भगवान श्री हरि नारायण का सबसे प्रिय मास कार्तिक मास है। अश्विन मास की शरद पूर्णिमा के अगले दिन प्रतिपदा से कार्तिक का महीना लगता है। कार्तिक मास में सुबह ब्रह्म महूर्त में तारों की छांव में स्नान करना, तुलसी के समक्ष सुबह-शाम दीपदान करना, श्रीहरि का पूजन करना, कथा श्रवण या पाठन करना व नियमपूर्वक स्नान-दान करने की अत्यंत महिमा है ।
सास और बहू की कठौती में गंगा
एक समय की बात है। एक गाँव में एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती थीं। सास-बहू दोनों ही भगवान की भक्त थीं और हर बार पूरे कार्तिक माह में स्नान कर नियम से व्रत, उपवास और दान करतीं। पर सास मुँह की बड़बोली थी। अपने अहंकार में चूर सिर्फ अपनी बहु को हर बात पर खरी-खोटी सुनती। बहू को तो कुछ समझती ही नहीं थी। एक दिन शरद पूर्णिमा का दिन आया और अगले ही दिन से दोनों को कार्तिक स्नान करना था। सास तो रोज़ आधी रात में ही बारह कोस दूर गंगा स्नान करने जाती थी। रास्ता लंबा था, लेकिन उसे लगता था कि गंगा स्नान करके ही पुण्य कमाया जा सकता है।
सास गुस्से में बहू से बोली आज कार्तिक का पहला दिन है, मैं गंगा स्नान करने जा रही हूँ। कार्तिक के महीने में गंगा स्नान का बड़ा महत्व होता है। पर तुझे बता के क्या लाभ, तू कौन सा आधी रात को जाने वाली है। खैर, घर का ध्यान रखना, कहीं नहा कर सो जाए। बहू बोली ठीक है, माँजी। आप आराम से जाइए। मैं तो इतनी दूर नहीं जा सकती। घर का काम होता है और इनको भी तो खेत पर जाना होता है। वैसे भी मांजी भगवान तो मन के सच्चे भाव देखते हैं। सास ने कहा हाँ हाँ तेरे ही तो भाव पवित्र हैं, तू ही तो एक बहु है जो काम करती है। बाकी तो जैसे आराम करतीं है। अरे बड़बोली, कभी चुप भी हो जाया कर। मुझे क्या करना, तू नहा या मत नहा। मैं तो चली।
बहू घर पर ही एक बड़ी लकड़ी की कठौती में पानी भरती और भगवान नारायण का नाम लेकर स्नान करती थी। मन ही मन गंगा मैया का ध्यान करती और प्रभु का स्मरण करती – ‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव। हर हर गंगे, हर गंगे’ बोल कर स्नान किया और प्रार्थना की कि मेरा मन साफ है और मेरी भावना सच्ची है। मैं आपके पास इतनी दूर नहीं आ सकती, इसलिए आप मेरे इस भाव को स्वीकार करना। कहते हैं ना माँ, मन चंगा तो कठौती में गंगा। हे माँ, मेरी इस कठौती में ही वास करना।
हर रोज़ की तरह एक दिन सास गंगा नदी में स्नान कर रही थी कि अचानक उसकी सोने की नथ निकलकर पानी में बह गई। सास बहुत परेशान हुए और बोली अरे ! मेरी सोने की नथ कहाँ गई? राम, राम, राम, राम। मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, हे नारायण अभी तो यहीं थी ! हे गंगा मैया, मेरी नथ तो वापस कर दो ! सास ने गंगा किनारे बहुत ढूँढा, लेकिन नथ नहीं मिली। वह दु:खी मन से खाली हाथ घर लौट आई। बहू ने पूछा क्या हुआ, माँजी ? आप इतनी उदास क्यों हैं ? आज स्नान करके भी इतनी देर से आईं हैं आप। सास बोली अरे बहू, क्या बताऊँ तुझे, गंगा में स्नान करते समय मेरी सोने की नथ गिर गई। मैंने तो बहुत ढूँढ़ा, लेकिन कहीं नहीं मिली। राम जाने कहाँ गई। तभी बहू की नजर अपनी कठौती पर पड़ी। उसमें पानी के बीच सासू मां की वही सोने की नथ चमक रही थी।
