Sanskar

काशी का मणिकर्णिका तीर्थ बदल रहा है अपना स्वरूप

 

"काश्यां मरणं मुक्तिः, स्नानं मणिकर्णिकायाम्"

(अर्थात काशी में मरण मुक्ति का द्वार है और मणिकर्णिका में स्नान उसका प्रारंभ।)

 

भगवान शिव की नगरी काशी विश्वभर में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। काशी में गंगा नदी के तट पर स्थित मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है। यह काशी के सबसे प्राचीन और पवित्र घाटों में से एक माना जाता है।

 

पौराणिक मान्यताएं

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मणिकर्णिका घाट ऐसा पवित्र स्थान है, जहां मृत्यु भी मोक्ष का मार्ग बन जाती है। कहा जाता है कि काशी में देह त्याग करने वाले व्यक्ति को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र का देते हैं, जिससे उसकी आत्मा को मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जहाँ से आत्मा कभी पुनर्जन्म के बंधन में नहीं आती। इसी विश्वास के कारण देश-विदेश से लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार यहां कराते हैं।

 

मणिकर्णिका घाट का नाम दो शब्दों से बना है मणि (रत्न) और कर्णिका (कान)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के कान के आभूषण (मणिकर्ण) इसी स्थान पर गिरे थे, जिससे इसका नाम मणिकर्णिका घाट पड़ा। यहां आद्य शक्ति पीठ विशालाक्षी देवी का मंदिर भी स्थित है। यह घाट केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि शाक्त और शैव परंपराओं का संगम स्थल भी माना जाता है।

 

होली के पर्व पर मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से मसान होली खेली जाती है, जिसे चिता भस्म होली भी कहा जाता है। यह परंपरा भगवान शिव को समर्पित होती है और मृत्यु पर विजय का प्रतीक मानी जाती है। यह अनोखी होली काशी की विशेष पहचान है।

 

घाट का पुनर्निर्माण

 

इतिहास की बात करें तो मणिकर्णिका घाट का निर्माण कालांतर में देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया था। समय के साथ यह घाट काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का प्रमुख केंद्र बन गया। वर्तमान समय में मणिकर्णिका घाट पर बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण कार्य चल रहा है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना के बाद मणिकर्णिका घाट से सिंधिया घाट तक एक भव्य कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है। घाट को आधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है, जिसमें रैंप, बैठने की व्यवस्था, दर्शन क्षेत्र और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना शामिल हैं। गंगा में हर वर्ष आने वाली बाढ़ के समय भी अंतिम संस्कार न रुके, इसके लिए व्यापक इंतजाम किये जा रहे हैं । घाट का डिजाइन ऐसा तैयार किया गया है ताकि आपदा के समय भी कोई असुविधा न हो। संकरी गलियों को चौड़ा किया जा रहा है ताकि आवागमन बेहतर हो सके । इस पुनर्निर्माण के साथ मणिकर्णिका घाट अपनी प्राचीन गरिमा को सहेजते हुए आधुनिक सुविधाओं के साथ आगे बढ़ रहा है।

 

गंगातीरमनुत्तमं हि सकलं तत्रापि काश्युत्तमा,

तस्यां सा मणिकर्णिकोत्तमतमा यत्रेश्वरो मुक्तिद:।

देवानामपि दुर्लभं स्थलमिदं पापौघनाशक्षमं,

पूर्वोपार्जितपुण्यपुंजगमकं पुण्यैर्जनै: प्राप्यते

 

अर्थ - हे मणिकर्णिक! आप के तट पर भगवान विष्णु और शिव सायुज्य मुक्ति प्रदान करते हैं ।  (एक बार) जीव के महाप्रयाण के समय वे दोनों (उस जीव को अपने-अपने लोक ले जाने के लिए) आपस में स्पर्धा कर रहे थे। भगवान विष्णु, शिवजी से बोले कि यह मनुष्य अब मेरा स्वरुप हो चुका है । उनके ऐसा कहते ही वह जीव उसी क्षण भृगु के पद-चिन्हों से सुशोभित वक्षःस्थल वाला तथा पीताम्बरधारी होकर गरुड़ पर सवार हो उन दोनों के बीच से निकल गया

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

 

 

 

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काशी का मणिकर्णिका तीर्थ बदल रहा है अपना स्वरूप

 

"काश्यां मरणं मुक्तिः, स्नानं मणिकर्णिकायाम्"

(अर्थात काशी में मरण मुक्ति का द्वार है और मणिकर्णिका में स्नान उसका प्रारंभ।)

 

भगवान शिव की नगरी काशी विश्वभर में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। काशी में गंगा नदी के तट पर स्थित मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है। यह काशी के सबसे प्राचीन और पवित्र घाटों में से एक माना जाता है।

 

पौराणिक मान्यताएं

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मणिकर्णिका घाट ऐसा पवित्र स्थान है, जहां मृत्यु भी मोक्ष का मार्ग बन जाती है। कहा जाता है कि काशी में देह त्याग करने वाले व्यक्ति को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र का देते हैं, जिससे उसकी आत्मा को मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जहाँ से आत्मा कभी पुनर्जन्म के बंधन में नहीं आती। इसी विश्वास के कारण देश-विदेश से लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार यहां कराते हैं।

 

मणिकर्णिका घाट का नाम दो शब्दों से बना है मणि (रत्न) और कर्णिका (कान)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के कान के आभूषण (मणिकर्ण) इसी स्थान पर गिरे थे, जिससे इसका नाम मणिकर्णिका घाट पड़ा। यहां आद्य शक्ति पीठ विशालाक्षी देवी का मंदिर भी स्थित है। यह घाट केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि शाक्त और शैव परंपराओं का संगम स्थल भी माना जाता है।

 

होली के पर्व पर मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से मसान होली खेली जाती है, जिसे चिता भस्म होली भी कहा जाता है। यह परंपरा भगवान शिव को समर्पित होती है और मृत्यु पर विजय का प्रतीक मानी जाती है। यह अनोखी होली काशी की विशेष पहचान है।

 

घाट का पुनर्निर्माण

 

इतिहास की बात करें तो मणिकर्णिका घाट का निर्माण कालांतर में देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया था। समय के साथ यह घाट काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का प्रमुख केंद्र बन गया। वर्तमान समय में मणिकर्णिका घाट पर बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण कार्य चल रहा है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना के बाद मणिकर्णिका घाट से सिंधिया घाट तक एक भव्य कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है। घाट को आधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है, जिसमें रैंप, बैठने की व्यवस्था, दर्शन क्षेत्र और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना शामिल हैं। गंगा में हर वर्ष आने वाली बाढ़ के समय भी अंतिम संस्कार न रुके, इसके लिए व्यापक इंतजाम किये जा रहे हैं । घाट का डिजाइन ऐसा तैयार किया गया है ताकि आपदा के समय भी कोई असुविधा न हो। संकरी गलियों को चौड़ा किया जा रहा है ताकि आवागमन बेहतर हो सके । इस पुनर्निर्माण के साथ मणिकर्णिका घाट अपनी प्राचीन गरिमा को सहेजते हुए आधुनिक सुविधाओं के साथ आगे बढ़ रहा है।

 

गंगातीरमनुत्तमं हि सकलं तत्रापि काश्युत्तमा,

तस्यां सा मणिकर्णिकोत्तमतमा यत्रेश्वरो मुक्तिद:।

देवानामपि दुर्लभं स्थलमिदं पापौघनाशक्षमं,

पूर्वोपार्जितपुण्यपुंजगमकं पुण्यैर्जनै: प्राप्यते

 

अर्थ - हे मणिकर्णिक! आप के तट पर भगवान विष्णु और शिव सायुज्य मुक्ति प्रदान करते हैं ।  (एक बार) जीव के महाप्रयाण के समय वे दोनों (उस जीव को अपने-अपने लोक ले जाने के लिए) आपस में स्पर्धा कर रहे थे। भगवान विष्णु, शिवजी से बोले कि यह मनुष्य अब मेरा स्वरुप हो चुका है । उनके ऐसा कहते ही वह जीव उसी क्षण भृगु के पद-चिन्हों से सुशोभित वक्षःस्थल वाला तथा पीताम्बरधारी होकर गरुड़ पर सवार हो उन दोनों के बीच से निकल गया

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव