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संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता हल छठ व्रत

जन्माष्टमी से पहले आने वाला हल षष्ठी या हल छठ हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद  मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जी का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन को बलराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से माताएं इस दिन व्रत रखती हैं।

 

हल षष्ठी को अलग-अलग क्षेत्रों में हल छठ, हर छठ, ललही छठ, संतान छठ, देव छठ और खमर छठ जैसे कई नामों से जाना जाता है। हालांकि नाम और पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन इस पर्व का मुख्य भाव संतान के मंगल और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है।

 

2 सितंबर को रखा जाएगा हल षष्ठी व्रत

 

इस वर्ष हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर 2026, बुधवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाएगा। जन्माष्टमी (#janmashtami) से दो दिन पहले आने वाले इस पर्व पर बलराम जी की पूजा की जाती है और संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखा जाता है।

 

हल छठ पर क्या किया जाता है?

 

धार्मिक मान्यता के अनुसार बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल था। इसी वजह से उनके जन्मोत्सव से जुड़ी षष्ठी तिथि को हल षष्ठी या हल छठ कहा जाता है। कृषि और हल से इस पर्व का विशेष संबंध होता है। कई जगह इस दिन किसान हल और अन्य कृषि उपकरणों की पूजा भी करते हैं।

 

व्रत के दौरान हल से जोती गई भूमि से उत्पन्न अनाज और खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता। इसी के साथ कई क्षेत्रों में गाय के दूध, दही और घी का सेवन भी वर्जित माना गया है। व्रत में जलस्रोतों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग करने की परंपरा है।

 

हल षष्ठी की पूजा में इन चीजों का होता है इस्तेमाल

 

हल छठ की पूजा में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कई स्थानों पर गोबर से पूजा स्थल या हर छठ तैयार की जाती है। इसके बाद झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियों को एक साथ बांधकर पूजा में रखा जाता है।

 

पूजन में चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का और महुआ जैसे अनाज या खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं। इसके बाद षष्ठी देवी और बलराम जी का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के दौरान महिलाएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती हैं। कई जगह हल षष्ठी की कथा भी सुनी जाती है।

 

हल षष्ठी की सरल पूजा विधि

 

हल षष्ठी के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके गोबर से लीपकर पूजा की जगह तैयार की जाती है। झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियों को बांधकर पूजा स्थल पर रखा जाता है। इसके बाद षष्ठी देवी और बलराम जी का स्मरण करते हुए चंदन, अक्षत, पुष्प, फल और पारंपरिक पूजा सामग्री अर्पित की जाती है।

 

इसके बाद हल षष्ठी की कथा सुनी जाती है। पूजा पूरी होने के बाद संतान के लिए मंगलकामना की जाती है। कई क्षेत्रों में बच्चों को धान का लावा, भुना हुआ महुआ, चना, मक्का और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं।

 

हल षष्ठी की कथा

 

प्राचीन काल की बात है। एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा और चिंता से व्याकुल थी, तो दूसरी ओर उसके मन में अपने दूध-दही को बेचने की चिंता भी थी।

 

उसने सोचा कि यदि घर में ही प्रसव हो गया, तो सारा गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा और वह उसे बेच नहीं पाएगी। इसी स्वार्थ के कारण उसने दूध-दही से भरे घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए गांव की ओर चल पड़ी।

 

लेकिन कुछ दूर पहुंचते ही उसे असहनीय प्रसव पीड़ा होने लगी। वह किसी तरह पास ही स्थित एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में चली गई और वहीं एक पुत्र को जन्म दिया। प्रसव के बाद भी उसके मन से गाय के दूध-दही को बेचने की चिंता बनी रही। उसने नवजात शिशु को झरबेरी के नीचे ही छोड़ दिया और स्वयं पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई।

 

संयोग से उस दिन हल छठ थी। हल छठ के दिन की मान्यता के अनुसार महिलाएं हल से जुते खेत में उत्पन्न अन्न तथा गाय के दूध का सेवन नहीं करती थीं और भैंस के दूध का उपयोग करती थीं।

 

ग्वालिन ने अपने स्वार्थ के कारण गाय और भैंस के दूध को मिलाकर रखा था। उसने गांव की भोली-भाली स्त्रियों से झूठ बोलते हुए गाय के दूध को भी भैंस का दूध बताकर बेच दिया। इस प्रकार उसने जानबूझकर उनसे असत्य कहा और उनके व्रत के नियम को भंग कर दिया।

