(हाथों का वास्तविक आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य बोलना है, और कानों का आभूषण शास्त्रों का ज्ञान है। इन गुणों के होने पर बाहरी आभूषणों का कोई प्रयोजन नहीं है। )
हिंदू ग्रंथों में दान को अत्यंत पवित्र और श्रेष्ठ कर्म माना गया है। दान केवल किसी वस्तु को देने की क्रिया नहीं है, बल्कि इसे धर्म, पुण्य और आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार दान मनुष्य के भीतर करुणा, दया और परोपकार की भावना को जाग्रत करता है तथा उसे संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और विश्व के कल्याण की ओर प्रेरित करता है। जो दान करता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता।
अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
(खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है ।)
ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और यह पुण्य व्यक्ति के वर्तमान जीवन के साथ-साथ परलोक में भी शुभ फल देता है। दान पापों का क्षय करता है, दरिद्रता को दूर करता है और जीवन में सुख, शांति तथा संतोष प्रदान करता है। इसी कारण दान को दीर्घकालिक कल्याण का मार्ग कहा गया है। जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करता है, वह मानसिक रूप से अधिक संतुलित और प्रसन्न रहता है।
दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥
(दान से स्वर्ग और सुख मिलता है, इस लोक और परलोक में दान से ही मनुष्य सम्मान पाता है।)
भगवद्गीता में दान के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे सात्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार का बताया गया है। गीता के अनुसार जो दान बिना किसी फल की इच्छा के, उचित समय, स्थान और पात्र को दिया जाता है, वही श्रेष्ठ और सात्विक दान है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि दान की महत्ता केवल वस्तु में नहीं, बल्कि देने की भावना और उद्देश्य में निहित होती है।
मनुस्मृति और पुराणों में भी दान की विशेष महिमा वर्णित है। अन्न, जल, वस्त्र, विद्या और औषधि के दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
न वैरेण वैराणि शम्यन्तीह कदाचन।
अद्वैरेणैव शम्यन्ति एष धर्मः सनातनः॥
अर्थ:
वैर से वैर शांत नहीं होता, वैर का नाश केवल अद्वेष (करुणा, दान) से होता है—यही सनातन धर्म है।
हिंदू ग्रंथों में दान की महिमा को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। महाभारत में कहा गया है कि धन की तीन ही गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति न दान करता है और न भोग, उसका धन अंततः नष्ट हो जाता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि धन का सर्वोत्तम उपयोग दान है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
ऋग्वेद में दान को धर्म की उत्पत्ति का कारण बताया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि दान ही धर्म का मूल आधार है। मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में करुणा, अद्वेष और परोपकार को धर्म का शाश्वत मार्ग बताया गया है, जिनका व्यवहारिक रूप दान के माध्यम से प्रकट होता है। पुराणों में यह भी कहा गया है कि दान करने वाला कभी दरिद्र नहीं होता, क्योंकि दान से केवल बाहरी संपत्ति ही नहीं, बल्कि आंतरिक समृद्धि भी प्राप्त होती है। भगवद्गीता में सात्त्विक दान का वर्णन करते हुए बताया गया है कि...
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
अर्थ:
जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के,
उचित स्थान, समय और पात्र को दिया जाता है—वह सात्त्विक दान है।
स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में अन्नदान को सभी दानों में सर्वोत्तम कहा गया है, क्योंकि यह सीधे जीवन का संरक्षण करता है। ‘अन्नदानं परं दानं’ यानी अन्न का दान सभी दानों में श्रेष्ठ है। हितोपदेश में त्याग और दान को अमरत्व का मार्ग बताया गया है । उसके अनुसार ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ अर्थात कुछ लोग त्याग (दान) के द्वारा ही अमरत्व को प्राप्त हुए हैं। जबकि महाभारत में दान से यश, सुख और कीर्ति की प्राप्ति कही गई है, यथा – ‘दानं यशः सुखं कीर्तिः।‘
हमारे ग्रंथ कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए अर्थात उसे जो इसके योग्य हो । कुपात्र का दान देने से कोई फल नहीं मिलता बल्कि दान का दुरुपयोग ही होता है ।
सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
(जैसे अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, वैसे ही अच्छे (योग्य) व्यक्ति को दान देना चाहिए।)
दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ।
(समय पर, विधिपूर्वक और गुणवान को ही दान देना चाहिए।)
शास्त्र यह भी कहते हैं कि दान से मन और आत्मा की शुद्धि होती है तथा मनुष्य का जीवन अधिक अर्थपूर्ण बनता है। कुल मिलाकर, हिंदू ग्रंथों के अनुसार दान व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर स्थापित करता है और उसे मानवता, करुणा तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से जोड़ता है। दान मनुष्य के नैतिक, सामाजिक और आत्मिक उत्थान का एक अनिवार्य साधन है।
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषग् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥
(मरते हुए व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र दान ही होता है, क्योंकि वही आगे साथ जाता है।)
