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गणेश जी ने कैसे तोड़ा कुबेर का अहंकार ?

धन और वैभव जब घमंड बन जाए, तो उसका अंत तय है। कुछ ऐसा ही हुआ धन के देवता कुबेर के साथ। अपार धन-संपत्ति के स्वामी कुबेर को अपने वैभव पर गर्व था, लेकिन बाल गणेश की एक लीला ने उनके इस अहंकार को चूर-चूर कर दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कुबेर को भगवान के सामने हाथ जोड़ने पड़े? आइए जानते हैं पूरी कथा।

 

कुबेर ने रखा भव्य भोज

 

पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्ण नगरी अलकापुरी के स्वामी कुबेर के पास अपार धन-संपत्ति थी। सोना, रत्न और वैभव से भरी उनकी नगरी की भव्यता देखते ही बनती थी। अपने इसी वैभव का प्रदर्शन करने के लिए कुबेर ने एक भव्य भोज का आयोजन किया।

 

इसी भोज में भगवान शिव और माता पार्वती को आमंत्रित करने के लिए कुबेर कैलाश पहुंचे। कुबेर के मन में छिपे अहंकार को भगवान शिव समझ गए। इसलिए उन्होंने स्वयं भोज में जाने के बजाय कुबेर से बाल गणेश का सत्कार करने के लिए कहा। कुबेर इस बात से बेहद प्रसन्न हुए और बाल गणेश के स्वागत की तैयारियों के लिए अलकापुरी लौट गए।

 

बाल गणेश की अनंत भूख

 

कुबेर ने अलकापुरी को भव्य रूप से सजवाया। महल को फूलों, दीपों और सुंदर सजावट से सजाया गया और तरह-तरह के पकवान तैयार किए गए। जब बाल गणेश अलकापुरी पहुंचे, तो कुबेर ने बड़े आदर-सत्कार के साथ उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए बैठाया। कुबेर को उम्मीद थी कि इस भव्य भोज के जरिए बाल गणेश उनके अपार वैभव से प्रभावित होंगे। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने कुबेर की सारी सोच बदल दी। बाल गणेश ने जैसे ही भोजन करना शुरू किया, एक के बाद एक थालियां खाली होती चली गईं। भोज के लिए तैयार किया गया भोजन देखते ही देखते समाप्त होने लगा।

 

कुबेर ने और भोजन मंगवाया, लेकिन गणेश जी की भूख शांत नहीं हुई। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि अलकापुरी की रसोई का सारा भोजन भी समाप्त हो गया, फिर भी बाल गणेश की भूख शांत नहीं हुई। कुबेर यह देखकर घबरा गए। उन्हें समझ आने लगा कि जिस भोज के जरिए वे अपने धन और वैभव का प्रदर्शन करना चाहते थे, वही अब उनके अहंकार की परीक्षा बन चुका है। बाल गणेश की अनंत भूख के सामने कुबेर का सारा धन और वैभव भी बेबस नजर आया। अब उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा।

 

कुबेर को मिली बड़ी सीख

 

कुबेर तुरंत भगवान शिव की शरण में पहुंचे और उनसे गणेश जी की भूख शांत करने का उपाय पूछा। तब भगवान शिव ने उन्हें एक मुट्ठी भुने हुए चावल दिए और कहा कि इन्हें प्रेम और श्रद्धा से गणेश जी को अर्पित करो। कुबेर वापस अलकापुरी पहुंचे। अब उनके मन में अपने धन और वैभव का कोई अभिमान नहीं था। उन्होंने पूरी श्रद्धा और विनम्रता के साथ भगवान गणेश को वे चावल अर्पित किए। गणेश जी ने जैसे ही उन चावलों को ग्रहण किया, उनकी अनंत भूख शांत हो गई। कुबेर को अपनी भूल का पूरी तरह एहसास हो गया। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और अपने अहंकार का त्याग कर दिया। गणेश जी की इस लीला ने कुबेर को समझाया कि धन और वैभव पर अहंकार करना उचित नहीं है। धन का महत्व तभी है, जब उसका उपयोग विनम्रता, सेवा और श्रद्धा के साथ किया जाए।