बहू बोली अरे माँ जी ! ये देखिए, आपकी नथ तो यहाँ है ! सास ने देखा तो आश्चर्य चकित रह गई और बोली - अरे ! ये यहाँ कैसे आ गई? तू तो घर से बाहर भी नहीं गई ! ये नथ तो गंगा जी में गिर गई थी । बहू ने कहा- माँ जी, मैंने सच्चे मन से गंगा मैया का ध्यान किया था, संभवत: उन्होंने मेरी भावना स्वीकार कर ली। तो क्या बहू गंगा मैया अपनी जल धारा से इसे यहाँ ले आईं ? सास ने पूछा तो बहू बोली हाँ माँ जी! लगता तो यही है। वरना गंगा की जलधार में गिरी नथ कठौती के जल में कैसे आई ? माँ जी सब प्रभु की लीला है और गंगा मैया का चमत्कार है। बहू की बात सुनकर सास को अपनी गलती का एहसास हुआ और बहू से विनम्र स्वर में बोली आज तूने मुझे समझा दिया कि भगवान की कृपा पाने लिए सिर्फ समय लगाकर दूरी तय करना जरूरी नहीं, मन का सच्चा होना भी जरूरी है। मेरा कार्तिक स्नान सफल हुआ जो तू मुझे मिली बिटिया।
उस दिन से सास ने बहू के भाव का सम्मान करना शुरू कर दिया। वाकई, भगवान दिखावे से नहीं, सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन से प्रसन्न होते हैं, न कि आडंबर से। हे विष्णु भगवान जैसे बहु पर प्रसन्न हुए और सास की बिगड़ी बनाई वैसे सब किसी की बनाना कहते सुनते का हुंकारा भरते का बोलो विष्णु भगवान की जय।
भगवान श्री हरि नारायण का सबसे प्रिय मास कार्तिक मास है। अश्विन मास की शरद पूर्णिमा के अगले दिन प्रतिपदा से कार्तिक का महीना लगता है। कार्तिक मास में सुबह ब्रह्म महूर्त में तारों की छांव में स्नान करना, तुलसी के समक्ष सुबह-शाम दीपदान करना, श्रीहरि का पूजन करना, कथा श्रवण या पाठन करना व नियमपूर्वक स्नान-दान करने की अत्यंत महिमा है ।
सास और बहू की कठौती में गंगा
एक समय की बात है। एक गाँव में एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती थीं। सास-बहू दोनों ही भगवान की भक्त थीं और हर बार पूरे कार्तिक माह में स्नान कर नियम से व्रत, उपवास और दान करतीं। पर सास मुँह की बड़बोली थी। अपने अहंकार में चूर सिर्फ अपनी बहु को हर बात पर खरी-खोटी सुनती। बहू को तो कुछ समझती ही नहीं थी। एक दिन शरद पूर्णिमा का दिन आया और अगले ही दिन से दोनों को कार्तिक स्नान करना था। सास तो रोज़ आधी रात में ही बारह कोस दूर गंगा स्नान करने जाती थी। रास्ता लंबा था, लेकिन उसे लगता था कि गंगा स्नान करके ही पुण्य कमाया जा सकता है।
सास गुस्से में बहू से बोली आज कार्तिक का पहला दिन है, मैं गंगा स्नान करने जा रही हूँ। कार्तिक के महीने में गंगा स्नान का बड़ा महत्व होता है। पर तुझे बता के क्या लाभ, तू कौन सा आधी रात को जाने वाली है। खैर, घर का ध्यान रखना, कहीं नहा कर सो जाए। बहू बोली ठीक है, माँजी। आप आराम से जाइए। मैं तो इतनी दूर नहीं जा सकती। घर का काम होता है और इनको भी तो खेत पर जाना होता है। वैसे भी मांजी भगवान तो मन के सच्चे भाव देखते हैं। सास ने कहा हाँ हाँ तेरे ही तो भाव पवित्र हैं, तू ही तो एक बहु है जो काम करती है। बाकी तो जैसे आराम करतीं है। अरे बड़बोली, कभी चुप भी हो जाया कर। मुझे क्या करना, तू नहा या मत नहा। मैं तो चली।
