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चैत्र नवरात्रि : काशी के मां विशालाक्षी मंदिर की अद्भुत है महिमा

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर वाराणसी की काशी नगरी पूरी तरह भक्तिमय हो उठी है। मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। इसी बीच काशी का प्रसिद्ध विशालाक्षी मंदिर, जो 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां दूर-दराज से आए भक्त मां के दर्शन कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। 

 

विशाल नेत्रों वाली मां विशालाक्षी का यह मंदिर मां सती के 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। इनका महत्व कांची के कामाक्षी अम्मन मंदिर और मदुरै की मीनाक्षी अम्मन मंदिर के समान बताया जाता है। मान्यता है कि काशी पुराधिपति विश्वनाथ जी एवं माता पार्वती यहां आकर रात्रि विश्राम करते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब ऋषि व्यास को वाराणसी में किसी ने भोजन नहीं दिया, तब मां विशालाक्षी ने साधारण गृहिणी का रूप धारण कर उन्हें भोजन कराया, जिससे उनका स्वरूप अन्नपूर्णा के समान माना जाता है।

 

काशी में मां विशालाक्षी का यह मंदिर गंगा के किनारे मीरघाट की गलियों से होकर धर्मेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित है। मान्यता है कि यहां मां सती के कान का कुंडल गिरा था। इसीलिए उन्हें मणिकर्णी देवी के नाम से भी जाना जाता है। समय के साथ यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई और मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर में मां विशालाक्षी की दो प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 1971 में अभिषेक के दौरान मुख्य प्रतिमा की एक अंगुली खंडित हो गई थी, जिसके बाद उसके सामने दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई।

 

मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी के अनुसार, वर्ष 1908 में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। गर्भगृह को छोड़कर शेष मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। मंदिर के बाहरी भाग में गणेश जी, भगवान शंकर और अन्य देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां आकर्षण का केंद्र हैं। यहाँ शक्ति 'विशालाक्षी' (विशाल आँखों वाली) और भैरव 'काल भैरव' के रूप में पूजे जाते हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल माना जाता है। यह मंदिर काशी खंड में वर्णित एक प्रमुख शक्तिपीठ है। सावन में यहां विशेष आयोजन भी किए जाते हैं।

 

हर माह कृष्ण पक्ष की तृतीया को मां विशालाक्षी का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसे देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ दक्षिण भारत से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है। नवरात्रि की पंचमी के दिन मां विशालाक्षी नौ गौरी रूपों में भक्तों को दर्शन देती हैं। मान्यता है कि मां के दर्शन से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि तथा यश की प्राप्ति होती है।

 

चैत्र नवरात्रि के इस पावन पर्व पर काशी का विशालाक्षी मंदिर शक्ति और भक्ति के अद्भुत संगम की तरह है । मां के दरबार में पहुंचकर भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं बल्कि अपने जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता की कामना भी करते हैं।  नवरात्रि के इन नौ दिनों में काशी की आस्था और संस्कृति का यह दिव्य रूप हर किसी को आकर्षित करता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

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चैत्र नवरात्रि : काशी के मां विशालाक्षी मंदिर की अद्भुत है महिमा

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर वाराणसी की काशी नगरी पूरी तरह भक्तिमय हो उठी है। मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। इसी बीच काशी का प्रसिद्ध विशालाक्षी मंदिर, जो 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां दूर-दराज से आए भक्त मां के दर्शन कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। 

 

विशाल नेत्रों वाली मां विशालाक्षी का यह मंदिर मां सती के 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। इनका महत्व कांची के कामाक्षी अम्मन मंदिर और मदुरै की मीनाक्षी अम्मन मंदिर के समान बताया जाता है। मान्यता है कि काशी पुराधिपति विश्वनाथ जी एवं माता पार्वती यहां आकर रात्रि विश्राम करते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब ऋषि व्यास को वाराणसी में किसी ने भोजन नहीं दिया, तब मां विशालाक्षी ने साधारण गृहिणी का रूप धारण कर उन्हें भोजन कराया, जिससे उनका स्वरूप अन्नपूर्णा के समान माना जाता है।

 

काशी में मां विशालाक्षी का यह मंदिर गंगा के किनारे मीरघाट की गलियों से होकर धर्मेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित है। मान्यता है कि यहां मां सती के कान का कुंडल गिरा था। इसीलिए उन्हें मणिकर्णी देवी के नाम से भी जाना जाता है। समय के साथ यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई और मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर में मां विशालाक्षी की दो प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 1971 में अभिषेक के दौरान मुख्य प्रतिमा की एक अंगुली खंडित हो गई थी, जिसके बाद उसके सामने दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई।

 

मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी के अनुसार, वर्ष 1908 में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। गर्भगृह को छोड़कर शेष मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। मंदिर के बाहरी भाग में गणेश जी, भगवान शंकर और अन्य देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां आकर्षण का केंद्र हैं। यहाँ शक्ति 'विशालाक्षी' (विशाल आँखों वाली) और भैरव 'काल भैरव' के रूप में पूजे जाते हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल माना जाता है। यह मंदिर काशी खंड में वर्णित एक प्रमुख शक्तिपीठ है। सावन में यहां विशेष आयोजन भी किए जाते हैं।

 

हर माह कृष्ण पक्ष की तृतीया को मां विशालाक्षी का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसे देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ दक्षिण भारत से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है। नवरात्रि की पंचमी के दिन मां विशालाक्षी नौ गौरी रूपों में भक्तों को दर्शन देती हैं। मान्यता है कि मां के दर्शन से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि तथा यश की प्राप्ति होती है।

 

चैत्र नवरात्रि के इस पावन पर्व पर काशी का विशालाक्षी मंदिर शक्ति और भक्ति के अद्भुत संगम की तरह है । मां के दरबार में पहुंचकर भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं बल्कि अपने जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता की कामना भी करते हैं।  नवरात्रि के इन नौ दिनों में काशी की आस्था और संस्कृति का यह दिव्य रूप हर किसी को आकर्षित करता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव