मोती डूंगरी गणेश : कड़ाके की ठंड में मखमली पोशाक व विशेष श्रृंगार
गुलाबी नगरी जयपुर में इन दिनों शीतलहर का प्रकोप जारी है। कड़ाके की ठंड से जहां आम लोग गर्म कपड़ों का सहारा ले रहे हैं, वहीं मोती डूंगरी गणेश मंदिर में बप्पा को भी सर्दी से बचाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। बप्पा को मखमल से बनी खास विंटर पोशाक पहनाई गई है, जिसे देखने के लिए मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। यह पोशाक मेहरून और पीच रेड रंग के मखमल से तैयार की गई है, जिसमें ठंड से बचाव के लिए 250 ग्राम शुद्ध रुई की परत लगाई गई है। इसे बनाने में करीब 30 मीटर कपड़े का उपयोग हुआ और कुशल कारीगरों को पूरे दो महीने का समय लगा। इस विशेष पोशाक में अंगरखी कुर्ता, पटका और सिर के लिए सुंदर टोपी भी शामिल है। बुधवार को मंदिर के महंत कैलाश शर्मा ने मंत्रोच्चार के साथ बप्पा को यह नवीन वस्त्र धारण करवाया। बारीक कारीगरी और आकर्षक रंगों के कारण यह पोशाक भक्तों के बीच विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है।
पूरे गणेश परिवार का शीतकालीन श्रृंगार :
सिर्फ बप्पा को ही नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार का भी शीतकालीन श्रृंगार किया गया है। माता रिद्धि और सिद्धि, पुत्र शुभ और लाभ तथा वाहन मूषकराज को भी इसी रंग और बनावट की गर्म मखमली पोशाक पहनाई गई है। बताया जा रहा है कि यह विशेष पोशाक मंदिर के एक अनन्य भक्त द्वारा श्रद्धापूर्वक भेंट की गई है। जयपुर की मोती डूंगरी गणेश मंदिर में आस्था सदियों से जारी श्रद्धा, विश्वास और परंपरा का प्रतीक है ।
मोती डूंगरी मंदिर की विशेषता व मान्यताएं:
राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित मोती डूंगरी गणेश मंदिर न केवल एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, बल्कि यह गुलाबी नगरी की आस्था, परंपरा और पहचान का प्रतीक भी माना जाता है। करीब 500 वर्ष से अधिक पुराना यह मंदिर जयपुरवासियों के लिए भावनात्मक केंद्र है। यहां विराजमान दाहिनी सूंड वाले बप्पा को जयपुर का संरक्षक माना जाता है और हर शुभ कार्य से पहले सबसे पहला निमंत्रण यहीं दिया जाता है।
मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास सवाई माधोसिंह (प्रथम) के शासनकाल से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसी समय बप्पा की इस भव्य प्रतिमा की स्थापना की गई थी। जयपुर में विवाह, नया वाहन खरीदना, परीक्षा या किसी भी शुभ अवसर से पहले लोग यहां आकर बप्पा का आशीर्वाद लेते हैं। मंदिर को जयपुर का ‘राजा’ भी कहा जाता है। जिन युवाओं के विवाह में बाधाएं आती हैं, उनके लिए यहां ‘विवाह का धागा’ बांधने की विशेष परंपरा है।
'मोती डूंगरी' नाम छोटी पहाड़ी (डूंगरी) पर स्थित मोती के विशिष्ट आकार जैसी पहाड़ी की आकृति के कारण पड़ा। यह मंदिर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की परंपरा का पालन करता है। पुजारी का परिवार मुख्य रूप से बंगाल से है और उनकी परंपरा के अनुसार पुजारी का वंशज ही उत्तराधिकारी होता है। इसलिए उन्हें महंत कहा जाता है।
इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण गणेश चतुर्थी का उत्सव है। यह उत्सव एक दिन से अधिक समय तक चलता है और इसका समापन एक जुलूस के साथ होता है जो गढ़ गणेश मंदिर की पहाड़ी की तलहटी तक जाता है। यूं तो जयपुर में शहर की चारदीवारी वाले क्षेत्र में कई मंदिर है लेकिन जिन कुछ मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं उनमें गोविंद देवजी मंदिर और मोती डूंगरी मंदिर विशेष हैं । यहां के नियमित दर्शन कई निवासियों के दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मोती डूंगरी गणेश : कड़ाके की ठंड में मखमली पोशाक व विशेष श्रृंगार
गुलाबी नगरी जयपुर में इन दिनों शीतलहर का प्रकोप जारी है। कड़ाके की ठंड से जहां आम लोग गर्म कपड़ों का सहारा ले रहे हैं, वहीं मोती डूंगरी गणेश मंदिर में बप्पा को भी सर्दी से बचाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। बप्पा को मखमल से बनी खास विंटर पोशाक पहनाई गई है, जिसे देखने के लिए मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। यह पोशाक मेहरून और पीच रेड रंग के मखमल से तैयार की गई है, जिसमें ठंड से बचाव के लिए 250 ग्राम शुद्ध रुई की परत लगाई गई है। इसे बनाने में करीब 30 मीटर कपड़े का उपयोग हुआ और कुशल कारीगरों को पूरे दो महीने का समय लगा। इस विशेष पोशाक में अंगरखी कुर्ता, पटका और सिर के लिए सुंदर टोपी भी शामिल है। बुधवार को मंदिर के महंत कैलाश शर्मा ने मंत्रोच्चार के साथ बप्पा को यह नवीन वस्त्र धारण करवाया। बारीक कारीगरी और आकर्षक रंगों के कारण यह पोशाक भक्तों के बीच विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है।
पूरे गणेश परिवार का शीतकालीन श्रृंगार :
सिर्फ बप्पा को ही नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार का भी शीतकालीन श्रृंगार किया गया है। माता रिद्धि और सिद्धि, पुत्र शुभ और लाभ तथा वाहन मूषकराज को भी इसी रंग और बनावट की गर्म मखमली पोशाक पहनाई गई है। बताया जा रहा है कि यह विशेष पोशाक मंदिर के एक अनन्य भक्त द्वारा श्रद्धापूर्वक भेंट की गई है। जयपुर की मोती डूंगरी गणेश मंदिर में आस्था सदियों से जारी श्रद्धा, विश्वास और परंपरा का प्रतीक है ।
मोती डूंगरी मंदिर की विशेषता व मान्यताएं:
राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित मोती डूंगरी गणेश मंदिर न केवल एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, बल्कि यह गुलाबी नगरी की आस्था, परंपरा और पहचान का प्रतीक भी माना जाता है। करीब 500 वर्ष से अधिक पुराना यह मंदिर जयपुरवासियों के लिए भावनात्मक केंद्र है। यहां विराजमान दाहिनी सूंड वाले बप्पा को जयपुर का संरक्षक माना जाता है और हर शुभ कार्य से पहले सबसे पहला निमंत्रण यहीं दिया जाता है।
मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास सवाई माधोसिंह (प्रथम) के शासनकाल से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसी समय बप्पा की इस भव्य प्रतिमा की स्थापना की गई थी। जयपुर में विवाह, नया वाहन खरीदना, परीक्षा या किसी भी शुभ अवसर से पहले लोग यहां आकर बप्पा का आशीर्वाद लेते हैं। मंदिर को जयपुर का ‘राजा’ भी कहा जाता है। जिन युवाओं के विवाह में बाधाएं आती हैं, उनके लिए यहां ‘विवाह का धागा’ बांधने की विशेष परंपरा है।
'मोती डूंगरी' नाम छोटी पहाड़ी (डूंगरी) पर स्थित मोती के विशिष्ट आकार जैसी पहाड़ी की आकृति के कारण पड़ा। यह मंदिर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की परंपरा का पालन करता है। पुजारी का परिवार मुख्य रूप से बंगाल से है और उनकी परंपरा के अनुसार पुजारी का वंशज ही उत्तराधिकारी होता है। इसलिए उन्हें महंत कहा जाता है।
इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण गणेश चतुर्थी का उत्सव है। यह उत्सव एक दिन से अधिक समय तक चलता है और इसका समापन एक जुलूस के साथ होता है जो गढ़ गणेश मंदिर की पहाड़ी की तलहटी तक जाता है। यूं तो जयपुर में शहर की चारदीवारी वाले क्षेत्र में कई मंदिर है लेकिन जिन कुछ मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं उनमें गोविंद देवजी मंदिर और मोती डूंगरी मंदिर विशेष हैं । यहां के नियमित दर्शन कई निवासियों के दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।