बहू घर पर ही एक बड़ी लकड़ी की कठौती में पानी भरती और भगवान नारायण का नाम लेकर स्नान करती थी। मन ही मन गंगा मैया का ध्यान करती और प्रभु का स्मरण करती – ‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव। हर हर गंगे, हर गंगे’ बोल कर स्नान किया और प्रार्थना की कि मेरा मन साफ है और मेरी भावना सच्ची है। मैं आपके पास इतनी दूर नहीं आ सकती, इसलिए आप मेरे इस भाव को स्वीकार करना। कहते हैं ना माँ, मन चंगा तो कठौती में गंगा। हे माँ, मेरी इस कठौती में ही वास करना।
हर रोज़ की तरह एक दिन सास गंगा नदी में स्नान कर रही थी कि अचानक उसकी सोने की नथ निकलकर पानी में बह गई। सास बहुत परेशान हुए और बोली अरे ! मेरी सोने की नथ कहाँ गई? राम, राम, राम, राम। मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, हे नारायण अभी तो यहीं थी ! हे गंगा मैया, मेरी नथ तो वापस कर दो ! सास ने गंगा किनारे बहुत ढूँढा, लेकिन नथ नहीं मिली। वह दु:खी मन से खाली हाथ घर लौट आई। बहू ने पूछा क्या हुआ, माँजी ? आप इतनी उदास क्यों हैं ? आज स्नान करके भी इतनी देर से आईं हैं आप। सास बोली अरे बहू, क्या बताऊँ तुझे, गंगा में स्नान करते समय मेरी सोने की नथ गिर गई। मैंने तो बहुत ढूँढ़ा, लेकिन कहीं नहीं मिली। राम जाने कहाँ गई। तभी बहू की नजर अपनी कठौती पर पड़ी। उसमें पानी के बीच सासू मां की वही सोने की नथ चमक रही थी।
बहू बोली अरे माँ जी ! ये देखिए, आपकी नथ तो यहाँ है ! सास ने देखा तो आश्चर्य चकित रह गई और बोली - अरे ! ये यहाँ कैसे आ गई? तू तो घर से बाहर भी नहीं गई ! ये नथ तो गंगा जी में गिर गई थी । बहू ने कहा- माँ जी, मैंने सच्चे मन से गंगा मैया का ध्यान किया था, संभवत: उन्होंने मेरी भावना स्वीकार कर ली। तो क्या बहू गंगा मैया अपनी जल धारा से इसे यहाँ ले आईं ? सास ने पूछा तो बहू बोली हाँ माँ जी! लगता तो यही है। वरना गंगा की जलधार में गिरी नथ कठौती के जल में कैसे आई ? माँ जी सब प्रभु की लीला है और गंगा मैया का चमत्कार है। बहू की बात सुनकर सास को अपनी गलती का एहसास हुआ और बहू से विनम्र स्वर में बोली आज तूने मुझे समझा दिया कि भगवान की कृपा पाने लिए सिर्फ समय लगाकर दूरी तय करना जरूरी नहीं, मन का सच्चा होना भी जरूरी है। मेरा कार्तिक स्नान सफल हुआ जो तू मुझे मिली बिटिया।
उस दिन से सास ने बहू के भाव का सम्मान करना शुरू कर दिया। वाकई, भगवान दिखावे से नहीं, सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन से प्रसन्न होते हैं, न कि आडंबर से। हे विष्णु भगवान जैसे बहु पर प्रसन्न हुए और सास की बिगड़ी बनाई वैसे सब किसी की बनाना कहते सुनते का हुंकारा भरते का बोलो विष्णु भगवान की जय।