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2 अप्रैल को हनुमान जयंती, जानिए हनुमान जी के अवतरण की कथा

हनुमान जी का दिव्य प्राकट्य सनातन परंपरा में भक्ति, शक्ति और परम समर्पण की अद्वितीय गाथा के रूप में वर्णित है, जहाँ त्रेता युग में भगवान राम की सेवा और धर्मस्थापना हेतु स्वयं भगवान शिव ने रुद्र अंश से अवतार लेने का संकल्प किया । माता अंजनी की कठोर तपस्या और पिता केसरी के तेज से संपन्न यह अवतार उस अलौकिक क्षण में पूर्ण हुआ जब पवन देव ने शिव के दिव्य तेज को माता अंजनी के गर्भ तक पहुँचाकर इस जन्म को संभव बनाया। इसी कारण वे “पवन पुत्र” और “मारुति” कहलाए। बाल्यकाल से ही उनकी अतुलनीय शक्ति, जैसे - सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास, उनके अद्वितीय तेज का परिचायक बनी, परंतु उनकी सबसे महान पहचान उनकी विनम्र भक्ति है, जहाँ वे सदा रामदूत के रूप में केवल प्रभु की सेवा में लीन रहे, और रामायण में उनका चरित्र यह सिद्ध करता है कि सच्ची महिमा बल या विद्या में नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण में निहित है- इसीलिए हनुमान जी केवल एक देवता नहीं, बल्कि युगों-युगों तक मानवता के लिए आदर्श भक्त, निर्भय वीर और कल्याणकारी शक्ति के रूप में पूजनीय हैं।

 

जयंती का अर्थ

 

जयंती अर्थात जिसकी जय जयकार अनंत काल तक यानि युगों-युगों तक हो। इसका आशय किसी प्रसिद्ध महापुरुष, भगवान के अवतार या महत्वपूर्ण घटना की वर्षगांठ या जन्मतिथि से है। जैसे - रजत जयंती, स्वर्ण जयंती, हीरक जयंती इत्यादि। हुनुमान जी महाराज अजर अमर हैं इसलिए जयंती शब्द से जोड़ा गया है। जिसे वर्तमान में हनुमान जन्मोत्सव, हनुमान अवतरण या प्राकट्य दिवस आदि नाम से भी जाना जाता है।

 

शिव जी ने रुद्र अवतार क्यों लिया ?

 

शिवमहापुराण और श्रीरामचरितमानस के अनुसार त्रेतायुग में जब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया, तब धर्म की स्थापना और रावण जैसे अधर्मियों के विनाश के लिए उन्हें एक महान भक्त और सहयोगी की आवश्यकता थी। तब भगवान शिव ने स्वयं रूद्र रूप में अवतार लेने का निर्णय किया। शिव जी जानते थे कि राम अवतार में वे मर्यादा का पालन करेंगे, इसलिए उनकी सहायता के लिए एक ऐसे परम भक्त की आवश्यकता थी जो हर परिस्थिति में साथ दे सके। इसी कारण शिव जी ने हनुमान जी के रूप में रुद्र अवतार लिया।

 

माता अंजनी और केसरी की कथा

 

माता अंजनी अपने पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में एक अप्सरा थीं, जिनका नाम 'पुंजिकस्थला' था। ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण उन्हें वानरी रूप में धरती पर जन्म लेने का श्राप मिला। पुंजिकस्थला ऋषि के श्राप से विचलित हो उठीं और श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा। दुर्वासा ऋषि ने विनम्र हो कर कहा कि ‘‘अगर तुम अपने गर्भ से शिवांश को जन्म दोगी तो तुम्हारे पुत्र का जन्म होते ही तुम अपने सामान्य रूप से भी अधिक परम सुन्दर रूप प्राप्त कर लोगी।’’ ऋषि के ऐसे वचनों से पुंजिकस्थला को संतोष हुआ।

 

