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साल में सिर्फ एक हफ्ते खुलता है यह मंदिर, जलता मिलता है दीपक !

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है और यहां देवस्थानों की कोई कमी नहीं है। हर राज्य और शहर में ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान और अनूठी परंपराएं हैं। किसी मंदिर में ईश्वर की अलौकिक उपस्थिति की बात की जाती है तो कहीं आज भी निरंतर ज्वाला प्रज्वलित है। कई मंदिरों के कुछ ऐसे रहस्य हैं जो उन्हें दूसरों से अलग बनाते हैं। इनमें से ही एक मंदिर है कर्नाटक के हासन जिले में स्थित हसनम्बा देवी मंदिर। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और रहस्यमय परंपराओं के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। जहां एक तरफ इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि यह पूरे साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए खुलता है, वहीं एक और मान्यता यह भी है कि यहां बिना तेल खत्म हुए दीपक पूरे साल जलता रहता है। आइए आपको बताते हैं इस मंदिर से जुड़े कई रहस्यों के बारे में।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत पहले एक राक्षस अंधकासुर था, जिसे कठोर तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से अदृश्य होने का वरदान प्राप्त हुआ। ऐसा वरदान पाकर उसने चारों ओर अत्‍या‍चार मचा दिया। ऐसे में भगवान शिव ने उसका अंत करने का बीड़ा उठाया। लेकिन उसमें इतनी शक्ति थी कि जब शिव उन्हें मारने की कोशिश करते हैं, तो जमीन पर गिरती उसके खून की एक-एक बूंद राक्षस का रूप धारण कर लेती । तब भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से योगेश्वरी देवी हसनम्बा को प्रकट किया जिन्‍होंने अंधकासुर का अंत कर दिया।

 

हसनम्बा देवी मंदिर भक्तों के लिए दिवाली के दौरान केवल 7 दिनों के लिए खुलता है । मान्यता है कि दिवाली के दिन मंदिर के अंदर चावल की दो बोरियां, पानी और घी का एक दीपक रखा जाता है। इस दीपक को ‘नंदा दीपम’ कहते हैं। मंदिर को इस दौरान फूलों से सजाया जाता है और फिर बंद कर दिया जाता है। एक साल बाद जब मंदिर दोबारा खुलता है, तो चावल पका हुआ और गरम होता है। कहा जाता है कि यह चावल कभी खराब नहीं होता है। यह रहस्य आज भी बना हुआ है। दीपक भी जलता हुआ मिलता है। यहां तक की भक्‍तों द्वारा देवी हसनम्बा पर चढ़ाए गए फूल भी ताजा होते हैं। इतना ही नहीं, यहां जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, वो भी अगले साल तक ताजा बना रहता है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाएं बोलकर नहीं, बल्कि पत्र लिखकर देवी को अर्पण करते हैं। श्री हसनम्बा मंदिर का मुख्य शिखर द्रविड़ शैली में नवनिर्मित है। इस मंदिर परिसर में दरबार गणपति, हसनम्बा और सिद्धेश्वर को समर्पित तीन प्रमुख मंदिर हैं। यहाँ का एक अन्य प्रमुख आकर्षण कल्लप्पा को समर्पित मंदिर है।

 

हसनम्बा का अर्थ है वह मां जो मुस्कुराती है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है। एक लोक कथा के अनुसार, देवी ने अपनी दुखी बहू को बचाने के लिए उसे पत्थर में बदल दिया था। इस पत्थर को 'शोशी कल' कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह पत्थर हर साल थोड़ा-थोड़ा देवी की ओर बढ़ता है और कलयुग के अंत में देवी तक पहुंच जाएगा।

 

:- रजत द्विवेदी

 

 

 

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साल में सिर्फ एक हफ्ते खुलता है यह मंदिर, जलता मिलता है दीपक !

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है और यहां देवस्थानों की कोई कमी नहीं है। हर राज्य और शहर में ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान और अनूठी परंपराएं हैं। किसी मंदिर में ईश्वर की अलौकिक उपस्थिति की बात की जाती है तो कहीं आज भी निरंतर ज्वाला प्रज्वलित है। कई मंदिरों के कुछ ऐसे रहस्य हैं जो उन्हें दूसरों से अलग बनाते हैं। इनमें से ही एक मंदिर है कर्नाटक के हासन जिले में स्थित हसनम्बा देवी मंदिर। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और रहस्यमय परंपराओं के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। जहां एक तरफ इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि यह पूरे साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए खुलता है, वहीं एक और मान्यता यह भी है कि यहां बिना तेल खत्म हुए दीपक पूरे साल जलता रहता है। आइए आपको बताते हैं इस मंदिर से जुड़े कई रहस्यों के बारे में।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत पहले एक राक्षस अंधकासुर था, जिसे कठोर तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से अदृश्य होने का वरदान प्राप्त हुआ। ऐसा वरदान पाकर उसने चारों ओर अत्‍या‍चार मचा दिया। ऐसे में भगवान शिव ने उसका अंत करने का बीड़ा उठाया। लेकिन उसमें इतनी शक्ति थी कि जब शिव उन्हें मारने की कोशिश करते हैं, तो जमीन पर गिरती उसके खून की एक-एक बूंद राक्षस का रूप धारण कर लेती । तब भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से योगेश्वरी देवी हसनम्बा को प्रकट किया जिन्‍होंने अंधकासुर का अंत कर दिया।

 

हसनम्बा देवी मंदिर भक्तों के लिए दिवाली के दौरान केवल 7 दिनों के लिए खुलता है । मान्यता है कि दिवाली के दिन मंदिर के अंदर चावल की दो बोरियां, पानी और घी का एक दीपक रखा जाता है। इस दीपक को ‘नंदा दीपम’ कहते हैं। मंदिर को इस दौरान फूलों से सजाया जाता है और फिर बंद कर दिया जाता है। एक साल बाद जब मंदिर दोबारा खुलता है, तो चावल पका हुआ और गरम होता है। कहा जाता है कि यह चावल कभी खराब नहीं होता है। यह रहस्य आज भी बना हुआ है। दीपक भी जलता हुआ मिलता है। यहां तक की भक्‍तों द्वारा देवी हसनम्बा पर चढ़ाए गए फूल भी ताजा होते हैं। इतना ही नहीं, यहां जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, वो भी अगले साल तक ताजा बना रहता है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाएं बोलकर नहीं, बल्कि पत्र लिखकर देवी को अर्पण करते हैं। श्री हसनम्बा मंदिर का मुख्य शिखर द्रविड़ शैली में नवनिर्मित है। इस मंदिर परिसर में दरबार गणपति, हसनम्बा और सिद्धेश्वर को समर्पित तीन प्रमुख मंदिर हैं। यहाँ का एक अन्य प्रमुख आकर्षण कल्लप्पा को समर्पित मंदिर है।

 

हसनम्बा का अर्थ है वह मां जो मुस्कुराती है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है। एक लोक कथा के अनुसार, देवी ने अपनी दुखी बहू को बचाने के लिए उसे पत्थर में बदल दिया था। इस पत्थर को 'शोशी कल' कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह पत्थर हर साल थोड़ा-थोड़ा देवी की ओर बढ़ता है और कलयुग के अंत में देवी तक पहुंच जाएगा।

 

:- रजत द्विवेदी