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बसंत पंचमी विशेष : जानिये, मां सरस्वती की महिमा

 

वसंत पंचमी, माघ मास (जनवरी-फरवरी) में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो धार्मिक-आध्यात्मिक के साथ ही एक सांस्कृतिक पर्व भी है । इस बार यह पर्व 23 जनवरी को है जो मुख्य रूप से माता सरस्वती के पूजन को समर्पित होता है। वसंत पंचमी हिंदू पंचांग के माघ मास के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन पड़ती है। इस दिन ज्ञान, बुद्धि और सृजनात्मकता के प्रतीक के रूप में उनकी साधना-आराधना होती है । यह पर्व विशेष रूप से छात्रों, कलाकारों और विद्वानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

वसंत पंचमी के दिन विद्या आरंभ या अक्षर अभ्यास की परंपरा है, जिसमें छोटे बच्चों की शिक्षा "सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि, विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।" मंत्र के साथ प्रारंभ करवाई जाती है। इस अवसर पर केसरिया भात, हलवा और अन्य पीले व्यंजन बनाए जाते हैं। विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में प्रातःकाल सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है।माता सरस्वती को ज्ञान, विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की देवी माना गया है। वह ज्ञान, विवेक और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं । जिनका आशीर्वाद मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। लगभग तीस दिन का यह परिवर्तनशील समय वसंत पंचमी से आरंभ हो कर होली तक अपने पूरे यौवन में दिखाई देता है।

 

माता सरस्वती का स्वरूप

 

माता सरस्वती का स्वरूप अत्यंत शांत, पवित्र और सौम्य है। वे श्वेत वस्त्र धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान होती हैं और वीणा वादन करते हुए भक्तों को दर्शन देती हैं । श्वेत रंग शुद्धता, शांति और आत्मिक ज्ञान का प्रतीक है। उनकी वीणा की मधुर ध्वनि संगीत, सृजन और बौद्धिक क्षमता का संकेत देती है। माता के साथ विराजमान हंस विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक है। हंस को यह विशेषता प्राप्त है कि वह दूध और पानी को अलग-अलग कर सकता है, उसी प्रकार विवेकशील व्यक्ति सत्य और असत्य में भेद कर सकता है। देवी सरस्वती को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। उनके चार हाथों में पुस्तक, वीणा, रुद्राक्ष माला और एक हाथ में वर मुद्रा होती है। पुस्तक ज्ञान और अध्ययन की प्रतीक है, वीणा कला और संगीत की, माला साधना एवं एकाग्रता की तथा वर मुद्रा ज्ञान के आशीर्वाद की।

 

श्वेत और पीत वस्त्रों का महत्व

 

माता सरस्वती को श्वेत और पीत वस्त्रों में पूजा जाता है। श्वेत रंग सांसारिक मोह से परे, शांति और आत्मिक शुद्धता का प्रतीक है। ज्ञान के सर्वोच्च स्तर पर स्थित होने के कारण माता पर किसी सांसारिक रंग का प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं पीत वस्त्र त्याग, भक्ति और शुभता के प्रतीक माने जाते हैं। वसंत पंचमी के दिन देवी को पीले पुष्प, पीले फल और पीली मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। इसका कारण यह है कि वसंत ऋतु में जब धरती जीवंत होती है, चारों ओर हरियाली आ जाती है, सरसों के पीले फूलों के साथ खेत हरे-भरे हो जाते हैं तभी वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। प्रकृति के इसी उजले स्वरूप के कारण माता ने इस दिन पीत रंग को स्वीकार किया है।

 

माता सरस्वती के साक्षात दर्शन

 

भारत में माता सरस्वती के मंदिरों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन उनके दर्शन जीवन में अनेक रूपों में होते हैं। जब कोई गुरु हमें सही मार्ग दिखाता है, तब हम माता सरस्वती को गुरु के रूप में अनुभव करते हैं। जब कोयल मधुर स्वर में कू-कू करती है, जब जंगलों में मोर नृत्य करता है, या जब कहीं मधुर गायन सुनाई देता है तब भी माता सरस्वती के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं। माता सरस्वती केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि कण-कण में विराजमान हैं। चारों वेदों में, हर संगीत में, हर विद्यालय में, हर वाणी में और पशु-पक्षियों की बोली में भी उनका वास है। वह कला साहित्य संगीत की देवी हैं जिनके बिना इंसान का कोई अस्तित्व नहीं । माता के हाथ में वीणा है क्योंकि संगीत एक कला है और कला जीवन को सुंदर बनाती है।

 

इसी कारण सनातन धर्म में किसी शुभ कार्य या रचना से पहले गणेश जी के साथ ही सरस्वती वंदना की परंपरा रही है। सरस्वती चौदह विद्याओं और चौंसठ कलाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। माता सरस्वती हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को आलोकित करती हैं और हमें सृजनशील तथा विवेकशील बनाती हैं।

 

'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिदैवै सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥'

 

अर्थात - 'जो कुन्द पुष्प, चंद्र, तुषार और मुक्ताहार जैसी धवल है, जो शुभ्र वस्त्रों से आवृत्त है, जिनके हाथ वीणारूपी वरदंड से शोभित हैं, जो श्वेत पद्म के आसन पर विरजित है, जिनका ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव वंदन करते हैं, ऐसी निःशेष जड़ता को दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरा रक्षण करें।'

