात तो यह है कि यह मंदिर केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का नाम है हिंगलाज माता मंदिर।

हिंगुलायां भगवती कोटराख्या भीमरूपिणी।

भैरवो भीमलोचनः सर्वसिद्धिप्रदायकः।।

( अर्थ - हिंगुला में भगवती कोटरी के नाम से जानी जाती हैं, जिनका रूप भयंकर है। उनके भैरव भीमलोचन हैं, जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं।)

हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासबेला जिले में स्थित है और इसे हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। हर साल यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भक्त यहां आकर माता के दर्शन करते हैं और अपनी आस्था प्रकट करते हैं। 1947 के विभाजन तक यह भारतीयों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल था । देवी का नाम हिंगलाज होने के पीछे का आशय है कि देवी के शरीर से अलग हुए सिर पर हिंगुल अर्थात सिंदूर लगा था अर्थात यह दर्शाता है कि उनका विवाह हो चुका है । इसीलिए उन्हें हिंगुला देवी भी कहते हैं । देवी भागवत पुराण में हिंगलाज माता का उल्लेख है।

'नमस्ते हिंगुले देवि नमस्ते कोटरे शुभे।

नमस्ते भीमलोचनप्रिये नमस्ते जगदम्बिके।।'

(अर्थ - हे हिंगुले देवी, आपको नमस्कार है। हे शुभ कोटरी, आपको नमस्कार है। हे भीमलोचन के प्रिय, आपको नमस्कार है। हे जगदम्बिके, आपको नमस्कार है।)

इस मंदिर की यात्रा अन्य तीर्थ स्थलों से थोड़ी अलग मानी जाती है, क्योंकि यहां आने वाले भक्तों को कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालुओं को दो शपथ लेनी पड़ती हैं। पहली शपथ के अनुसार, भक्तों को दर्शन करके लौटने तक साधु जैसा जीवन जीना होता है, यानी संयम और सादगी का पालन करना अनिवार्य होता है। दूसरी शपथ के अनुसार, यात्रा के दौरान कोई भी भक्त अपने साथ चल रहे दूसरे व्यक्ति को पानी नहीं दे सकता। यह नियम सुनने में भले ही अटपटा लगें, लेकिन इनका उद्देश्य यात्रा के अनुशासन और पवित्रता को बनाए रखना है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिंगलाज माता मंदिर का संबंध देवी सती से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब सती ने अपने पिता द्वारा पति शिव जी के अपमान से दुखी होकर अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए तब भगवान शिव उनका शरीर लेकर तांडव करने और शिव जी की पीड़ा कम करने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि हिंगलाज में सती का सिर गिरा था, इसलिए यह स्थान अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।

हिंगलाज माता मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लिए भी आस्था का केंद्र है। स्थानीय मुस्लिम इस मंदिर को ‘बीबी नानी’ या ‘नानी पीर’ के नाम से जानते हैं और इसे बेहद सम्मान देते हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय मुस्लिम समुदाय मंदिर की सुरक्षा और देखभाल में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। यह दृश्य धार्मिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की एक अनोखी मिसाल पेश करता है।

प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह मंदिर हिंगोल नदी के किनारे, मकरान क्षेत्र की पहाड़ियों के बीच स्थित है। यहां एक गुफा  में मंदिर है, जो अपनी सादगी और रहस्यमयी वातावरण के लिए जाना जाता है। यहां किसी प्रकार की भव्य मूर्ति नहीं है, बल्कि एक पवित्र शिला को ही हिंगलाज माता का रूप मानकर पूजा जाता है। यही इसकी विशेषता है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है।

नवरात्रि जैसे पावन पर्व के दौरान इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। भले ही यह मंदिर भारत की सीमा से बाहर स्थित हो, लेकिन भारतीय श्रद्धालुओं के लिए इसकी आस्था में कोई कमी नहीं है। भारत से भी हर वर्ष श्रद्धालु वहां दर्शन के लिए जाते हैं । हर वर्ष यहां एक भव्य मेले का भी आयोजन किया जाता है । यह मंदिर  दिखाता है कि आस्था और विश्वास किसी एक देश या धर्म तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह लोगों के दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव