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सावन माह देवों के देव महादेव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस माह में आने वाली सावन शिवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्व है। इस बार यह पावन अवसर 11 अगस्त को है जब श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ (#shiv) का व्रत रखते हैं, रुद्राभिषेक करते हैं और पूरी श्रद्धा से शिव परिवार की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा के साथ शिवरात्रि व्रत कथा सुनने या पढ़ने से ही व्रत पूर्ण माना जाता है।
सावन की शिवरात्रि का महत्व
सावन की शिवरात्रि (#shivratri) भगवान शिव को समर्पित सबसे पावन तिथियों में से एक मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने, शिवलिंग का जलाभिषेक करने और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, रोग और शोक का नाश होता है तथा सुख, समृद्धि और मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।
सावन शिवरात्रि व्रत कैसे करें?
सावन (#sawan) शिवरात्रि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल, फलाहार या केवल जल ग्रहण करके व्रत रख सकते हैं। पूरे दिन भगवान शिव का स्मरण करें, सात्विक आचरण अपनाएं और क्रोध, झूठ, निंदा तथा तामसिक भोजन से दूर रहें। यदि संभव हो तो रात्रि जागरण करें। अगले दिन शुभ समय में व्रत का पारण करें।
सावन शिवरात्रि व्रत कथा
प्राचीन समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, जो जंगल में शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उस पर एक साहूकार का काफी कर्ज था। जब वह समय पर कर्ज नहीं चुका सका तो साहूकार ने उसे बंदी बना लिया। संयोग से जिस दिन चित्रभानु को बंदी बनाया गया, वह शिवरात्रि का दिन था।
बंदीगृह में रहते हुए चित्रभानु ने भगवान शिव की महिमा और शिवरात्रि व्रत की कथा सुनी। पूरा दिन वह बिना भोजन और जल के रहा। शाम होने पर साहूकार ने उसे एक दिन का समय देकर छोड़ दिया, ताकि वह कर्ज की व्यवस्था कर सके।
चित्रभानु सीधे जंगल की ओर चला गया। शिकार की तलाश में वह एक बेल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, जिसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। रातभर जागते हुए वह शिकार की प्रतीक्षा करता रहा। समय बिताने के लिए वह अनजाने में बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा, जो सीधे शिवलिंग पर अर्पित होते रहे। उसके हाथ में रखा जल भी टपक-टपक कर शिवलिंग पर गिरता रहा। इस प्रकार उससे अनजाने में भगवान शिव का अभिषेक और बेलपत्र अर्पण होता रहा।
रात के पहले प्रहर में एक गर्भवती हिरणी वहां आई। चित्रभानु ने उस पर बाण चलाने का विचार किया, लेकिन हिरणी ने विनती की कि वह गर्भवती है और अपने बच्चों को जन्म देकर वापस लौट आएगी। ऐसे में शिकारी ने उसे जाने दिया। दूसरे और तीसरे प्रहर में भी दो अन्य हिरणियां आईं। उन्होंने भी अपने परिवार से मिलकर लौटने की प्रार्थना की। चित्रभानु का हृदय पिघल गया और उसने उन्हें भी जाने दिया।
अंतिम प्रहर में एक हिरण अपने पूरे परिवार के साथ स्वयं शिकारी के सामने उपस्थित हुआ और कहा कि वे अपना वचन निभाने लौट आए हैं। यह देखकर चित्रभानु का हृदय पूरी तरह बदल गया। उसने किसी भी हिरण का शिकार नहीं किया और सभी को मुक्त कर दिया।
चित्रभानु के इस करुणा भाव, पूरे दिन के उपवास, रात्रि जागरण और अनजाने में हुई शिव पूजा से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर चित्रभानु को दर्शन दिए और उसे सुख, समृद्धि तथा मोक्ष का वरदान प्रदान किया। कहा जाता है कि अगले जन्म में वही चित्रभानु निषादराज के रूप में जन्मा और भगवान श्रीराम का परम भक्त बना।