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव

 

 

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वसंत पंचमी, माघ मास (जनवरी-फरवरी) में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो धार्मिक-आध्यात्मिक के साथ ही एक सांस्कृतिक पर्व भी है । इस बार यह पर्व 23 जनवरी को है जो मुख्य रूप से माता सरस्वती के पूजन को समर्पित होता है। वसंत पंचमी हिंदू पंचांग के माघ मास के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन पड़ती है। इस दिन ज्ञान, बुद्धि और सृजनात्मकता के प्रतीक के रूप में उनकी साधना-आराधना होती है । यह पर्व विशेष रूप से छात्रों, कलाकारों और विद्वानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

वसंत पंचमी के दिन विद्या आरंभ या अक्षर अभ्यास की परंपरा है, जिसमें छोटे बच्चों की शिक्षा "सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि, विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।" मंत्र के साथ प्रारंभ करवाई जाती है। इस अवसर पर केसरिया भात, हलवा और अन्य पीले व्यंजन बनाए जाते हैं। विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में प्रातःकाल सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है।माता सरस्वती को ज्ञान, विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की देवी माना गया है। वह ज्ञान, विवेक और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं । जिनका आशीर्वाद मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। लगभग तीस दिन का यह परिवर्तनशील समय वसंत पंचमी से आरंभ हो कर होली तक अपने पूरे यौवन में दिखाई देता है।

 

माता सरस्वती का स्वरूप

 

माता सरस्वती का स्वरूप अत्यंत शांत, पवित्र और सौम्य है। वे श्वेत वस्त्र धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान होती हैं और वीणा वादन करते हुए भक्तों को दर्शन देती हैं । श्वेत रंग शुद्धता, शांति और आत्मिक ज्ञान का प्रतीक है। उनकी वीणा की मधुर ध्वनि संगीत, सृजन और बौद्धिक क्षमता का संकेत देती है। माता के साथ विराजमान हंस विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक है। हंस को यह विशेषता प्राप्त है कि वह दूध और पानी को अलग-अलग कर सकता है, उसी प्रकार विवेकशील व्यक्ति सत्य और असत्य में भेद कर सकता है। देवी सरस्वती को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। उनके चार हाथों में पुस्तक, वीणा, रुद्राक्ष माला और एक हाथ में वर मुद्रा होती है। पुस्तक ज्ञान और अध्ययन की प्रतीक है, वीणा कला और संगीत की, माला साधना एवं एकाग्रता की तथा वर मुद्रा ज्ञान के आशीर्वाद की।

 

श्वेत और पीत वस्त्रों का महत्व

 

माता सरस्वती को श्वेत और पीत वस्त्रों में पूजा जाता है। श्वेत रंग सांसारिक मोह से परे, शांति और आत्मिक शुद्धता का प्रतीक है। ज्ञान के सर्वोच्च स्तर पर स्थित होने के कारण माता पर किसी सांसारिक रंग का प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं पीत वस्त्र त्याग, भक्ति और शुभता के प्रतीक माने जाते हैं। वसंत पंचमी के दिन देवी को पीले पुष्प, पीले फल और पीली मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। इसका कारण यह है कि वसंत ऋतु में जब धरती जीवंत होती है, चारों ओर हरियाली आ जाती है, सरसों के पीले फूलों के साथ खेत हरे-भरे हो जाते हैं तभी वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। प्रकृति के इसी उजले स्वरूप के कारण माता ने इस दिन पीत रंग को स्वीकार किया है।

 

माता सरस्वती के साक्षात दर्शन

 

भारत में माता सरस्वती के मंदिरों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन उनके दर्शन जीवन में अनेक रूपों में होते हैं। जब कोई गुरु हमें सही मार्ग दिखाता है, तब हम माता सरस्वती को गुरु के रूप में अनुभव करते हैं। जब कोयल मधुर स्वर में कू-कू करती है, जब जंगलों में मोर नृत्य करता है, या जब कहीं मधुर गायन सुनाई देता है तब भी माता सरस्वती के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं। माता सरस्वती केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि कण-कण में विराजमान हैं। चारों वेदों में, हर संगीत में, हर विद्यालय में, हर वाणी में और पशु-पक्षियों की बोली में भी उनका वास है। वह कला साहित्य संगीत की देवी हैं जिनके बिना इंसान का कोई अस्तित्व नहीं । माता के हाथ में वीणा है क्योंकि संगीत एक कला है और कला जीवन को सुंदर बनाती है।

 

इसी कारण सनातन धर्म में किसी शुभ कार्य या रचना से पहले गणेश जी के साथ ही सरस्वती वंदना की परंपरा रही है। सरस्वती चौदह विद्याओं और चौंसठ कलाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। माता सरस्वती हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को आलोकित करती हैं और हमें सृजनशील तथा विवेकशील बनाती हैं।

 

'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिदैवै सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥'

 

अर्थात - 'जो कुन्द पुष्प, चंद्र, तुषार और मुक्ताहार जैसी धवल है, जो शुभ्र वस्त्रों से आवृत्त है, जिनके हाथ वीणारूपी वरदंड से शोभित हैं, जो श्वेत पद्म के आसन पर विरजित है, जिनका ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव वंदन करते हैं, ऐसी निःशेष जड़ता को दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरा रक्षण करें।'

 

: - वर्तिका श्रीवास्तव