 

उधर, जिस झरबेरी के नीचे ग्वालिन ने अपने नवजात पुत्र को छोड़ा था, उसके समीप ही एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल किसी कारणवश बिदक गए। हल का फल तेजी से पीछे की ओर आया और झरबेरी के नीचे पड़े बालक के शरीर में जा लगा। हल का फल लगने से बालक मृतप्राय हो गया।

 

किसान ने जब यह दृश्य देखा तो वह अत्यंत दुखी हो गया। उसे उस मासूम बच्चे पर बहुत दया आई। उसने सोचा कि बच्चे को यूं ही छोड़ देना उचित नहीं होगा। उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया और झरबेरी के कांटों की सहायता से बच्चे के चिरे हुए पेट को सी दिया। इसके बाद वह वहां से चला गया।

 

कुछ समय बाद ग्वालिन दूध-दही बेचकर वापस लौटी। जब उसने झरबेरी के नीचे अपने बच्चे की अवस्था देखी तो उसके होश उड़ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह मन ही मन सोचने लगी— मैंने अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोला। मैंने गांव की स्त्रियों को गाय का दूध भैंस का दूध बताकर बेच दिया और उनके धर्म-व्रत को भंग कराया। निश्चित रूप से मेरे इसी पाप का फल मेरे बच्चे को मिला है।

 

ग्वालिन को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। उसने निश्चय किया कि वह अपने किए हुए अपराध को सभी के सामने स्वीकार करेगी और सच्चे मन से प्रायश्चित करेगी। वह उसी गांव में पहुंची, जहां उसने दूध बेचा था। वह गली-गली घूमकर गांव की स्त्रियों को सारी घटना बताने लगी। उसने अपने झूठ को स्वीकार किया और उनसे क्षमा मांगते हुए कहा- बहनों, मैंने अपने स्वार्थ के लिए आपसे झूठ बोला। मैंने आपको गाय का दूध भैंस का दूध बताकर बेच दिया। मेरे इसी अपराध के कारण मेरे बच्चे को यह दंड मिला है। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए। ग्वालिन की सच्चाई और पश्चाताप देखकर गांव की स्त्रियों का हृदय पिघल गया। उन्होंने उसे क्षमा कर दिया और उसके बच्चे के लिए मंगलकामना करते हुए उसे आशीर्वाद दिया।

 

कहा जाता है कि अनेक स्त्रियों से क्षमा और आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद जब ग्वालिन वापस झरबेरी के पास पहुंची, तो वहां का दृश्य देखकर वह स्तब्ध रह गई। जिस बच्चे को वह मृत समझकर छोड़ गई थी, वही बालक वहां जीवित अवस्था में प्राप्त हुआ।

 

अपने पुत्र को जीवित देखकर ग्वालिन की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने इसे हल षष्ठी माता की कृपा और अपने सच्चे पश्चाताप का फल माना। साथ ही ग्वालिन ने मन में षष्ठी मां को प्रणाम करते हुए प्रार्थना की कि हल षष्ठी माता आपकी कृपा सभी माताओं और उनके संतानों पर बनी रहे।

 

गुजरात में राधन छठ के नाम से मनाया जाता है

 

हल षष्ठी की परंपराएं पूरे देश में एक जैसी नहीं हैं। गुजरात में इसे राधन छठ के नाम से जाना जाता है। यहां इस दिन शीतला माता की पूजा करने की परंपरा है। वहीं उत्तर भारत के कई हिस्सों में षष्ठी देवी और छठी मैया की पूजा की जाती है।

 

कुछ क्षेत्रों में महिलाएं इसे बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाती हैं, जबकि कहीं इसे संतान की रक्षा और दीर्घायु से जुड़े व्रत के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। अलग-अलग परंपराओं के बावजूद इस पर्व की मूल भावना संतान के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना ही है।

 

हल षष्ठी का धार्मिक महत्व

 

धार्मिक मान्यता है कि हल षष्ठी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से बलराम जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। वहीं संतान की इच्छा रखने वाले दंपति भी अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इस दिन पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

 

हल षष्ठी कृषि और प्रकृति से भी जुड़ा पर्व है। इस दिन हल से जुड़ी वस्तुओं का सम्मान और खेत में पैदा होने वाले अनाज का त्याग बलराम जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है। इस तरह हल छठ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि संतान की मंगलकामना, कृषि परंपरा और बलराम जी की आराधना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।

 

:- लता रानी

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संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता हल छठ व्रत

