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शिवकृपा से गुणनिधि कैसे बने कुबेर?

महादेव को करुणा का सागर, भोलेनाथ और आशुतोष कहा जाता है। वे केवल भक्त की पूजा नहीं, बल्कि उसके भाव को देखते हैं। यही कारण है कि भगवान शिव की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और भटका हुआ जीवन भी नई दिशा पा सकता है। शिवपुराण (#Shivapuran) में ऐसे ही एक व्यक्ति की कथा मिलती है, जिस पर भगवान शिव की ऐसी कृपा हुई कि वह आगे चलकर देवताओं के धनाध्यक्ष और सभी निधियों के स्वामी कुबेर बने। तो चलिए जानते हैं कुबेर की यह अद्भुत कथा।

 

गुणनिधि का भटकता जीवन

 

एक ब्राह्मण परिवार में एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया गुणनिधि, अर्थात गुणों का भंडार। उसके पिता यज्ञदत्त वेदों के ज्ञाता और धर्मपरायण व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनकी तरह विद्वान और सदाचारी बने। इसलिए उन्होंने बचपन से ही उसे अच्छे संस्कार दिए। लेकिन जैसे-जैसे गुणनिधि बड़ा हुआ, उसकी संगति गलत लोगों से हो गई। वह जुआ खेलने लगा और धीरे-धीरे उसकी जुए की लत इतनी बढ़ गई कि वह घर का धन और कीमती वस्तुएं तक जुए में गंवाने लगा। यहां तक कि वह अपने ही घर में चोरी करके सामान जुआरियों को बेचने लगा। जब पिता यज्ञदत्त को उसकी इन करतूतों का पता चला तो उन्होंने निराश होकर गुणनिधि को घर से निकाल दिया। घर से निकलने के बाद गुणनिधि गांव-गांव और जंगलों में भटकता रहा। लगातार भूखे रहने के कारण उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा। इसी भटकाव के दौरान वह एक नगर में पहुंचा, जहां उसके जीवन की दिशा बदलने वाली थी।

 

महाशिवरात्रि की वह रात

 

संयोग से जिस दिन गुणनिधि उस नगर में पहुंचा, उस दिन महाशिवरात्रि थी। पूरा नगर “हर-हर महादेव” के जयकारों से गूंज रहा था। श्रद्धालु बेलपत्र, दूध, फल और नैवेद्य लेकर शिव मंदिर की ओर जा रहे थे। भूखे गुणनिधि ने सोचा कि शायद मंदिर में उसे कुछ खाने को मिल जाए। इसी उम्मीद में वह भी भक्तों के पीछे-पीछे मंदिर में चला गया मंदिर में सभी लोग भगवान शिव की भक्ति में लीन थे, लेकिन गुणनिधि का ध्यान बार-बार भगवान को अर्पित किए गए नैवेद्य पर जा रहा था।

 

रात गहराने लगी और मंदिर में सन्नाटा छा गया। गुणनिधि ने शिवलिंग के पास रखा नैवेद्य लेने की कोशिश की, लेकिन दीपक की लौ मंद पड़ चुकी थी। उसे नैवेद्य ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। तब उसने अपने वस्त्र का एक छोटा-सा टुकड़ा फाड़कर दीपक की बाती बना दी। लौ तेज हो गई और उसे सब कुछ साफ दिखाई देने लगा। उसे पता भी नहीं था कि अनजाने में उससे भगवान शिव (#Bhagwanshiv) दीप-सेवा हो गई है। नैवेद्य लेकर बाहर निकलते समय उसका पैर वहां सोए एक भक्त पर पड़ गया। भक्त के चिल्लाने पर लोग जाग गए और गुणनिधि के पीछे दौड़ पड़े। भय और मारपीट के कारण वह ज्यादा दूर नहीं भाग सका और उसके प्राण निकल गए।

 

जब शिवगण गुणनिधि को लेने पहुंचे

 

जब यमदूत उसके प्राण लेने पहुंचे, उसी समय भगवान शिव के गण भी वहां आ गए। दोनों में विवाद होने लगा कि गुणनिधि पर किसका अधिकार है। शिवगणों ने कहा कि गुणनिधि ने महाशिवरात्रि के दिन उपवास किया, रात्रि-जागरण किया, भगवान शिव के दर्शन किए और उनके सामने दीपक प्रज्वलित किया। इन पुण्य कर्मों के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हो चुके हैं। यह सुनकर यमदूत पीछे हट गए और शिवगण गुणनिधि को अपने साथ शिवलोक ले गए। इसके बाद गुणनिधि ने अगले जन्म में राजा दमा के रूप में जन्म लिया। पूर्व जन्म के शिवभक्ति के पुण्य प्रभाव से उसके भीतर भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा जागी। उसने अनेक शिव मंदिरों (#Shivmandir) का निर्माण करवाया और उनमें भगवान शिव के सामने दीपक सदैव प्रज्वलित रहने की व्यवस्था की। उसका जीवन शिवभक्ति, धर्म और प्रजा की सेवा में बीता।

 

वैश्रवण कैसे बने कुबेर?

 

धर्ममय जीवन पूरा करने के बाद राजा दमा ने अगले जन्म में महर्षि विश्रवा के पुत्र वैश्रवण के रूप में जन्म लिया। वैश्रवण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए दस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें धन-संपदा की सभी निधियों का स्वामी, यक्षों का राजा और संसार का धनाध्यक्ष बनने का वरदान दिया। भगवान शिव ने उन्हें अपनी अटूट मित्रता का आशीर्वाद भी दिया। इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें कुबेर नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया। इसी के बाद वैश्रवण संसार में कुबेर के नाम से विख्यात हुए और धन के देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

 

:- देविशा केसरी

 

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शिवकृपा से गुणनिधि कैसे बने कुबेर?

