Sanskar

आस्था, प्रकृति और शक्ति का संगम है मां पूर्णागिरी धाम

चैत्र नवरात्र का पर्व पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है । इसी पावन अवसर पर उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर में स्थित मां पूर्णागिरी धाम में भी भक्तों का सैलाब देखने को मिल रहा है, जो आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यहां इन दिनों हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के चरणों में मत्था टेक रहे हैं । आइये, इसके बारे में जानते हैं । 

मंदिर में दर्शन के लिए टनकपुर से लगभग 20 किलोमीटर दूर ठूलीगाड़ तक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। हालांकि उसके बाद करीब 3 किलोमीटर की चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। इस यात्रा के दौरान भक्तों को सुंदर पहाड़ी दृश्य और आध्यात्मिक अनुभव की अनुभूति मिलती है। चढ़ाई पार करने के बाद अवलाखान (जिसे अब हनुमान चट्टी कहा जाता है) आता है, जहां से पर्वतमालाओं का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। टनकपुर में बहने वाली काली नदी मैदानों में उतरकर शारदा नदी के नाम से जानी जाती है, जो इस स्थान की पवित्रता को और बढ़ाती है। मां पूर्णागिरि मंदिर को ‘पुण्यगिरि’ भी कहा जाता है और इसे भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार जब विष्णु जी ने भगवान शिव का विलाप कम करने के लिए माता सती के शव के 51 टुकड़े किये थे तब यहां माता की नाभि गिरी थी।

 

नवरात्रि में उमड़ती है अपार आस्था

चैत्र नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। हाल के दिनों में एक दिन पूरे 24 घंटे में लगभग 35 हजार भक्तों ने दर्शन किए। टनकपुर से लेकर मंदिर तक “जय माता दी” के जयकारे गूंजते रहते हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और शारदा घाट पर भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जहां से वे पैदल यात्रा शुरू करते हैं। भक्त बूम, ठूलीगाड़ और भैरव मंदिर होते हुए धाम तक पहुंचते हैं। उत्तर भारत के साथ नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु यह मां के दर्शन को आते हैं । शक्तिपीठ में पहुंचने से पूर्व भैरव मंदिर पर बाबा भैरवनाथ का वास है। वह उनके द्वारपाल के तौर पर खड़े हैं और उनके दर्शन के बाद ही मां के दर्शनों की अनुमति मिलती है।

 

मंदिर की विशेष वास्तुकला

पूर्णागिरि मंदिर पहाड़ी की चोटी पर बना एक प्राचीन मंदिर है, जिसकी वास्तुकला कुमाऊंनी शैली को दर्शाती है। मंदिर के तीन मुख्य भाग हैं - गर्भगृह, अंतराल और मंडप। गर्भगृह में मां पूर्णागिरि की 3 फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है, जिसे सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है। अंतराल वह स्थान है जहां भक्त देवी का आशीर्वाद महसूस करते हैं, और मंडप में धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। मंदिर में गणेश जी, हनुमान जी, शिव जी और माता काली की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर समिति द्वारा 24 घंटे दर्शन की व्यवस्था की गई है और स्वयंसेवक पूरी व्यवस्था संभालते हैं।

 

मेले और मान्यताएं

चैत्र नवरात्र से शुरू होकर जून तक चलने वाले पूर्णागिरि मेले में हर साल लाखों श्रद्धालु मंदिर में एकत्रित होते हैं। साथ ही प्रशासन द्वारा बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। नवरात्र मेला, विश्व संक्रांति और कुमाऊं मेला पूर्णागिरि देवी मंदिर के अन्य प्रसिद्ध मेले हैं जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। एक मान्यता यह भी है कि मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद सिद्धा बाबा मंदिर जाना जरूरी होता है, तभी यात्रा पूर्ण मानी जाती है। चारधाम यात्रा के दिनों में भी तीर्थयात्री बड़ी तादाद में यहां आते हैं और इन दिनों उसी की तैयारी चल रही है जिसके तहत पूरे क्षेत्र का प्लास्टिक-मुक्त बनाया जा रहा है । यात्रा अगले महीने से शुरू हो रही है ।

मां पूर्णागिरि धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और प्रकृति की अद्भुत शक्ति का प्रतीक है। यहां आने वाला हर भक्त अपने भीतर एक नई ऊर्जा और शांति महसूस करता है। कठिन चढ़ाई के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कभी कम नहीं होती, क्योंकि उन्का विश्वास है कि मां पूर्णागिरि हर मनोकामना पूरी करती हैं। 