पुंजिकस्थला ने अपने नृत्य कौशल द्वारा कैलाश पर भगवान शिव को नटराज रूप में प्रसन्न किया। महादेव ने पुंजिकस्थला से वरदान मांगने को कहा तो पुंजिकस्थला ने महादेव के समान ही अपने गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेने का आग्रह किया। महादेव ने उसकी बात का सम्मान करते हुए कहा कि ‘‘तुम अपने अगले जन्म में महर्षि गौतम के घर उनकी पत्नी अहिल्या से वानरी रूप में जन्म लोगी और तुम्हारा नाम अंजना होगा। किष्किन्धा के वानर राज केसरी से तुम्हारा विवाह होगा। तुम पृथ्वीलोक पर पवनदेव के कहने पर अंजनेरी पर्वत पर मेरी तपस्या कर परमतत्व शिवांश के रूप में मुझे प्राप्त करोगी और संतान के जन्म के साथ ही अपने श्राप से मुक्त हो जाओगी।’’ ऐसा कह कर महादेव अंतर्ध्यान हो गए। फिर जैसा महादेव ने कहा था वैसा ही हुआ। अंजनी ने पृथ्वी पर जन्म लिया। वानर राज केसरी से विवाह के बाद भगवान शिव से पुत्र की कामना हेतु कठोर तपस्या की तब भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर उनकी मनोकामना पूर्ण की।

 

हनुमान जी का अवतरा कैसे हुआ ?

 

एक दिन अंजनी और केसरी रात्रि में अपने महल में निद्रामग्न थे तभी पवन देव ने भगवान शिव के तेज पुंज को वायु मार्ग से देवी अंजनी के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया और अगली सुबह चैत्र मास पूर्णिमा, मंगलवार के दिन, चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6 बज कर 3 मिनट पर भारत देश में वर्तमान के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक जिले में अंजनेरी पर्वत पर मारुति का अवतरण हुआ। अंजनेरी पर्वत पहले ऋषिमुख पर्वत के नाम से जाना जाता था। मारुति ही बजरंगबली हुए क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह है। वे पवन-पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। वायु अथवा पवन देव ने हनुमान के जन्म और लालन-पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसीलिए इनका सर्वप्रथम नाम मारुति पड़ा। मारुत (संस्कृत: मरुत्) का अर्थ हवा है। नन्दन का अर्थ बेटा है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान "मारुति" अर्थात "मारुत-नन्दन" यानि पवन पुत्र कहलाए।

 

बाल्यकाल की अद्भुत लीलाएँ

 

बाल्यकाल में ही मारुति ने अपनी दिव्य शक्तियों का परिचय दे दिया था - सूर्य को फल समझकर निगलने दौड़ पड़े और जब इंद्र के वज्र से चोट लगी तो उनका नाम 'हनुमान' पड़ा। हनु अर्थात ठोड़ी पर प्रहार होने से उन्हें देवताओं द्वारा हनुमान नाम मिला। देवताओं ने उन्हें वरदान दिए। इंद्र द्वारा प्रहार से पवन देव क्रोधित हो गए और पूरे ब्रह्मांड में वायु रोक दी, जीवन का संतुलन बिगड़ने लगा तब देवताओं ने हनुमान जी को अनेक वरदान दिए और पुनः वायु का संचार हुआ।

 

हनुमान जी के अवतार पर ज्योतिषी गणना

 

ज्योतिषियों की सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का अवतार 85 लाख 58 हजार 112 वर्ष पहले त्रेतायुग के अन्तिम चरण में हुआ था। हनुमान जी को आठ चिरंजीवियों में से एक माना जाता है। माता जानकी और श्रीराम के आशीर्वाद के फल स्वरुप आज भी हनुमान जी महाराज सशरीर इस पृथ्वी पर अदृश्य रूप से निवास करते हैं और जहाँ-जहाँ श्रीराम कथा या राम नाम का गायन-वादन होता है उस स्थान पर सूक्ष्म या अदृश्य रूप से हनुमान जी उपस्थित होते हैं।