(हाथों का वास्तविक आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य बोलना है, और कानों का आभूषण शास्त्रों का ज्ञान है। इन गुणों के होने पर बाहरी आभूषणों का कोई प्रयोजन नहीं है। )
हिंदू ग्रंथों में दान को अत्यंत पवित्र और श्रेष्ठ कर्म माना गया है। दान केवल किसी वस्तु को देने की क्रिया नहीं है, बल्कि इसे धर्म, पुण्य और आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार दान मनुष्य के भीतर करुणा, दया और परोपकार की भावना को जाग्रत करता है तथा उसे संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और विश्व के कल्याण की ओर प्रेरित करता है। जो दान करता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता।
अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
(खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है ।)
ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और यह पुण्य व्यक्ति के वर्तमान जीवन के साथ-साथ परलोक में भी शुभ फल देता है। दान पापों का क्षय करता है, दरिद्रता को दूर करता है और जीवन में सुख, शांति तथा संतोष प्रदान करता है। इसी कारण दान को दीर्घकालिक कल्याण का मार्ग कहा गया है। जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करता है, वह मानसिक रूप से अधिक संतुलित और प्रसन्न रहता है।
दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥
(दान से स्वर्ग और सुख मिलता है, इस लोक और परलोक में दान से ही मनुष्य सम्मान पाता है।)
भगवद्गीता में दान के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे सात्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार का बताया गया है। गीता के अनुसार जो दान बिना किसी फल की इच्छा के, उचित समय, स्थान और पात्र को दिया जाता है, वही श्रेष्ठ और सात्विक दान है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि दान की महत्ता केवल वस्तु में नहीं, बल्कि देने की भावना और उद्देश्य में निहित होती है।
मनुस्मृति और पुराणों में भी दान की विशेष महिमा वर्णित है। अन्न, जल, वस्त्र, विद्या और औषधि के दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
न वैरेण वैराणि शम्यन्तीह कदाचन।
अद्वैरेणैव शम्यन्ति एष धर्मः सनातनः॥
अर्थ:
वैर से वैर शांत नहीं होता, वैर का नाश केवल अद्वेष (करुणा, दान) से होता है—यही सनातन धर्म है।
हिंदू ग्रंथों में दान की महिमा को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। महाभारत में कहा गया है कि धन की तीन ही गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति न दान करता है और न भोग, उसका धन अंततः नष्ट हो जाता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि धन का सर्वोत्तम उपयोग दान है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
ऋग्वेद में दान को धर्म की उत्पत्ति का कारण बताया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि दान ही धर्म का मूल आधार है। मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में करुणा, अद्वेष और परोपकार को धर्म का शाश्वत मार्ग बताया गया है, जिनका व्यवहारिक रूप दान के माध्यम से प्रकट होता है। पुराणों में यह भी कहा गया है कि दान करने वाला कभी दरिद्र नहीं होता, क्योंकि दान से केवल बाहरी संपत्ति ही नहीं, बल्कि आंतरिक समृद्धि भी प्राप्त होती है। भगवद्गीता में सात्त्विक दान का वर्णन करते हुए बताया गया है कि...
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
अर्थ:
जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के,
उचित स्थान, समय और पात्र को दिया जाता है—वह सात्त्विक दान है।
स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में अन्नदान को सभी दानों में सर्वोत्तम कहा गया है, क्योंकि यह सीधे जीवन का संरक्षण करता है। ‘अन्नदानं परं दानं’ यानी अन्न का दान सभी दानों में श्रेष्ठ है। हितोपदेश में त्याग और दान को अमरत्व का मार्ग बताया गया है । उसके अनुसार ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ अर्थात कुछ लोग त्याग (दान) के द्वारा ही अमरत्व को प्राप्त हुए हैं। जबकि महाभारत में दान से यश, सुख और कीर्ति की प्राप्ति कही गई है, यथा – ‘दानं यशः सुखं कीर्तिः।‘
हमारे ग्रंथ कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए अर्थात उसे जो इसके योग्य हो । कुपात्र का दान देने से कोई फल नहीं मिलता बल्कि दान का दुरुपयोग ही होता है ।
सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
(जैसे अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, वैसे ही अच्छे (योग्य) व्यक्ति को दान देना चाहिए।)
दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ।
(समय पर, विधिपूर्वक और गुणवान को ही दान देना चाहिए।)
शास्त्र यह भी कहते हैं कि दान से मन और आत्मा की शुद्धि होती है तथा मनुष्य का जीवन अधिक अर्थपूर्ण बनता है। कुल मिलाकर, हिंदू ग्रंथों के अनुसार दान व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर स्थापित करता है और उसे मानवता, करुणा तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से जोड़ता है। दान मनुष्य के नैतिक, सामाजिक और आत्मिक उत्थान का एक अनिवार्य साधन है।
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषग् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥
(मरते हुए व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र दान ही होता है, क्योंकि वही आगे साथ जाता है।)