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उत्तर प्रदेश में है पारिजात का अद्भुत वृक्ष, जानिये, रहस्य और धार्मिक महिमा

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित पारिजात वृक्ष देश के सबसे रहस्यमयी और दुर्लभ वृक्षों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोग इसे केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि दिव्य कल्पवृक्ष के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अपनी अनोखी विशेषताओं, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक महत्व के कारण यह वृक्ष देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

 

कहाँ स्थित है पारिजात वृक्ष?

 

यह प्राचीन पारिजात वृक्ष उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के समीप जिला उद्योग केंद्र परिसर में स्थित है। इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से 'विरासत वृक्ष' घोषित कर संरक्षित किया हुआ है।

 

क्यों खास है पारिजात वृक्ष?

 

यह विशाल वृक्ष लगभग 40 से 50 फीट ऊंचा और करीब 10 फीट मोटा है। सुल्तानपुर के इस पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके न तो बीज होते हैं और न ही इसकी टहनियों या कलम से नया पौधा रोपा जा सकता है। यही कारण है कि इसे प्रकृति का एक दुर्लभ और रहस्यमयी चमत्कार माना जाता है। पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है,यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है!

 

कब खिलते हैं इसके फूल?

 

हर वर्ष जून के महीने में इस वृक्ष पर रात के समय सफेद रंग के सुंदर फूल खिलते हैं, जिनका डंठल सुनहरे या केसरिया रंग का होता है। सुबह होते-होते ये सभी फूल अपने आप जमीन पर गिर जाते हैं। धार्मिक मान्यता के कारण इस वृक्ष से फूल तोड़ना निषिद्ध माना जाता है और श्रद्धालु केवल भूमि पर गिरे हुए फूलों के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह पूरे भारत में पैदा होता है और पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प है।

 

पारिजात से जुड़ी पौराणिक मान्यता

 

इसे समुद्र मंथन से निकला 14 रत्नों में से एक माना जाता है जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। इंद्र के बगीचे में स्थित इस वृक्ष को सिर्फ उर्वशी को छूने का अधिकार था। इसके नीचे बैठने, या छूने मात्र से थकान दूर हो जाती है और नई ऊर्जा का संचार होता है। स्वर्ग में इसको छूने से देव नर्तकी उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम के इस वृक्ष के फूलों को देव मुनि नारद ने श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था,इन अदभूत फूलों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए!

 

सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया,जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात को प्राप्त कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया । भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था सत्यभामा की वाटिका में,परन्तु उसके फूल उनकी दूसरी पत्नी रूक्मणी की वाटिका में गिरते थे।

 

सुल्तानपुर में प्रचलित स्थानीय मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे। माता कुंती भगवान की पूजा कर सकें, इसके लिए उन्होंने इस दिव्य पारिजात वृक्ष की स्थापना यहां की थी। तभी से यह स्थान श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

 

पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में कल्पवृक्ष को ऐसा दिव्य वृक्ष माना गया है जो भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करता है। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

 

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

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सुल्तानपुर का यह पारिजात वृक्ष श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और श्रद्धा के साथ इस दिव्य वृक्ष के दर्शन कर प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। विशेष अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और इस अद्भुत देववृक्ष के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।

 

:- लता रानी

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उत्तर प्रदेश में है पारिजात का अद्भुत वृक्ष, जानिये, रहस्य और धार्मिक महिमा

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित पारिजात वृक्ष देश के सबसे रहस्यमयी और दुर्लभ वृक्षों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोग इसे केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि दिव्य कल्पवृक्ष के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अपनी अनोखी विशेषताओं, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक महत्व के कारण यह वृक्ष देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

 

कहाँ स्थित है पारिजात वृक्ष?

 

यह प्राचीन पारिजात वृक्ष उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के समीप जिला उद्योग केंद्र परिसर में स्थित है। इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से 'विरासत वृक्ष' घोषित कर संरक्षित किया हुआ है।

 

क्यों खास है पारिजात वृक्ष?

 

यह विशाल वृक्ष लगभग 40 से 50 फीट ऊंचा और करीब 10 फीट मोटा है। सुल्तानपुर के इस पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके न तो बीज होते हैं और न ही इसकी टहनियों या कलम से नया पौधा रोपा जा सकता है। यही कारण है कि इसे प्रकृति का एक दुर्लभ और रहस्यमयी चमत्कार माना जाता है। पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है,यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है!

 

कब खिलते हैं इसके फूल?

 

हर वर्ष जून के महीने में इस वृक्ष पर रात के समय सफेद रंग के सुंदर फूल खिलते हैं, जिनका डंठल सुनहरे या केसरिया रंग का होता है। सुबह होते-होते ये सभी फूल अपने आप जमीन पर गिर जाते हैं। धार्मिक मान्यता के कारण इस वृक्ष से फूल तोड़ना निषिद्ध माना जाता है और श्रद्धालु केवल भूमि पर गिरे हुए फूलों के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह पूरे भारत में पैदा होता है और पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प है।

 

पारिजात से जुड़ी पौराणिक मान्यता

 

इसे समुद्र मंथन से निकला 14 रत्नों में से एक माना जाता है जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। इंद्र के बगीचे में स्थित इस वृक्ष को सिर्फ उर्वशी को छूने का अधिकार था। इसके नीचे बैठने, या छूने मात्र से थकान दूर हो जाती है और नई ऊर्जा का संचार होता है। स्वर्ग में इसको छूने से देव नर्तकी उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम के इस वृक्ष के फूलों को देव मुनि नारद ने श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था,इन अदभूत फूलों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए!

 

सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया,जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात को प्राप्त कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया । भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था सत्यभामा की वाटिका में,परन्तु उसके फूल उनकी दूसरी पत्नी रूक्मणी की वाटिका में गिरते थे।

 

सुल्तानपुर में प्रचलित स्थानीय मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे। माता कुंती भगवान की पूजा कर सकें, इसके लिए उन्होंने इस दिव्य पारिजात वृक्ष की स्थापना यहां की थी। तभी से यह स्थान श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

 

पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में कल्पवृक्ष को ऐसा दिव्य वृक्ष माना गया है जो भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करता है। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

 

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

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सुल्तानपुर का यह पारिजात वृक्ष श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और श्रद्धा के साथ इस दिव्य वृक्ष के दर्शन कर प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। विशेष अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और इस अद्भुत देववृक्ष के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।

 

:- लता रानी