सनातन धर्म में तीज व्रत का अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक और सांसारिक महत्व है। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि ( 15 अगस्त) को मनाई जाने वाली हरियाली तीज विशेष रूप से विवाहित और अविवाहित स्त्रियों के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह व्रत माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को प्राप्त करने हेतु किए गए कठिन तप और उनके पावन पुनर्मिलन की स्मृति में रखा जाता है। इस तीज कोश्रृंगार तीज, चोटी तीज और श्रावणी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व का वर्णन हमें स्कंद पुराण, शिव महापुराण, लिंग पुराण तथा वामन पुराण में मिलता है, जहाँ इस व्रत की महिमा, पार्वती जी की तपस्या, स्त्री-धर्म और शिव-पार्वती विवाह का अद्भुत चित्रण मिलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल मेंहिमवानपर्वत के यहांपार्वतीनाम की कन्या जन्मी थी। वह पूर्वजन्म में भी भगवान शिव की अर्धांगिनी थी, परंतु दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने अपमान से आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। अगले जन्म में पार्वती के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही माता पार्वती भगवान शिव को अपना पति मानकर उन्हें प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तप करने लगीं। वर्षों तक उन्होंने जंगलों में रहकर कठिन तप किया – कभी केवल पत्तों पर जीवित रहीं, कभी जलत्याग कर सूखे पत्तों का सेवन किया, और अंत में निर्जल और निराहार रहकर भगवान शिव की आराधना करती रहीं। यह तपस्या उन्होंने108 जन्मोंतक की, जिनमें विशेष रूप सेश्रावण मासकीशुक्ल तृतीयाको उपवास रखकर उन्होंने शिव को प्रसन्न किया।
शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि एक दिन नारद मुनि भगवान शिव से बोले – "हे नीलकंठ! पार्वती जी ने आपको प्राप्त करने हेतु बहुत वर्षों से कठिन तप किया है। आप उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करें।" तब भगवान शिव पार्वती के समक्ष प्रकट हुए और उनकी भक्ति, निष्ठा, संयम और तप से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन का पर्व हैहरियाली तीज, जिसे माता पार्वती के सौभाग्य, प्रेम, समर्पण और स्त्री-धर्म की प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हरियाली तीज केवल एक धार्मिक उपवास नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संकल्प भी है, जहाँ एक स्त्री अपनी श्रद्धा, प्रेम और समर्पण के माध्यम से परमेश्वर को प्राप्त करती है।
यह व्रत यह बताता है कि यदि नारी के भीतर संकल्प शक्ति और सत्य प्रेम हो, तो वह ब्रह्म को भी अपने वश में कर सकती है। व्रत में माता पार्वती की मूर्ति या चित्र को झूले में बैठाया जाता है, क्योंकि कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने पार्वती को स्वीकार किया, तब उनकी सखियों ने आनंद और उत्सव में पार्वती जी को झूला झुलाया। इसी कारण इस दिन झूला झूलने की परंपरा है, जिसेहरियाली उत्सवके रूप में भी मनाया जाता है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की उस श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है, जिसमें नारी की शक्ति, तपस्या और प्रेम के बल पर भगवान स्वयं उसके चरणों में आते हैं। यह पर्व हमें जीवन मेंनिष्ठा, प्रेम, धैर्यऔरआध्यात्मिक समर्पणका पाठ सिखाता है। श्रावण की हरियाली में जब स्त्रियाँ हरे वस्त्र पहनकर, मेंहंदी रचाकर, गीत गाते हुए भगवान शिव-पार्वती का पूजन करती हैं, तो यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्किशक्ति और शिव के मिलनकी दिव्य अनुभूति होती है।
सनातन धर्म में तीज व्रत का अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक और सांसारिक महत्व है। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि ( 15 अगस्त) को मनाई जाने वाली हरियाली तीज विशेष रूप से विवाहित और अविवाहित स्त्रियों के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह व्रत माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को प्राप्त करने हेतु किए गए कठिन तप और उनके पावन पुनर्मिलन की स्मृति में रखा जाता है। इस तीज कोश्रृंगार तीज, चोटी तीज और श्रावणी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व का वर्णन हमें स्कंद पुराण, शिव महापुराण, लिंग पुराण तथा वामन पुराण में मिलता है, जहाँ इस व्रत की महिमा, पार्वती जी की तपस्या, स्त्री-धर्म और शिव-पार्वती विवाह का अद्भुत चित्रण मिलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल मेंहिमवानपर्वत के यहांपार्वतीनाम की कन्या जन्मी थी। वह पूर्वजन्म में भी भगवान शिव की अर्धांगिनी थी, परंतु दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने अपमान से आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। अगले जन्म में पार्वती के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही माता पार्वती भगवान शिव को अपना पति मानकर उन्हें प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तप करने लगीं। वर्षों तक उन्होंने जंगलों में रहकर कठिन तप किया – कभी केवल पत्तों पर जीवित रहीं, कभी जलत्याग कर सूखे पत्तों का सेवन किया, और अंत में निर्जल और निराहार रहकर भगवान शिव की आराधना करती रहीं। यह तपस्या उन्होंने108 जन्मोंतक की, जिनमें विशेष रूप सेश्रावण मासकीशुक्ल तृतीयाको उपवास रखकर उन्होंने शिव को प्रसन्न किया।
शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि एक दिन नारद मुनि भगवान शिव से बोले – "हे नीलकंठ! पार्वती जी ने आपको प्राप्त करने हेतु बहुत वर्षों से कठिन तप किया है। आप उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करें।" तब भगवान शिव पार्वती के समक्ष प्रकट हुए और उनकी भक्ति, निष्ठा, संयम और तप से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन का पर्व हैहरियाली तीज, जिसे माता पार्वती के सौभाग्य, प्रेम, समर्पण और स्त्री-धर्म की प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हरियाली तीज केवल एक धार्मिक उपवास नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संकल्प भी है, जहाँ एक स्त्री अपनी श्रद्धा, प्रेम और समर्पण के माध्यम से परमेश्वर को प्राप्त करती है।
यह व्रत यह बताता है कि यदि नारी के भीतर संकल्प शक्ति और सत्य प्रेम हो, तो वह ब्रह्म को भी अपने वश में कर सकती है। व्रत में माता पार्वती की मूर्ति या चित्र को झूले में बैठाया जाता है, क्योंकि कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने पार्वती को स्वीकार किया, तब उनकी सखियों ने आनंद और उत्सव में पार्वती जी को झूला झुलाया। इसी कारण इस दिन झूला झूलने की परंपरा है, जिसेहरियाली उत्सवके रूप में भी मनाया जाता है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की उस श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है, जिसमें नारी की शक्ति, तपस्या और प्रेम के बल पर भगवान स्वयं उसके चरणों में आते हैं। यह पर्व हमें जीवन मेंनिष्ठा, प्रेम, धैर्यऔरआध्यात्मिक समर्पणका पाठ सिखाता है। श्रावण की हरियाली में जब स्त्रियाँ हरे वस्त्र पहनकर, मेंहंदी रचाकर, गीत गाते हुए भगवान शिव-पार्वती का पूजन करती हैं, तो यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्किशक्ति और शिव के मिलनकी दिव्य अनुभूति होती है।