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव

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आस्था, प्रकृति और शक्ति का संगम है मां पूर्णागिरी धाम

चैत्र नवरात्र का पर्व पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है । इसी पावन अवसर पर उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर में स्थित मां पूर्णागिरी धाम में भी भक्तों का सैलाब देखने को मिल रहा है, जो आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यहां इन दिनों हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के चरणों में मत्था टेक रहे हैं । आइये, इसके बारे में जानते हैं । 

मंदिर में दर्शन के लिए टनकपुर से लगभग 20 किलोमीटर दूर ठूलीगाड़ तक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। हालांकि उसके बाद करीब 3 किलोमीटर की चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। इस यात्रा के दौरान भक्तों को सुंदर पहाड़ी दृश्य और आध्यात्मिक अनुभव की अनुभूति मिलती है। चढ़ाई पार करने के बाद अवलाखान (जिसे अब हनुमान चट्टी कहा जाता है) आता है, जहां से पर्वतमालाओं का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। टनकपुर में बहने वाली काली नदी मैदानों में उतरकर शारदा नदी के नाम से जानी जाती है, जो इस स्थान की पवित्रता को और बढ़ाती है। मां पूर्णागिरि मंदिर को ‘पुण्यगिरि’ भी कहा जाता है और इसे भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार जब विष्णु जी ने भगवान शिव का विलाप कम करने के लिए माता सती के शव के 51 टुकड़े किये थे तब यहां माता की नाभि गिरी थी।

 

नवरात्रि में उमड़ती है अपार आस्था

चैत्र नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। हाल के दिनों में एक दिन पूरे 24 घंटे में लगभग 35 हजार भक्तों ने दर्शन किए। टनकपुर से लेकर मंदिर तक “जय माता दी” के जयकारे गूंजते रहते हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और शारदा घाट पर भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जहां से वे पैदल यात्रा शुरू करते हैं। भक्त बूम, ठूलीगाड़ और भैरव मंदिर होते हुए धाम तक पहुंचते हैं। उत्तर भारत के साथ नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु यह मां के दर्शन को आते हैं । शक्तिपीठ में पहुंचने से पूर्व भैरव मंदिर पर बाबा भैरवनाथ का वास है। वह उनके द्वारपाल के तौर पर खड़े हैं और उनके दर्शन के बाद ही मां के दर्शनों की अनुमति मिलती है।

 

मंदिर की विशेष वास्तुकला

पूर्णागिरि मंदिर पहाड़ी की चोटी पर बना एक प्राचीन मंदिर है, जिसकी वास्तुकला कुमाऊंनी शैली को दर्शाती है। मंदिर के तीन मुख्य भाग हैं - गर्भगृह, अंतराल और मंडप। गर्भगृह में मां पूर्णागिरि की 3 फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है, जिसे सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है। अंतराल वह स्थान है जहां भक्त देवी का आशीर्वाद महसूस करते हैं, और मंडप में धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। मंदिर में गणेश जी, हनुमान जी, शिव जी और माता काली की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर समिति द्वारा 24 घंटे दर्शन की व्यवस्था की गई है और स्वयंसेवक पूरी व्यवस्था संभालते हैं।

 

मेले और मान्यताएं

चैत्र नवरात्र से शुरू होकर जून तक चलने वाले पूर्णागिरि मेले में हर साल लाखों श्रद्धालु मंदिर में एकत्रित होते हैं। साथ ही प्रशासन द्वारा बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। नवरात्र मेला, विश्व संक्रांति और कुमाऊं मेला पूर्णागिरि देवी मंदिर के अन्य प्रसिद्ध मेले हैं जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। एक मान्यता यह भी है कि मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद सिद्धा बाबा मंदिर जाना जरूरी होता है, तभी यात्रा पूर्ण मानी जाती है। चारधाम यात्रा के दिनों में भी तीर्थयात्री बड़ी तादाद में यहां आते हैं और इन दिनों उसी की तैयारी चल रही है जिसके तहत पूरे क्षेत्र का प्लास्टिक-मुक्त बनाया जा रहा है । यात्रा अगले महीने से शुरू हो रही है ।

मां पूर्णागिरि धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और प्रकृति की अद्भुत शक्ति का प्रतीक है। यहां आने वाला हर भक्त अपने भीतर एक नई ऊर्जा और शांति महसूस करता है। कठिन चढ़ाई के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कभी कम नहीं होती, क्योंकि उन्का विश्वास है कि मां पूर्णागिरि हर मनोकामना पूरी करती हैं। 

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव