बोरेश्वर महादेव की अनोखी महिमा - चंबल करती है आधी परिक्रमा
महाशिवरात्रि का पावन पर्व के लिए पूरे देश में शिवभक्त तैयारियों में जुटे हैं। हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और भजन-कीर्तन होते हैं। उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल की नगरी कहा जाता है, वहां इस पर्व का विशेष महत्व है। महाकाल मंदिर के साथ-साथ यहां एक और रहस्यमयी और प्राचीन मंदिर है, जहां महाशिवरात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर है दंगवाड़ा गांव स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर।
उज्जैन से लगभग 36 किलोमीटर और इंगोरिया से 6 किलोमीटर दूर स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव सामान्य शिवलिंग की तरह नहीं है, बल्कि ‘बोर’ के आकार की आकृति में स्थापित है। यह शिवलिंग जमीन के ऊपर नहीं, बल्कि नीचे की ओर धंसा हुआ है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। माना जाता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है और मंदिर की जड़ें ताम्र पाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक फैली हुई हैं।
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जलाधारी है। मान्यता है कि इसमें कितना भी जल अर्पित किया जाए, जल का स्तर न तो बढ़ता है और न ही घटता है, वह हमेशा समान बना रहता है। स्थानीय लोगों और मंदिर के महंत के अनुसार, यहां 12 ज्योतिर्लिंगों का समावेश है, इसलिए यहां दर्शन करने से सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
मंदिर के पास से बहने वाली चंबल नदी भी इस स्थल की आस्था को और गहरा करती है। कहा जाता है कि चंबल नदी मंदिर की आधी परिक्रमा करती हैं अर्थात शिव के सोमसूत्र (शिवलिंग की जलधरी से जल निकलने का स्थान) का उल्लंघन नहीं करती। मान्यता है कि हमेशा शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही की जाती है । यही कारण है कि इस मंदिर को सिद्ध स्थल माना जाता है। स्थानीय लोगों का यह भी विश्वास है कि रात्रि में नंदी महाराज मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं और मंदिर की घंटियां भी खुद-ब-खुद बजने लगती हैं। यहां महाशिवरात्रि पर होने वाले बोरेश्वर महादेव के विशेष शृंगार को देखने के लिए हजारों लोग आते हैं । बाबा की सवारी भी निकलती है, जो नगर में चक्कर लगाकर वापस मंदिर में आती है। माना जाता है कि महादेव स्वयं नगरवासियों का हाल-चाल लेने निकलते हैं । सावन के महीने में भी हर सोमवार को बाबा की सवारी निकलती है, जिसका हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर बोरेश्वर महादेव मंदिर आस्था, श्रद्धा और रहस्य का अनोखा संगम बन जाता है। यही वजह है कि हर साल इस दिन यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।
बोरेश्वर महादेव की अनोखी महिमा - चंबल करती है आधी परिक्रमा
महाशिवरात्रि का पावन पर्व के लिए पूरे देश में शिवभक्त तैयारियों में जुटे हैं। हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और भजन-कीर्तन होते हैं। उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल की नगरी कहा जाता है, वहां इस पर्व का विशेष महत्व है। महाकाल मंदिर के साथ-साथ यहां एक और रहस्यमयी और प्राचीन मंदिर है, जहां महाशिवरात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर है दंगवाड़ा गांव स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर।
उज्जैन से लगभग 36 किलोमीटर और इंगोरिया से 6 किलोमीटर दूर स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव सामान्य शिवलिंग की तरह नहीं है, बल्कि ‘बोर’ के आकार की आकृति में स्थापित है। यह शिवलिंग जमीन के ऊपर नहीं, बल्कि नीचे की ओर धंसा हुआ है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। माना जाता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है और मंदिर की जड़ें ताम्र पाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक फैली हुई हैं।
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जलाधारी है। मान्यता है कि इसमें कितना भी जल अर्पित किया जाए, जल का स्तर न तो बढ़ता है और न ही घटता है, वह हमेशा समान बना रहता है। स्थानीय लोगों और मंदिर के महंत के अनुसार, यहां 12 ज्योतिर्लिंगों का समावेश है, इसलिए यहां दर्शन करने से सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
मंदिर के पास से बहने वाली चंबल नदी भी इस स्थल की आस्था को और गहरा करती है। कहा जाता है कि चंबल नदी मंदिर की आधी परिक्रमा करती हैं अर्थात शिव के सोमसूत्र (शिवलिंग की जलधरी से जल निकलने का स्थान) का उल्लंघन नहीं करती। मान्यता है कि हमेशा शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही की जाती है । यही कारण है कि इस मंदिर को सिद्ध स्थल माना जाता है। स्थानीय लोगों का यह भी विश्वास है कि रात्रि में नंदी महाराज मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं और मंदिर की घंटियां भी खुद-ब-खुद बजने लगती हैं। यहां महाशिवरात्रि पर होने वाले बोरेश्वर महादेव के विशेष शृंगार को देखने के लिए हजारों लोग आते हैं । बाबा की सवारी भी निकलती है, जो नगर में चक्कर लगाकर वापस मंदिर में आती है। माना जाता है कि महादेव स्वयं नगरवासियों का हाल-चाल लेने निकलते हैं । सावन के महीने में भी हर सोमवार को बाबा की सवारी निकलती है, जिसका हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर बोरेश्वर महादेव मंदिर आस्था, श्रद्धा और रहस्य का अनोखा संगम बन जाता है। यही वजह है कि हर साल इस दिन यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।