जन्म-जन्मांतर के पापों को नष्ट करती है ‘षटतिला एकादशी’
एकादशी हिंदू धर्म की एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक तिथि मानी जाती है। इसी में एक – षटतिला एकादशी माघ माह में आती है और भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष रूप से लोकप्रिया है। इस दिन व्रत रखने, विष्णु जी की आराधना करने और तिल का दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि षटतिला एकादशी के व्रत और तिल से जुड़े छह धार्मिक कर्मों को करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है । आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ खास बातें।
2026 में षटतिला एकादशी
हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026 रखा जाएगा साथ ही व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को यानी 15 जनवरी को सुबह 07:15 तक होगा।
क्यों कहते हैं इसे षटिलता एकादशी ?
इस एकादशी में तिल के छह विशेष प्रयोगों का अत्यंत महत्व बताया गया है जैसे -
तिल का स्नान
तिल का उबटन लगाना
तिल से हवन करना
तिल का तर्पण करना
तिल का भोजन करना
तिल का दान करना
लोकमान्यता के अनुसार षटतिला एकादशी के दिन इन छह प्रकार से तिल का प्रयोग करने से जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
षटतिला एकादशी की पूजा विधि
षटतिला एकादशी के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इस दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त में जागकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करके घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें । दीपक जलाएं, हाथ में तिल, जल और पुष्प लेकर पूरे मन से षटतिला एकादशी के व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी पत्र और तिल अर्पित करके पूजा करें। तिल-गुड़ या तिल से बने पदार्थों का श्रद्धा पूर्वक दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करें। इस प्रकार षटतिला एकादशी की पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
षटतिला एकादशी व्रत कथा
बहुत समय पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह अत्यंत धार्मिक स्वभाव की थी और नियमित रूप से व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार उसने पूरे एक मास तक लगातार उपवास किया, जिससे उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया। वह अत्यंत बुद्धिमान थी, लेकिन उसके आचरण में एक कमी थी । उसने कभी भी देवताओं और ब्राह्मणों के लिए अन्न या अन्य वस्तुओं का दान नहीं किया था। यह देखकर भगवान नारायण ने विचार किया कि इस ब्राह्मणी ने व्रत-उपवास के माध्यम से अपने शरीर को तो पवित्र कर लिया है और इसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति भी हो सकती है, लेकिन अन्नदान के बिना किसी भी जीव की पूर्ण तृप्ति संभव नहीं है। ऐसा विचार कर भगवान नारायण योगीराज के रूप में मृत्युलोक में आए और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने विनम्रता से पूछा, “हे योगीराज! आप यहाँ किसलिए पधारे हैं?”नारायण ने कहा कि उन्हें भिक्षा चाहिए। इस पर ब्राह्मणी ने उन्हें अन्न के स्थान पर एक मिट्टी का पिंड दे दिया। भगवान नारायण उस मिट्टी के पिंड को लेकर वैकुंठ लौट आए। कुछ समय बाद जब उस ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्यागा, तो वह स्वर्ग लोक पहुँची। उस मिट्टी के पिंड के प्रभाव से उसे स्वर्ग में एक घर प्राप्त हुआ, जिसमें एक आम का वृक्ष भी था, लेकिन घर में अन्य कोई वस्तु नहीं थी। अपने घर को खाली देखकर वह घबरा गई और भगवान नारायण के पास जाकर बोली, “हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत-उपवास कर आपकी पूजा की है, फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त क्यों है?” तब नारायण ने उसे अपने घर लौटने को कहा और यह निर्देश दिया कि जब देवियां उसे देखने आएं, तब वह उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और उसका विधान पूछे। जब तक वे उसे यह न बता दें, तब तक वह द्वार न खोले। प्रभु की आज्ञा मानकर वह ब्राह्मणी अपने घर गई। कुछ समय बाद देवियां उसे देखने आईं और द्वार खोलने का आग्रह करने लगीं। तब ब्राह्मणी ने कहा, “यदि आप मुझे देखने आई हैं, तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताइए।” तब उन देवियों में से एक ने कहा, “यदि यही तुम्हारी इच्छा है, तो ध्यानपूर्वक सुनो। मैं तुम्हें एकादशी व्रत का विधान और उसका महत्व बताती हूँ।” जब देवियों ने षटतिला एकादशी का महात्म्य सुना दिया, तब ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया। फिर ब्राह्मणी ने उनके बताए अनुसार विधिपूर्वक षटतिला एकादशी का उपवास किया। इस व्रत के प्रभाव से उसका घर धन-धान्य और सभी सुख-साधनों से भर गया। इससे यह सिद्ध होता है कि धार्मिक कृत्यों के साथ - साथ दान का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि बिना दान के कोई भी धार्मिक कार्य पूर्ण नहीं होता। इसलिए व्रत, पूजा और उपासना के साथ दान अवश्य करना चाहिए।
जन्म-जन्मांतर के पापों को नष्ट करती है ‘षटतिला एकादशी’
एकादशी हिंदू धर्म की एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक तिथि मानी जाती है। इसी में एक – षटतिला एकादशी माघ माह में आती है और भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष रूप से लोकप्रिया है। इस दिन व्रत रखने, विष्णु जी की आराधना करने और तिल का दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि षटतिला एकादशी के व्रत और तिल से जुड़े छह धार्मिक कर्मों को करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है । आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ खास बातें।
2026 में षटतिला एकादशी
हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026 रखा जाएगा साथ ही व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को यानी 15 जनवरी को सुबह 07:15 तक होगा।
क्यों कहते हैं इसे षटिलता एकादशी ?
इस एकादशी में तिल के छह विशेष प्रयोगों का अत्यंत महत्व बताया गया है जैसे -
तिल का स्नान
तिल का उबटन लगाना
तिल से हवन करना
तिल का तर्पण करना
तिल का भोजन करना
तिल का दान करना
लोकमान्यता के अनुसार षटतिला एकादशी के दिन इन छह प्रकार से तिल का प्रयोग करने से जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
षटतिला एकादशी की पूजा विधि
षटतिला एकादशी के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इस दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त में जागकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करके घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें । दीपक जलाएं, हाथ में तिल, जल और पुष्प लेकर पूरे मन से षटतिला एकादशी के व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी पत्र और तिल अर्पित करके पूजा करें। तिल-गुड़ या तिल से बने पदार्थों का श्रद्धा पूर्वक दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करें। इस प्रकार षटतिला एकादशी की पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
षटतिला एकादशी व्रत कथा
बहुत समय पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह अत्यंत धार्मिक स्वभाव की थी और नियमित रूप से व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार उसने पूरे एक मास तक लगातार उपवास किया, जिससे उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया। वह अत्यंत बुद्धिमान थी, लेकिन उसके आचरण में एक कमी थी । उसने कभी भी देवताओं और ब्राह्मणों के लिए अन्न या अन्य वस्तुओं का दान नहीं किया था। यह देखकर भगवान नारायण ने विचार किया कि इस ब्राह्मणी ने व्रत-उपवास के माध्यम से अपने शरीर को तो पवित्र कर लिया है और इसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति भी हो सकती है, लेकिन अन्नदान के बिना किसी भी जीव की पूर्ण तृप्ति संभव नहीं है। ऐसा विचार कर भगवान नारायण योगीराज के रूप में मृत्युलोक में आए और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने विनम्रता से पूछा, “हे योगीराज! आप यहाँ किसलिए पधारे हैं?”नारायण ने कहा कि उन्हें भिक्षा चाहिए। इस पर ब्राह्मणी ने उन्हें अन्न के स्थान पर एक मिट्टी का पिंड दे दिया। भगवान नारायण उस मिट्टी के पिंड को लेकर वैकुंठ लौट आए। कुछ समय बाद जब उस ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्यागा, तो वह स्वर्ग लोक पहुँची। उस मिट्टी के पिंड के प्रभाव से उसे स्वर्ग में एक घर प्राप्त हुआ, जिसमें एक आम का वृक्ष भी था, लेकिन घर में अन्य कोई वस्तु नहीं थी। अपने घर को खाली देखकर वह घबरा गई और भगवान नारायण के पास जाकर बोली, “हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत-उपवास कर आपकी पूजा की है, फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त क्यों है?” तब नारायण ने उसे अपने घर लौटने को कहा और यह निर्देश दिया कि जब देवियां उसे देखने आएं, तब वह उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और उसका विधान पूछे। जब तक वे उसे यह न बता दें, तब तक वह द्वार न खोले। प्रभु की आज्ञा मानकर वह ब्राह्मणी अपने घर गई। कुछ समय बाद देवियां उसे देखने आईं और द्वार खोलने का आग्रह करने लगीं। तब ब्राह्मणी ने कहा, “यदि आप मुझे देखने आई हैं, तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताइए।” तब उन देवियों में से एक ने कहा, “यदि यही तुम्हारी इच्छा है, तो ध्यानपूर्वक सुनो। मैं तुम्हें एकादशी व्रत का विधान और उसका महत्व बताती हूँ।” जब देवियों ने षटतिला एकादशी का महात्म्य सुना दिया, तब ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया। फिर ब्राह्मणी ने उनके बताए अनुसार विधिपूर्वक षटतिला एकादशी का उपवास किया। इस व्रत के प्रभाव से उसका घर धन-धान्य और सभी सुख-साधनों से भर गया। इससे यह सिद्ध होता है कि धार्मिक कृत्यों के साथ - साथ दान का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि बिना दान के कोई भी धार्मिक कार्य पूर्ण नहीं होता। इसलिए व्रत, पूजा और उपासना के साथ दान अवश्य करना चाहिए।