 

:- रमन शर्मा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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हनुमान जी का दिव्य प्राकट्य सनातन परंपरा में भक्ति, शक्ति और परम समर्पण की अद्वितीय गाथा के रूप में वर्णित है, जहाँ त्रेता युग में भगवान राम की सेवा और धर्मस्थापना हेतु स्वयं भगवान शिव ने रुद्र अंश से अवतार लेने का संकल्प किया । माता अंजनी की कठोर तपस्या और पिता केसरी के तेज से संपन्न यह अवतार उस अलौकिक क्षण में पूर्ण हुआ जब पवन देव ने शिव के दिव्य तेज को माता अंजनी के गर्भ तक पहुँचाकर इस जन्म को संभव बनाया। इसी कारण वे “पवन पुत्र” और “मारुति” कहलाए। बाल्यकाल से ही उनकी अतुलनीय शक्ति, जैसे - सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास, उनके अद्वितीय तेज का परिचायक बनी, परंतु उनकी सबसे महान पहचान उनकी विनम्र भक्ति है, जहाँ वे सदा रामदूत के रूप में केवल प्रभु की सेवा में लीन रहे, और रामायण में उनका चरित्र यह सिद्ध करता है कि सच्ची महिमा बल या विद्या में नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण में निहित है- इसीलिए हनुमान जी केवल एक देवता नहीं, बल्कि युगों-युगों तक मानवता के लिए आदर्श भक्त, निर्भय वीर और कल्याणकारी शक्ति के रूप में पूजनीय हैं।

 

जयंती का अर्थ

 

जयंती अर्थात जिसकी जय जयकार अनंत काल तक यानि युगों-युगों तक हो। इसका आशय किसी प्रसिद्ध महापुरुष, भगवान के अवतार या महत्वपूर्ण घटना की वर्षगांठ या जन्मतिथि से है। जैसे - रजत जयंती, स्वर्ण जयंती, हीरक जयंती इत्यादि। हुनुमान जी महाराज अजर अमर हैं इसलिए जयंती शब्द से जोड़ा गया है। जिसे वर्तमान में हनुमान जन्मोत्सव, हनुमान अवतरण या प्राकट्य दिवस आदि नाम से भी जाना जाता है।

 

शिव जी ने रुद्र अवतार क्यों लिया ?

 

शिवमहापुराण और श्रीरामचरितमानस के अनुसार त्रेतायुग में जब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया, तब धर्म की स्थापना और रावण जैसे अधर्मियों के विनाश के लिए उन्हें एक महान भक्त और सहयोगी की आवश्यकता थी। तब भगवान शिव ने स्वयं रूद्र रूप में अवतार लेने का निर्णय किया। शिव जी जानते थे कि राम अवतार में वे मर्यादा का पालन करेंगे, इसलिए उनकी सहायता के लिए एक ऐसे परम भक्त की आवश्यकता थी जो हर परिस्थिति में साथ दे सके। इसी कारण शिव जी ने हनुमान जी के रूप में रुद्र अवतार लिया।

 

माता अंजनी और केसरी की कथा

 

माता अंजनी अपने पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में एक अप्सरा थीं, जिनका नाम 'पुंजिकस्थला' था। ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण उन्हें वानरी रूप में धरती पर जन्म लेने का श्राप मिला। पुंजिकस्थला ऋषि के श्राप से विचलित हो उठीं और श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा। दुर्वासा ऋषि ने विनम्र हो कर कहा कि ‘‘अगर तुम अपने गर्भ से शिवांश को जन्म दोगी तो तुम्हारे पुत्र का जन्म होते ही तुम अपने सामान्य रूप से भी अधिक परम सुन्दर रूप प्राप्त कर लोगी।’’ ऋषि के ऐसे वचनों से पुंजिकस्थला को संतोष हुआ।

 