महादेव को करुणा का सागर, भोलेनाथ और आशुतोष कहा जाता है। वे केवल भक्त की पूजा नहीं, बल्कि उसके भाव को देखते हैं। यही कारण है कि भगवान शिव की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और भटका हुआ जीवन भी नई दिशा पा सकता है। शिवपुराण (#Shivapuran) में ऐसे ही एक व्यक्ति की कथा मिलती है, जिस पर भगवान शिव की ऐसी कृपा हुई कि वह आगे चलकर देवताओं के धनाध्यक्ष और सभी निधियों के स्वामी कुबेर बने। तो चलिए जानते हैं कुबेर की यह अद्भुत कथा।

 

गुणनिधि का भटकता जीवन

 

एक ब्राह्मण परिवार में एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया गुणनिधि, अर्थात गुणों का भंडार। उसके पिता यज्ञदत्त वेदों के ज्ञाता और धर्मपरायण व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनकी तरह विद्वान और सदाचारी बने। इसलिए उन्होंने बचपन से ही उसे अच्छे संस्कार दिए। लेकिन जैसे-जैसे गुणनिधि बड़ा हुआ, उसकी संगति गलत लोगों से हो गई। वह जुआ खेलने लगा और धीरे-धीरे उसकी जुए की लत इतनी बढ़ गई कि वह घर का धन और कीमती वस्तुएं तक जुए में गंवाने लगा। यहां तक कि वह अपने ही घर में चोरी करके सामान जुआरियों को बेचने लगा। जब पिता यज्ञदत्त को उसकी इन करतूतों का पता चला तो उन्होंने निराश होकर गुणनिधि को घर से निकाल दिया। घर से निकलने के बाद गुणनिधि गांव-गांव और जंगलों में भटकता रहा। लगातार भूखे रहने के कारण उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा। इसी भटकाव के दौरान वह एक नगर में पहुंचा, जहां उसके जीवन की दिशा बदलने वाली थी।

 

महाशिवरात्रि की वह रात

 

संयोग से जिस दिन गुणनिधि उस नगर में पहुंचा, उस दिन महाशिवरात्रि थी। पूरा नगर “हर-हर महादेव” के जयकारों से गूंज रहा था। श्रद्धालु बेलपत्र, दूध, फल और नैवेद्य लेकर शिव मंदिर की ओर जा रहे थे। भूखे गुणनिधि ने सोचा कि शायद मंदिर में उसे कुछ खाने को मिल जाए। इसी उम्मीद में वह भी भक्तों के पीछे-पीछे मंदिर में चला गया मंदिर में सभी लोग भगवान शिव की भक्ति में लीन थे, लेकिन गुणनिधि का ध्यान बार-बार भगवान को अर्पित किए गए नैवेद्य पर जा रहा था।

 

रात गहराने लगी और मंदिर में सन्नाटा छा गया। गुणनिधि ने शिवलिंग के पास रखा नैवेद्य लेने की कोशिश की, लेकिन दीपक की लौ मंद पड़ चुकी थी। उसे नैवेद्य ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। तब उसने अपने वस्त्र का एक छोटा-सा टुकड़ा फाड़कर दीपक की बाती बना दी। लौ तेज हो गई और उसे सब कुछ साफ दिखाई देने लगा। उसे पता भी नहीं था कि अनजाने में उससे भगवान शिव (#Bhagwanshiv) दीप-सेवा हो गई है। नैवेद्य लेकर बाहर निकलते समय उसका पैर वहां सोए एक भक्त पर पड़ गया। भक्त के चिल्लाने पर लोग जाग गए और गुणनिधि के पीछे दौड़ पड़े। भय और मारपीट के कारण वह ज्यादा दूर नहीं भाग सका और उसके प्राण निकल गए।

 

जब शिवगण गुणनिधि को लेने पहुंचे

 

जब यमदूत उसके प्राण लेने पहुंचे, उसी समय भगवान शिव के गण भी वहां आ गए। दोनों में विवाद होने लगा कि गुणनिधि पर किसका अधिकार है। शिवगणों ने कहा कि गुणनिधि ने महाशिवरात्रि के दिन उपवास किया, रात्रि-जागरण किया, भगवान शिव के दर्शन किए और उनके सामने दीपक प्रज्वलित किया। इन पुण्य कर्मों के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हो चुके हैं। यह सुनकर यमदूत पीछे हट गए और शिवगण गुणनिधि को अपने साथ शिवलोक ले गए। इसके बाद गुणनिधि ने अगले जन्म में राजा दमा के रूप में जन्म लिया। पूर्व जन्म के शिवभक्ति के पुण्य प्रभाव से उसके भीतर भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा जागी। उसने अनेक शिव मंदिरों (#Shivmandir) का निर्माण करवाया और उनमें भगवान शिव के सामने दीपक सदैव प्रज्वलित रहने की व्यवस्था की। उसका जीवन शिवभक्ति, धर्म और प्रजा की सेवा में बीता।

 

वैश्रवण कैसे बने कुबेर?

 

धर्ममय जीवन पूरा करने के बाद राजा दमा ने अगले जन्म में महर्षि विश्रवा के पुत्र वैश्रवण के रूप में जन्म लिया। वैश्रवण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए दस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें धन-संपदा की सभी निधियों का स्वामी, यक्षों का राजा और संसार का धनाध्यक्ष बनने का वरदान दिया। भगवान शिव ने उन्हें अपनी अटूट मित्रता का आशीर्वाद भी दिया। इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें कुबेर नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया। इसी के बाद वैश्रवण संसार में कुबेर के नाम से विख्यात हुए और धन के देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

 

:- देविशा केसरी