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दही-हांडी के पीछे छिपी है बालकृष्ण की नटखट लीला

“जय कन्हैया लाल की…”

कान्हा का नाम लेते ही मन में उनकी मुस्कुराती छवि, बांसुरी की मधुर धुन और उनकी नटखट बाल लीलाएं याद आ जाती हैं। माखन चुराना हो, गोपियों को परेशान करना हो या दोस्तों के साथ मिलकर ऊंचाई पर टंगी मटकी फोड़ना । कृष्ण की हर लीला में कोई न कोई गहरा संदेश छिपा माना जाता है।

इन्हीं लीलाओं में दही हांडी की लीला सबसे खास और लोकप्रिय है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर कान्हा ऊंचाई पर टंगी मटकी ही क्यों फोड़ते थे? दही-माखन चुराने के पीछे क्या कारण था और इस लीला का असली महत्व क्या माना जाता है? आइए जानते हैं नंद के लाल की इस अनोखी लीला की कहानी।

 

कैसे हुई दही हांडी उत्सव की शुरुआत?

 

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण (#ShriKrishna) को माखन बेहद प्रिय था। इसलिए आज भी प्रभु के भोग में माखन को शामिल करने का विशेष महत्व माना जाता है। बाल्यकाल में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर जाकर माखन और दही चुरा लिया करते थे । इसी कारण उन्हें प्रेम से ‘माखन चोर’ भी कहा जाता है।

कृष्ण की इसी बाल लीला की स्मृति से दही हांडी उत्सव की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। श्रीकृष्ण की माखन चोरी और बाल लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में भी मिलता है।

 

क्यों ऊंचाई पर टांगी जाती थी दही की मटकी?

 

कृष्ण की इस आदत से परेशान होकर गोपियां दही और माखन को मटकी में भरकर ऊंचाई पर लटकाने लगीं ताकि कान्हा उस तक आसानी से न पहुंच सके। लेकिन कृष्ण और उनके सखा भी कम नहीं थे। वे मिलकर मानव पिरामिड बनाते और मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ देते। सबसे ऊपर पहुंचने वाला बालक मटकी फोड़ देता और फिर सभी मिलकर माखन-दही का आनंद लेते। आज दही हांडी उत्सव में बनने वाला मानव पिरामिड इसी बाल लीला की याद दिलाता है।

 

आखिर कृष्ण ने क्यों रची थी ये लीला?

 

कृष्ण की माखन चोरी को केवल शरारत मानना इस लीला के भाव को सीमित कर देना होगा। धार्मिक और लोक परंपराओं में इसे प्रेम, अपनत्व और आनंद से जोड़कर देखा जाता है।

कान्हा माखन अकेले अपने लिए नहीं रखते थे, बल्कि अपने सखाओं के साथ बांटकर खाते थे। इसलिए उनकी इस लीला में मिल-जुलकर खुशी बांटने और प्रेम से रहने का संदेश भी देखा जाता है।

एक मान्यता यह भी है कि कृष्ण अपनी बाल लीलाओं के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि भगवान को पाने के लिए अहंकार नहीं, बल्कि प्रेम, सरलता और निर्मल मन आवश्यक है।

 

कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?

 

जन्माष्टमी(#KrishnaJanmashtami) के अगले दिन कई स्थानों पर दही हांडी का आयोजन किया जाता है। मिट्टी की मटकी में दही या माखन भरकर उसे रस्सी के सहारे ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां वहां पहुंचती हैं। ढोल की थाप और ‘गोविंदा आला रे’ जैसे जयकारों के बीच मानव पिरामिड बनाकर हांडी तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

जैसे ही कोई टोली हांडी फोड़ने में सफल होती है, पूरा माहौल कृष्ण भक्ति और उत्सव के रंग में डूब जाता है। कई स्थानों पर इसे प्रतियोगिता के रूप में भी आयोजित किया जाता है।

 

दही हांडी का क्या महत्व है?

 

दही और माखन से भरी मटकी को समृद्धि, प्रेम और आनंद से जोड़कर देखा जाता है। वहीं मटकी तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे का सहारा लेना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि मिल-जुलकर मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है। कृष्ण की इस लीला में मित्रता, सहयोग, उत्साह और सामूहिकता का भाव दिखाई देता है।

 

क्या था इस लीला का संदेश?

 

कृष्ण की दही हांडी लीला से जुड़े संदेशों को इस तरह समझा जा सकता है- मिल-जुलकर आगे बढ़ना। खुशियां दूसरों के साथ बांटना। अहंकार छोड़कर प्रेम को अपनाना। कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारना। जीवन में आनंद और उत्साह बनाए रखना। मित्रता और सहयोग की भावना को मजबूत करना।

इसीलिए आज दही हांडी में जब युवा टोली बनाकर मटकी फोड़ते हैं, तो यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीला की स्मृति और सामूहिक उत्सव का प्रतीक भी माना जाता है।

 

2026 में कब मनाई जाएगी दही हांडी?

 

वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। इसके अगले दिन 5 सितंबर 2026 को दही हांडी उत्सव मनाया जाएगा। हालांकि, अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय परंपराओं के अनुसार आयोजन की तारीख या समय में अंतर हो सकता है।

 

आज भी गूंजता है ‘गोविंदा आला रे!’