जन्माष्टमी से पहले आने वाला हल षष्ठी या हल छठ हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद  मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जी का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन को बलराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से माताएं इस दिन व्रत रखती हैं।

 

हल षष्ठी को अलग-अलग क्षेत्रों में हल छठ, हर छठ, ललही छठ, संतान छठ, देव छठ और खमर छठ जैसे कई नामों से जाना जाता है। हालांकि नाम और पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन इस पर्व का मुख्य भाव संतान के मंगल और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है।

 

2 सितंबर को रखा जाएगा हल षष्ठी व्रत

 

इस वर्ष हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर 2026, बुधवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाएगा। जन्माष्टमी (#janmashtami) से दो दिन पहले आने वाले इस पर्व पर बलराम जी की पूजा की जाती है और संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखा जाता है।

 

हल छठ पर क्या किया जाता है?

 

धार्मिक मान्यता के अनुसार बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल था। इसी वजह से उनके जन्मोत्सव से जुड़ी षष्ठी तिथि को हल षष्ठी या हल छठ कहा जाता है। कृषि और हल से इस पर्व का विशेष संबंध होता है। कई जगह इस दिन किसान हल और अन्य कृषि उपकरणों की पूजा भी करते हैं।

 

व्रत के दौरान हल से जोती गई भूमि से उत्पन्न अनाज और खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता। इसी के साथ कई क्षेत्रों में गाय के दूध, दही और घी का सेवन भी वर्जित माना गया है। व्रत में जलस्रोतों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग करने की परंपरा है।

 

हल षष्ठी की पूजा में इन चीजों का होता है इस्तेमाल

 

हल छठ की पूजा में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कई स्थानों पर गोबर से पूजा स्थल या हर छठ तैयार की जाती है। इसके बाद झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियों को एक साथ बांधकर पूजा में रखा जाता है।

 

पूजन में चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का और महुआ जैसे अनाज या खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं। इसके बाद षष्ठी देवी और बलराम जी का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के दौरान महिलाएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती हैं। कई जगह हल षष्ठी की कथा भी सुनी जाती है।

 

हल षष्ठी की सरल पूजा विधि

 

हल षष्ठी के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके गोबर से लीपकर पूजा की जगह तैयार की जाती है। झरबेरी, पलाश और कांस की टहनियों को बांधकर पूजा स्थल पर रखा जाता है। इसके बाद षष्ठी देवी और बलराम जी का स्मरण करते हुए चंदन, अक्षत, पुष्प, फल और पारंपरिक पूजा सामग्री अर्पित की जाती है।

 

इसके बाद हल षष्ठी की कथा सुनी जाती है। पूजा पूरी होने के बाद संतान के लिए मंगलकामना की जाती है। कई क्षेत्रों में बच्चों को धान का लावा, भुना हुआ महुआ, चना, मक्का और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं।

 

हल षष्ठी की कथा

 

प्राचीन काल की बात है। एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा और चिंता से व्याकुल थी, तो दूसरी ओर उसके मन में अपने दूध-दही को बेचने की चिंता भी थी।

 

उसने सोचा कि यदि घर में ही प्रसव हो गया, तो सारा गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा और वह उसे बेच नहीं पाएगी। इसी स्वार्थ के कारण उसने दूध-दही से भरे घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए गांव की ओर चल पड़ी।

 

लेकिन कुछ दूर पहुंचते ही उसे असहनीय प्रसव पीड़ा होने लगी। वह किसी तरह पास ही स्थित एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में चली गई और वहीं एक पुत्र को जन्म दिया। प्रसव के बाद भी उसके मन से गाय के दूध-दही को बेचने की चिंता बनी रही। उसने नवजात शिशु को झरबेरी के नीचे ही छोड़ दिया और स्वयं पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई।

 

संयोग से उस दिन हल छठ थी। हल छठ के दिन की मान्यता के अनुसार महिलाएं हल से जुते खेत में उत्पन्न अन्न तथा गाय के दूध का सेवन नहीं करती थीं और भैंस के दूध का उपयोग करती थीं।

 

ग्वालिन ने अपने स्वार्थ के कारण गाय और भैंस के दूध को मिलाकर रखा था। उसने गांव की भोली-भाली स्त्रियों से झूठ बोलते हुए गाय के दूध को भी भैंस का दूध बताकर बेच दिया। इस प्रकार उसने जानबूझकर उनसे असत्य कहा और उनके व्रत के नियम को भंग कर दिया।

