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“कन्ये त्वं दुर्गा भवानी भव” -
यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि उस सनातन सत्य की अभिव्यक्ति है कि हर कन्या में मां दुर्गा का दिव्य स्वरूप विराजमान है।
नवरात्रि के पावन पर्व में किया जाने वाला कन्या पूजन एक विशेष धार्मिक परंपरा है, जो छोटी बालिकाओं में मां दुर्गा के स्वरूप को मानकर उनकी पूजा करने का संदेश देता है। यह अनुष्ठान नारी शक्ति, मासूमियत और सृजन की ऊर्जा का सम्मान करने का प्रतीक माना जाता है। आमतौर पर इसे अष्टमी या नवमी तिथि को किया जाता है और देशभर में इसे कन्या पूजन, कंजक या कुमारिका पूजा जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इस अनुष्ठान में भक्त नौ बालिकाओं को आमंत्रित करते हैं, जो मां दुर्गा के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनके साथ एक बालक को भी बुलाया जाता है, जिसे बटुक या लांगूर कहा जाता है।
देवी महात्म्य की कथा
पौराणिक कथाओं में, मां दुर्गा को देवताओं द्वारा सृजित एक शक्तिशाली और अजेय शक्ति के रूप में देखा जाता है, जिनका उद्देश्य स्वर्ग पर आक्रमण करने वाले और रूप बदलने वाले राक्षस महिषासुर को परास्त करना था। देवता अकेले उसे रोक नहीं सके, इसलिए देवी दुर्गा ने राक्षस को पराजित करने और उसके अत्याचार को समाप्त करने के लिए एक कन्या (युवती) का रूप धारण किया था।
पूजन की मान्यताएं और लाभ
मान्यता है कि कन्या पूजन करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इससे घर में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। यह पूजा अहंकार को समाप्त कर विनम्रता और सेवा भाव सिखाती है। साथ ही, नारी सम्मान का संदेश भी देती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
कैसे करते हैं कन्या पूजन ?
पूजन से पहले घर की साफ-सफाई की जाती है। फिर श्रद्धा के साथ नौ बालिकाओं और एक बालक को आमंत्रित किया जाता है। उनके पैर धोकर तिलक लगाया जाता है और कलावा बांधा जाता है। इसके बाद उन्हें आसन पर बैठाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है। भोग के रूप में चना, हलवा और पूरी अर्पित की जाती है, जिसे बच्चे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। बालिकाओं को चुनरी, चूड़ियां, बिंदी आदि उपहार दिए जाते हैं, जबकि बालक को भी सम्मानपूर्वक भेंट दी जाती है। अंत में उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है।
कन्याओं में मां दुर्गा के स्वरूप
कन्या पूजन को नवरात्रि साधना का महत्वपूर्ण और अंतिम चरण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 2 से 10 वर्ष तक की छोटी बच्चियां देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। शास्त्रों में इन कन्याओं को उनकी आयु के अनुसार अलग-अलग नाम दिए गए हैं।
एक वर्ष से अधिक और दो वर्ष तक की बच्ची को ‘कुमारिका’ कहा जाता है।
दो से तीन वर्ष की बच्चियां ‘त्रिमूर्ति’ कहलाती हैं।
तीन से चार वर्ष की आयु की बच्चियों को ‘कल्याणी’ के रूप में पूजा जाता है।
चार से पांच वर्ष की बच्चियां ‘रोहिणी’ मानी जाती हैं।
इसी तरह पांच से छह वर्ष की बच्चियां ‘काली’ का रूप होती हैं
छह से सात वर्ष की बच्चियों को ‘चंडिका’ कहा जाता है।
सात से आठ वर्ष की आयु की बच्चियां ‘शाम्भवी’ कहलाती हैं।
आठ से नौ वर्ष की बच्चियां ‘दुर्गा’ के रूप में पूजी जाती हैं।
वहीं नौ से दस वर्ष से कम आयु की बच्चियों को ‘भद्रा’ या ‘सुभद्रा’ का स्वरूप माना जाता है।
क्यों बुलाया जाता है एक बालक ?
कन्या पूजन में बालक को बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है। जैसे माता वैष्णो देवी के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन जरूरी माने जाते हैं, उसी तरह कन्या पूजन में भी बालक को शामिल करना आवश्यक माना गया है। इससे पूजा पूर्ण मानी जाती है।