पुंजिकस्थला ने अपने नृत्य कौशल द्वारा कैलाश पर भगवान शिव को नटराज रूप में प्रसन्न किया। महादेव ने पुंजिकस्थला से वरदान मांगने को कहा तो पुंजिकस्थला ने महादेव के समान ही अपने गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेने का आग्रह किया। महादेव ने उसकी बात का सम्मान करते हुए कहा कि ‘‘तुम अपने अगले जन्म में महर्षि गौतम के घर उनकी पत्नी अहिल्या से वानरी रूप में जन्म लोगी और तुम्हारा नाम अंजना होगा। किष्किन्धा के वानर राज केसरी से तुम्हारा विवाह होगा। तुम पृथ्वीलोक पर पवनदेव के कहने पर अंजनेरी पर्वत पर मेरी तपस्या कर परमतत्व शिवांश के रूप में मुझे प्राप्त करोगी और संतान के जन्म के साथ ही अपने श्राप से मुक्त हो जाओगी।’’ ऐसा कह कर महादेव अंतर्ध्यान हो गए। फिर जैसा महादेव ने कहा था वैसा ही हुआ। अंजनी ने पृथ्वी पर जन्म लिया। वानर राज केसरी से विवाह के बाद भगवान शिव से पुत्र की कामना हेतु कठोर तपस्या की तब भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर उनकी मनोकामना पूर्ण की।

 

हनुमान जी का अवतरा कैसे हुआ ?

 

एक दिन अंजनी और केसरी रात्रि में अपने महल में निद्रामग्न थे तभी पवन देव ने भगवान शिव के तेज पुंज को वायु मार्ग से देवी अंजनी के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया और अगली सुबह चैत्र मास पूर्णिमा, मंगलवार के दिन, चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6 बज कर 3 मिनट पर भारत देश में वर्तमान के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक जिले में अंजनेरी पर्वत पर मारुति का अवतरण हुआ। अंजनेरी पर्वत पहले ऋषिमुख पर्वत के नाम से जाना जाता था। मारुति ही बजरंगबली हुए क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह है। वे पवन-पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। वायु अथवा पवन देव ने हनुमान के जन्म और लालन-पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसीलिए इनका सर्वप्रथम नाम मारुति पड़ा। मारुत (संस्कृत: मरुत्) का अर्थ हवा है। नन्दन का अर्थ बेटा है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान "मारुति" अर्थात "मारुत-नन्दन" यानि पवन पुत्र कहलाए।

 

बाल्यकाल की अद्भुत लीलाएँ

 

बाल्यकाल में ही मारुति ने अपनी दिव्य शक्तियों का परिचय दे दिया था - सूर्य को फल समझकर निगलने दौड़ पड़े और जब इंद्र के वज्र से चोट लगी तो उनका नाम 'हनुमान' पड़ा। हनु अर्थात ठोड़ी पर प्रहार होने से उन्हें देवताओं द्वारा हनुमान नाम मिला। देवताओं ने उन्हें वरदान दिए। इंद्र द्वारा प्रहार से पवन देव क्रोधित हो गए और पूरे ब्रह्मांड में वायु रोक दी, जीवन का संतुलन बिगड़ने लगा तब देवताओं ने हनुमान जी को अनेक वरदान दिए और पुनः वायु का संचार हुआ।

 

हनुमान जी के अवतार पर ज्योतिषी गणना

 

ज्योतिषियों की सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का अवतार 85 लाख 58 हजार 112 वर्ष पहले त्रेतायुग के अन्तिम चरण में हुआ था। हनुमान जी को आठ चिरंजीवियों में से एक माना जाता है। माता जानकी और श्रीराम के आशीर्वाद के फल स्वरुप आज भी हनुमान जी महाराज सशरीर इस पृथ्वी पर अदृश्य रूप से निवास करते हैं और जहाँ-जहाँ श्रीराम कथा या राम नाम का गायन-वादन होता है उस स्थान पर सूक्ष्म या अदृश्य रूप से हनुमान जी उपस्थित होते हैं।

 

:- रमन शर्मा