 

उधर, जिस झरबेरी के नीचे ग्वालिन ने अपने नवजात पुत्र को छोड़ा था, उसके समीप ही एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल किसी कारणवश बिदक गए। हल का फल तेजी से पीछे की ओर आया और झरबेरी के नीचे पड़े बालक के शरीर में जा लगा। हल का फल लगने से बालक मृतप्राय हो गया।

 

किसान ने जब यह दृश्य देखा तो वह अत्यंत दुखी हो गया। उसे उस मासूम बच्चे पर बहुत दया आई। उसने सोचा कि बच्चे को यूं ही छोड़ देना उचित नहीं होगा। उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया और झरबेरी के कांटों की सहायता से बच्चे के चिरे हुए पेट को सी दिया। इसके बाद वह वहां से चला गया।

 

कुछ समय बाद ग्वालिन दूध-दही बेचकर वापस लौटी। जब उसने झरबेरी के नीचे अपने बच्चे की अवस्था देखी तो उसके होश उड़ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह मन ही मन सोचने लगी— मैंने अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोला। मैंने गांव की स्त्रियों को गाय का दूध भैंस का दूध बताकर बेच दिया और उनके धर्म-व्रत को भंग कराया। निश्चित रूप से मेरे इसी पाप का फल मेरे बच्चे को मिला है।

 

ग्वालिन को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। उसने निश्चय किया कि वह अपने किए हुए अपराध को सभी के सामने स्वीकार करेगी और सच्चे मन से प्रायश्चित करेगी। वह उसी गांव में पहुंची, जहां उसने दूध बेचा था। वह गली-गली घूमकर गांव की स्त्रियों को सारी घटना बताने लगी। उसने अपने झूठ को स्वीकार किया और उनसे क्षमा मांगते हुए कहा- बहनों, मैंने अपने स्वार्थ के लिए आपसे झूठ बोला। मैंने आपको गाय का दूध भैंस का दूध बताकर बेच दिया। मेरे इसी अपराध के कारण मेरे बच्चे को यह दंड मिला है। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए। ग्वालिन की सच्चाई और पश्चाताप देखकर गांव की स्त्रियों का हृदय पिघल गया। उन्होंने उसे क्षमा कर दिया और उसके बच्चे के लिए मंगलकामना करते हुए उसे आशीर्वाद दिया।

 

कहा जाता है कि अनेक स्त्रियों से क्षमा और आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद जब ग्वालिन वापस झरबेरी के पास पहुंची, तो वहां का दृश्य देखकर वह स्तब्ध रह गई। जिस बच्चे को वह मृत समझकर छोड़ गई थी, वही बालक वहां जीवित अवस्था में प्राप्त हुआ।

 

अपने पुत्र को जीवित देखकर ग्वालिन की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने इसे हल षष्ठी माता की कृपा और अपने सच्चे पश्चाताप का फल माना। साथ ही ग्वालिन ने मन में षष्ठी मां को प्रणाम करते हुए प्रार्थना की कि हल षष्ठी माता आपकी कृपा सभी माताओं और उनके संतानों पर बनी रहे।

 

गुजरात में राधन छठ के नाम से मनाया जाता है

 

हल षष्ठी की परंपराएं पूरे देश में एक जैसी नहीं हैं। गुजरात में इसे राधन छठ के नाम से जाना जाता है। यहां इस दिन शीतला माता की पूजा करने की परंपरा है। वहीं उत्तर भारत के कई हिस्सों में षष्ठी देवी और छठी मैया की पूजा की जाती है।

 

कुछ क्षेत्रों में महिलाएं इसे बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाती हैं, जबकि कहीं इसे संतान की रक्षा और दीर्घायु से जुड़े व्रत के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। अलग-अलग परंपराओं के बावजूद इस पर्व की मूल भावना संतान के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना ही है।

 

हल षष्ठी का धार्मिक महत्व

 

धार्मिक मान्यता है कि हल षष्ठी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से बलराम जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। वहीं संतान की इच्छा रखने वाले दंपति भी अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इस दिन पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

 

हल षष्ठी कृषि और प्रकृति से भी जुड़ा पर्व है। इस दिन हल से जुड़ी वस्तुओं का सम्मान और खेत में पैदा होने वाले अनाज का त्याग बलराम जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है। इस तरह हल छठ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि संतान की मंगलकामना, कृषि परंपरा और बलराम जी की आराधना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।

 

:- लता रानी