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प्रयागराज : इस मंदिर में विराजे हैं शिव के गण वासुकी नाग

धर्म और अध्यात्म की नगरी प्रयागराज में दारागंज के उत्तरी कोने पर अति प्राचीन नागवासुकी मंदिर स्थित है। इस मंदिर में नागों के राजा वासुकी नाग विराजमान रहते हैं। मान्यता है कि प्रयागराज आने वाले हर श्रद्धालु और तीर्थयात्री की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक की वह नागवासुकी जी का दर्शन न कर लें।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन में देवताओं और असुरों ने नागवासुकी को सुमेरु पर्वत में लपेटकर उनका प्रयोग रस्सी के तौर पर किया था। वहीं, समुद्र मंथन के बाद नागराज वासुकी शरीर पर लगातार रगड़ की वजह से बुरी तरह घायल हो गए थे। जब मंथन समाप्त हुआ तो उनके शरीर में जलन होने लगी । वासुकी मंदराचल पर्वत चले गए, लेकिन जलन खत्म नहीं हुई। तब नागवासुकी ने भगवान विष्णु से अपनी पीड़ा के बारे में बताया और जलन खत्म करने का उपाय पूछा। भगवान ने उन्हें प्रयाग जाने को कहा, जहां वह सरस्वती नदी का अमृत जल का पान करें और वहीं विश्राम करें, इससे उनकी सारी पीड़ा समाप्त हो जाएगी। तभी से वह यहां विराजमान हैं।

 

नागवासुकी मंदिर पारंपरिक हिंदू वास्तुकला शैली में निर्मित है। मंदिर में एक बड़ा केंद्रीय हॉल है जिसके पीछे गर्भगृह है। गर्भगृह में भगवान वासुकी की पांच फन और चार कुंडलियों वाली काले पत्थर की मूर्ति है, जो अनगिनत भक्तों के लिए आशा, सुरक्षा और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। मंदिर में भगवान शिव, भगवान गणेश, देवी पार्वती और भीष्म पितामह सहित अन्य देवताओं को समर्पित कई छोटे मंदिर भी हैं ।   

 

प्रयाग में सात प्रमुख तीर्थो में नागवासुकी मंदिर शामिल है। नागवासुकी मंदिर प्रयाग के परिक्रमा क्षेत्र में है। यह मंदिर त्रिकोणीय व पंचकोसी परिक्रमा के अंतर्गत आता है। कुंभ, अर्द्धकुंभ, माघ मेले और नागपंचमी के दिन लाखों तीर्थयात्री इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने आते हैं। इस मंदिर का वर्णन पुराणों में भी आता है। वासुकी नागों के राजा और भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं, जो सदैव भोलेनाथ के गले में आभूषण की तरह विराजमान रहते हैं। उन्हें शिव जी ने अपनी भक्ति से प्रसन्न होकर अपने गणों में शामिल किया था। नागों को धारण करना शिव के मृत्यु पर विजय (मृत्युंजय) और अहंकार पर नियंत्रण का प्रतीक है।

 

मान्यता है कि कुंडली में कालसर्प योग होने से जीवन में बार-बार विघ्न, स्वास्थ्य समस्याएं और पारिवारिक अशांति बनी रहती है। ऐसे में नागपंचमी के दिन नागवासुकी मंदिर में विशेष पूजा कराने से यह दोष शांत होता है। कहा जाता है कि जब मुगल बादशाह औरंगजेब भारत में मंदिरों को तोड़ रहा था, तो वह नागवासुकी मंदिर को खुद तोड़ने पहुंच गया और भाला चलाया जिसके आज भी निशान मौजूद है। कहा जाता है कि नागवासुकी की विराट मूर्ति देखकर वह डर से बेहोश हो गया था।

 

:- रजत द्विवेदी

 

 

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प्रयागराज : इस मंदिर में विराजे हैं शिव के गण वासुकी नाग

धर्म और अध्यात्म की नगरी प्रयागराज में दारागंज के उत्तरी कोने पर अति प्राचीन नागवासुकी मंदिर स्थित है। इस मंदिर में नागों के राजा वासुकी नाग विराजमान रहते हैं। मान्यता है कि प्रयागराज आने वाले हर श्रद्धालु और तीर्थयात्री की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक की वह नागवासुकी जी का दर्शन न कर लें।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन में देवताओं और असुरों ने नागवासुकी को सुमेरु पर्वत में लपेटकर उनका प्रयोग रस्सी के तौर पर किया था। वहीं, समुद्र मंथन के बाद नागराज वासुकी शरीर पर लगातार रगड़ की वजह से बुरी तरह घायल हो गए थे। जब मंथन समाप्त हुआ तो उनके शरीर में जलन होने लगी । वासुकी मंदराचल पर्वत चले गए, लेकिन जलन खत्म नहीं हुई। तब नागवासुकी ने भगवान विष्णु से अपनी पीड़ा के बारे में बताया और जलन खत्म करने का उपाय पूछा। भगवान ने उन्हें प्रयाग जाने को कहा, जहां वह सरस्वती नदी का अमृत जल का पान करें और वहीं विश्राम करें, इससे उनकी सारी पीड़ा समाप्त हो जाएगी। तभी से वह यहां विराजमान हैं।

 

नागवासुकी मंदिर पारंपरिक हिंदू वास्तुकला शैली में निर्मित है। मंदिर में एक बड़ा केंद्रीय हॉल है जिसके पीछे गर्भगृह है। गर्भगृह में भगवान वासुकी की पांच फन और चार कुंडलियों वाली काले पत्थर की मूर्ति है, जो अनगिनत भक्तों के लिए आशा, सुरक्षा और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। मंदिर में भगवान शिव, भगवान गणेश, देवी पार्वती और भीष्म पितामह सहित अन्य देवताओं को समर्पित कई छोटे मंदिर भी हैं ।   

 

प्रयाग में सात प्रमुख तीर्थो में नागवासुकी मंदिर शामिल है। नागवासुकी मंदिर प्रयाग के परिक्रमा क्षेत्र में है। यह मंदिर त्रिकोणीय व पंचकोसी परिक्रमा के अंतर्गत आता है। कुंभ, अर्द्धकुंभ, माघ मेले और नागपंचमी के दिन लाखों तीर्थयात्री इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने आते हैं। इस मंदिर का वर्णन पुराणों में भी आता है। वासुकी नागों के राजा और भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं, जो सदैव भोलेनाथ के गले में आभूषण की तरह विराजमान रहते हैं। उन्हें शिव जी ने अपनी भक्ति से प्रसन्न होकर अपने गणों में शामिल किया था। नागों को धारण करना शिव के मृत्यु पर विजय (मृत्युंजय) और अहंकार पर नियंत्रण का प्रतीक है।

 

मान्यता है कि कुंडली में कालसर्प योग होने से जीवन में बार-बार विघ्न, स्वास्थ्य समस्याएं और पारिवारिक अशांति बनी रहती है। ऐसे में नागपंचमी के दिन नागवासुकी मंदिर में विशेष पूजा कराने से यह दोष शांत होता है। कहा जाता है कि जब मुगल बादशाह औरंगजेब भारत में मंदिरों को तोड़ रहा था, तो वह नागवासुकी मंदिर को खुद तोड़ने पहुंच गया और भाला चलाया जिसके आज भी निशान मौजूद है। कहा जाता है कि नागवासुकी की विराट मूर्ति देखकर वह डर से बेहोश हो गया था।

 

:- रजत द्विवेदी