(जिसने समस्त चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्य की जननी गौ माता को मैं मस्तक झुका कर प्रणाम करता हूं।)
भारतीय संस्कृति में गाय को केवल एक पशु नहीं, बल्कि माता का दर्जा प्राप्त है। वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में गौमाता को अत्यंत पवित्र और पूजनीय बताया गया है। गाय को करुणा, सेवा, पोषण और धर्म का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ आयुर्वेद और पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी गौमाता का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं गौ पूजा, गौ सेवा और इसके धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक पक्षों के बारे में विस्तार से।
गौमाता का वैदिक और धार्मिक महत्व:
वेदों में गाय को ‘अघन्या’ कहा गया है, अर्थात जिसे मारा न जाए। ऋग्वेद, अथर्ववेद और मनुस्मृति में उल्लेख है कि गाय के शरीर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इसी कारण गौ-सेवा को सभी देवताओं की आराधना के समान माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में गौमाता को देवी लक्ष्मी, पृथ्वी और अन्नपूर्णा का स्वरूप कहा गया है। गौमाता की एक आंख में सूर्य और दूसरी में चंद्र देव का निवास होता है, जबकि उनकी पूंछ में हनुमान जी बस्ते हैं। साथ ही उनका दूध अमृत तुल्य माना गया है। पहली रोटी गौमाता को अर्पित करने से माता अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं और घर में सौभाग्य व समृद्धि आती है।
ज्योतिष में गौ पूजा का महत्व:
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पितृ दोष, राहु-केतु दोष या शनि की साढ़ेसाती से पीड़ित जातकों के लिए गौ-सेवा अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। विशेष रूप से सोमवार, गुरुवार और अमावस्या के दिन गाय को रोटी, गुड़ या हरा चारा खिलाना पुण्यदायी होता है। मान्यता है कि इससे ग्रहचाल बिगड़ती नहीं और बिगड़ी हुई ग्रहचाल ठीक होती है ।
गौमूत्र, गोबर और पंचगव्य का शुद्धिकरण महत्व:
आयुर्वेद में गौमूत्र, गोबर और पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोबर और गौमूत्र) को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। धार्मिक रूप से यज्ञ, व्रत और संस्कारों में इनका उपयोग शुद्धिकरण के लिए किया जाता है। मान्यता है कि गौमूत्र में गंगा जी का वास होता है और गोबर से बने उपलों की धूप से घर, दुकान और मंदिर का वातावरण शुद्ध होता है। इसके साथ ही गोबर और गौमूत्र का उपयोग जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है।
गौ सेवा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति:
शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिदिन गौमाता को भोजन कराने से घर में धन, अन्न और शांति की वृद्धि होती है। साथ ही पहली रोटी गौमाता को अर्पित करना या फिर गौग्रास निकालना श्रेष्ठ गृहस्थ धर्म माना गया है, जिससे माता अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं । गाय का दूध, गोबर और गौमूत्र जीवन को पोषित करते हैं, इसलिए उन्हें पहली रोटी देना उनके योगदान के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है। गौग्रास इस मंत्र से अर्तित करें ।
सुरभित्वं जगन्मातर्देवि विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयी ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रास।।
पर्व और अनुष्ठानों में गौ पूजा:
कई व्रत, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों में गौ-पूजा अनिवार्य मानी गई है। गोवत्स द्वादशी, गोकुल अष्टमी और दीपावली से पूर्व होने वाली गोवर्धन पूजा में गौमाता की पूजा का विशेष महत्व है। इन अवसरों पर गाय का श्रृंगार, विधिपूर्वक पूजन, आरती और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है।
गौमाता की पूजा और सेवा न केवल धार्मिक पुण्य प्रदान करती है, बल्कि यह मनुष्य को दया, करुणा और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देती है। गौ सेवा के माध्यम से जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
(जिसने समस्त चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्य की जननी गौ माता को मैं मस्तक झुका कर प्रणाम करता हूं।)
भारतीय संस्कृति में गाय को केवल एक पशु नहीं, बल्कि माता का दर्जा प्राप्त है। वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में गौमाता को अत्यंत पवित्र और पूजनीय बताया गया है। गाय को करुणा, सेवा, पोषण और धर्म का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ आयुर्वेद और पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी गौमाता का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं गौ पूजा, गौ सेवा और इसके धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक पक्षों के बारे में विस्तार से।
गौमाता का वैदिक और धार्मिक महत्व:
वेदों में गाय को ‘अघन्या’ कहा गया है, अर्थात जिसे मारा न जाए। ऋग्वेद, अथर्ववेद और मनुस्मृति में उल्लेख है कि गाय के शरीर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इसी कारण गौ-सेवा को सभी देवताओं की आराधना के समान माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में गौमाता को देवी लक्ष्मी, पृथ्वी और अन्नपूर्णा का स्वरूप कहा गया है। गौमाता की एक आंख में सूर्य और दूसरी में चंद्र देव का निवास होता है, जबकि उनकी पूंछ में हनुमान जी बस्ते हैं। साथ ही उनका दूध अमृत तुल्य माना गया है। पहली रोटी गौमाता को अर्पित करने से माता अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं और घर में सौभाग्य व समृद्धि आती है।
ज्योतिष में गौ पूजा का महत्व:
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पितृ दोष, राहु-केतु दोष या शनि की साढ़ेसाती से पीड़ित जातकों के लिए गौ-सेवा अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। विशेष रूप से सोमवार, गुरुवार और अमावस्या के दिन गाय को रोटी, गुड़ या हरा चारा खिलाना पुण्यदायी होता है। मान्यता है कि इससे ग्रहचाल बिगड़ती नहीं और बिगड़ी हुई ग्रहचाल ठीक होती है ।
गौमूत्र, गोबर और पंचगव्य का शुद्धिकरण महत्व:
आयुर्वेद में गौमूत्र, गोबर और पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोबर और गौमूत्र) को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। धार्मिक रूप से यज्ञ, व्रत और संस्कारों में इनका उपयोग शुद्धिकरण के लिए किया जाता है। मान्यता है कि गौमूत्र में गंगा जी का वास होता है और गोबर से बने उपलों की धूप से घर, दुकान और मंदिर का वातावरण शुद्ध होता है। इसके साथ ही गोबर और गौमूत्र का उपयोग जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है।
गौ सेवा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति:
शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिदिन गौमाता को भोजन कराने से घर में धन, अन्न और शांति की वृद्धि होती है। साथ ही पहली रोटी गौमाता को अर्पित करना या फिर गौग्रास निकालना श्रेष्ठ गृहस्थ धर्म माना गया है, जिससे माता अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं । गाय का दूध, गोबर और गौमूत्र जीवन को पोषित करते हैं, इसलिए उन्हें पहली रोटी देना उनके योगदान के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है। गौग्रास इस मंत्र से अर्तित करें ।
सुरभित्वं जगन्मातर्देवि विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयी ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रास।।
पर्व और अनुष्ठानों में गौ पूजा:
कई व्रत, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों में गौ-पूजा अनिवार्य मानी गई है। गोवत्स द्वादशी, गोकुल अष्टमी और दीपावली से पूर्व होने वाली गोवर्धन पूजा में गौमाता की पूजा का विशेष महत्व है। इन अवसरों पर गाय का श्रृंगार, विधिपूर्वक पूजन, आरती और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है।
गौमाता की पूजा और सेवा न केवल धार्मिक पुण्य प्रदान करती है, बल्कि यह मनुष्य को दया, करुणा और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देती है। गौ सेवा के माध्यम से जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।