 

जन्माष्टमी और उसके आसपास देश के कई हिस्सों में दही हांडी का आयोजन होता है। सड़कों और मैदानों में ऊंचाई पर मटकी बांधी जाती है और गोविंदा की टोलियां उसे फोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाती हैं। ढोल-नगाड़ों और “गोविंदा आला रे!” के जयकारों के बीच जब मटकी टूटती है, तो पूरा माहौल कृष्णमय हो उठता है।

 

:- लता रानी

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दही-हांडी के पीछे छिपी है बालकृष्ण की नटखट लीला

“जय कन्हैया लाल की…”

कान्हा का नाम लेते ही मन में उनकी मुस्कुराती छवि, बांसुरी की मधुर धुन और उनकी नटखट बाल लीलाएं याद आ जाती हैं। माखन चुराना हो, गोपियों को परेशान करना हो या दोस्तों के साथ मिलकर ऊंचाई पर टंगी मटकी फोड़ना । कृष्ण की हर लीला में कोई न कोई गहरा संदेश छिपा माना जाता है।

इन्हीं लीलाओं में दही हांडी की लीला सबसे खास और लोकप्रिय है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर कान्हा ऊंचाई पर टंगी मटकी ही क्यों फोड़ते थे? दही-माखन चुराने के पीछे क्या कारण था और इस लीला का असली महत्व क्या माना जाता है? आइए जानते हैं नंद के लाल की इस अनोखी लीला की कहानी।

 

कैसे हुई दही हांडी उत्सव की शुरुआत?

 

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण (#ShriKrishna) को माखन बेहद प्रिय था। इसलिए आज भी प्रभु के भोग में माखन को शामिल करने का विशेष महत्व माना जाता है। बाल्यकाल में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर जाकर माखन और दही चुरा लिया करते थे । इसी कारण उन्हें प्रेम से ‘माखन चोर’ भी कहा जाता है।

कृष्ण की इसी बाल लीला की स्मृति से दही हांडी उत्सव की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। श्रीकृष्ण की माखन चोरी और बाल लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में भी मिलता है।

 

क्यों ऊंचाई पर टांगी जाती थी दही की मटकी?

 

कृष्ण की इस आदत से परेशान होकर गोपियां दही और माखन को मटकी में भरकर ऊंचाई पर लटकाने लगीं ताकि कान्हा उस तक आसानी से न पहुंच सके। लेकिन कृष्ण और उनके सखा भी कम नहीं थे। वे मिलकर मानव पिरामिड बनाते और मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ देते। सबसे ऊपर पहुंचने वाला बालक मटकी फोड़ देता और फिर सभी मिलकर माखन-दही का आनंद लेते। आज दही हांडी उत्सव में बनने वाला मानव पिरामिड इसी बाल लीला की याद दिलाता है।

 

आखिर कृष्ण ने क्यों रची थी ये लीला?

 

कृष्ण की माखन चोरी को केवल शरारत मानना इस लीला के भाव को सीमित कर देना होगा। धार्मिक और लोक परंपराओं में इसे प्रेम, अपनत्व और आनंद से जोड़कर देखा जाता है।

कान्हा माखन अकेले अपने लिए नहीं रखते थे, बल्कि अपने सखाओं के साथ बांटकर खाते थे। इसलिए उनकी इस लीला में मिल-जुलकर खुशी बांटने और प्रेम से रहने का संदेश भी देखा जाता है।

एक मान्यता यह भी है कि कृष्ण अपनी बाल लीलाओं के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि भगवान को पाने के लिए अहंकार नहीं, बल्कि प्रेम, सरलता और निर्मल मन आवश्यक है।

 

कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?

 

जन्माष्टमी(#KrishnaJanmashtami) के अगले दिन कई स्थानों पर दही हांडी का आयोजन किया जाता है। मिट्टी की मटकी में दही या माखन भरकर उसे रस्सी के सहारे ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां वहां पहुंचती हैं। ढोल की थाप और ‘गोविंदा आला रे’ जैसे जयकारों के बीच मानव पिरामिड बनाकर हांडी तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

जैसे ही कोई टोली हांडी फोड़ने में सफल होती है, पूरा माहौल कृष्ण भक्ति और उत्सव के रंग में डूब जाता है। कई स्थानों पर इसे प्रतियोगिता के रूप में भी आयोजित किया जाता है।

 

दही हांडी का क्या महत्व है?

 

दही और माखन से भरी मटकी को समृद्धि, प्रेम और आनंद से जोड़कर देखा जाता है। वहीं मटकी तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे का सहारा लेना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि मिल-जुलकर मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है। कृष्ण की इस लीला में मित्रता, सहयोग, उत्साह और सामूहिकता का भाव दिखाई देता है।

 

क्या था इस लीला का संदेश?

 

कृष्ण की दही हांडी लीला से जुड़े संदेशों को इस तरह समझा जा सकता है- मिल-जुलकर आगे बढ़ना। खुशियां दूसरों के साथ बांटना। अहंकार छोड़कर प्रेम को अपनाना। कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारना। जीवन में आनंद और उत्साह बनाए रखना। मित्रता और सहयोग की भावना को मजबूत करना।

इसीलिए आज दही हांडी में जब युवा टोली बनाकर मटकी फोड़ते हैं, तो यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीला की स्मृति और सामूहिक उत्सव का प्रतीक भी माना जाता है।

 

2026 में कब मनाई जाएगी दही हांडी?

 

वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। इसके अगले दिन 5 सितंबर 2026 को दही हांडी उत्सव मनाया जाएगा। हालांकि, अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय परंपराओं के अनुसार आयोजन की तारीख या समय में अंतर हो सकता है।

 

आज भी गूंजता है ‘गोविंदा आला रे!’

 

जन्माष्टमी और उसके आसपास देश के कई हिस्सों में दही हांडी का आयोजन होता है। सड़कों और मैदानों में ऊंचाई पर मटकी बांधी जाती है और गोविंदा की टोलियां उसे फोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाती हैं। ढोल-नगाड़ों और “गोविंदा आला रे!” के जयकारों के बीच जब मटकी टूटती है, तो पूरा माहौल कृष्णमय हो उठता है।

 

:- लता रानी