देवों के देव महादेव को यूं ही भोलेनाथ नहीं कहा जाता। वे अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वरदान दे देते हैं। हालांकि, पौराणिक कथाओं में एक ऐसा प्रसंग भी मिलता है, जब भगवान शिव का दिया हुआ वरदान स्वयं उनके लिए संकट का कारण बन गया। एक असुर ने वरदान मिलते ही उसी की शक्ति की परीक्षा भगवान शिव पर लेने की ठान ली। आखिर कौन था वह असुर और कैसे उसी के वरदान ने उसका विनाश कर दिया? आइए जानते हैं।
भस्मासुर ने की महादेव की कठोर तपस्या
सतयुग में हर तरफ सत्य और धर्म का राज्य था। देव हों या दानव, असुर हों या नाग—हर कोई अपनी-अपनी तरह से देवी-देवताओं की आराधना करता था। इन्हीं में एक था वृकासुर, जिसने भगवान शिव से मनचाहा वरदान पाने के लिए कठोर तपस्या शुरू की। वृकासुर लंबे समय तक महादेव(#mahadev) की तपस्या में लीन रहा। उसकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उससे मनचाहा वरदान मांगने को कहा। वृकासुर ने ऐसा वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रख दे, वह तत्काल भस्म हो जाए। भोलेनाथ ने उसकी इच्छा पूरी करते हुए उसे यह वरदान दे दिया। लेकिन वरदान मिलते ही वृकासुर के मन में एक शंका पैदा हुई। उसे विश्वास नहीं हुआ कि भगवान शिव का दिया हुआ वरदान वास्तव में प्रभावी है भी या नहीं।
वरदान की परीक्षा लेने दौड़ा वृकासुर
वृकासुर ने भगवान शिव से कहा कि वह इस वरदान की परीक्षा लेना चाहता है। उसने सोचा कि यहां भगवान शिव के अलावा कोई और मौजूद नहीं है, इसलिए क्यों न उन्हीं के सिर पर हाथ रखकर वरदान की शक्ति परखी जाए। वृकासुर की यह बात सुनते ही भगवान शिव वहां से आगे बढ़ गए और वृकासुर भी उनके पीछे दौड़ पड़ा। अब भगवान शिव को उसी के दिए वरदान से बचना था। भोलेनाथ का दिया हुआ वरदान स्वयं उनके लिए संकट बन चुका था। यह देखकर देवता भी चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु से इस संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।
मोहिनी के जाल में फंसा भस्मासुर
भगवान विष्णु (#narayan) ने वृकासुर को रोकने के लिए मोहिनी रूप धारण किया। उनका यह रूप इतना मनोहर और अलौकिक था कि वृकासुर भगवान शिव का पीछा करना भूल गया। मोहिनी को देखते ही उसके मन में उन्हें पाने की इच्छा जाग उठी। भगवान विष्णु ने मोहिनी के रूप में उससे प्रेमपूर्वक कहा कि अगर वह उसके नृत्य का अनुसरण करे, तो वह उससे प्रभावित हो सकती है। मोहिनी के इस प्रस्ताव को वृकासुर ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद मोहिनी नृत्य करने लगीं और वृकासुर उनकी हर मुद्रा की नकल करने लगा। नृत्य करते-करते मोहिनी ने एक ऐसी मुद्रा बनाई, जिसमें उन्होंने अपना हाथ अपने सिर पर रख लिया। मोहिनी के आकर्षण में पूरी तरह फंसा वृकासुर भी बिना सोचे-समझे उनकी नकल करते हुए अपना हाथ अपने सिर पर रख बैठा। जैसे ही उसका हाथ उसके सिर पर पड़ा, भगवान शिव का दिया हुआ वरदान तत्काल प्रभावी हो गया और वृकासुर वहीं भस्म हो गया।
इसी घटना के बाद वृकासुर को भस्मासुर के नाम से जाना गया। इस तरह भगवान विष्णु की लीला से भस्मासुर को मिला वही वरदान, जिसे वह अपनी शक्ति समझ रहा था, अंततः उसके अपने ही विनाश का कारण बन गया।
निष्कर्ष
भोलेबाबा (#shivshankar) अपने भक्तों पर सहज ही कृपा बरसाते हैं और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं। लेकिन भगवान की कृपा या शक्ति का दुरुपयोग करना स्वयं के लिए विनाश का कारण बन सकता है। भस्मासुर की कथा हमें यही सीख देती है कि अहंकार और शक्ति का दुरुपयोग अंततः व्यक्ति के अपने विनाश का कारण बनता है। इसलिए जीवन में मिली शक्ति, सामर्थ्य और सफलता का उपयोग सदैव सही मार्ग पर करना चाहिए।
:- देविशा केसरी