 

:- देविशा केसरी

 

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धन और वैभव जब घमंड बन जाए, तो उसका अंत तय है। कुछ ऐसा ही हुआ धन के देवता कुबेर के साथ। अपार धन-संपत्ति के स्वामी कुबेर को अपने वैभव पर गर्व था, लेकिन बाल गणेश की एक लीला ने उनके इस अहंकार को चूर-चूर कर दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कुबेर को भगवान के सामने हाथ जोड़ने पड़े? आइए जानते हैं पूरी कथा।

 

कुबेर ने रखा भव्य भोज

 

पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्ण नगरी अलकापुरी के स्वामी कुबेर के पास अपार धन-संपत्ति थी। सोना, रत्न और वैभव से भरी उनकी नगरी की भव्यता देखते ही बनती थी। अपने इसी वैभव का प्रदर्शन करने के लिए कुबेर ने एक भव्य भोज का आयोजन किया।

 

इसी भोज में भगवान शिव और माता पार्वती को आमंत्रित करने के लिए कुबेर कैलाश पहुंचे। कुबेर के मन में छिपे अहंकार को भगवान शिव समझ गए। इसलिए उन्होंने स्वयं भोज में जाने के बजाय कुबेर से बाल गणेश का सत्कार करने के लिए कहा। कुबेर इस बात से बेहद प्रसन्न हुए और बाल गणेश के स्वागत की तैयारियों के लिए अलकापुरी लौट गए।

 

बाल गणेश की अनंत भूख

 

कुबेर ने अलकापुरी को भव्य रूप से सजवाया। महल को फूलों, दीपों और सुंदर सजावट से सजाया गया और तरह-तरह के पकवान तैयार किए गए। जब बाल गणेश अलकापुरी पहुंचे, तो कुबेर ने बड़े आदर-सत्कार के साथ उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए बैठाया। कुबेर को उम्मीद थी कि इस भव्य भोज के जरिए बाल गणेश उनके अपार वैभव से प्रभावित होंगे। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने कुबेर की सारी सोच बदल दी। बाल गणेश ने जैसे ही भोजन करना शुरू किया, एक के बाद एक थालियां खाली होती चली गईं। भोज के लिए तैयार किया गया भोजन देखते ही देखते समाप्त होने लगा।

 

कुबेर ने और भोजन मंगवाया, लेकिन गणेश जी की भूख शांत नहीं हुई। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि अलकापुरी की रसोई का सारा भोजन भी समाप्त हो गया, फिर भी बाल गणेश की भूख शांत नहीं हुई। कुबेर यह देखकर घबरा गए। उन्हें समझ आने लगा कि जिस भोज के जरिए वे अपने धन और वैभव का प्रदर्शन करना चाहते थे, वही अब उनके अहंकार की परीक्षा बन चुका है। बाल गणेश की अनंत भूख के सामने कुबेर का सारा धन और वैभव भी बेबस नजर आया। अब उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा।

 

कुबेर को मिली बड़ी सीख

 

कुबेर तुरंत भगवान शिव की शरण में पहुंचे और उनसे गणेश जी की भूख शांत करने का उपाय पूछा। तब भगवान शिव ने उन्हें एक मुट्ठी भुने हुए चावल दिए और कहा कि इन्हें प्रेम और श्रद्धा से गणेश जी को अर्पित करो। कुबेर वापस अलकापुरी पहुंचे। अब उनके मन में अपने धन और वैभव का कोई अभिमान नहीं था। उन्होंने पूरी श्रद्धा और विनम्रता के साथ भगवान गणेश को वे चावल अर्पित किए। गणेश जी ने जैसे ही उन चावलों को ग्रहण किया, उनकी अनंत भूख शांत हो गई। कुबेर को अपनी भूल का पूरी तरह एहसास हो गया। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और अपने अहंकार का त्याग कर दिया। गणेश जी की इस लीला ने कुबेर को समझाया कि धन और वैभव पर अहंकार करना उचित नहीं है। धन का महत्व तभी है, जब उसका उपयोग विनम्रता, सेवा और श्रद्धा के साथ किया जाए।

 

:- देविशा केसरी