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कार्तिक मास में नगर बसेरा : महत्व और कथा

 

कार्तिक मास को भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और धार्मिक नियमों के पालन के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में पूजा-पाठ के साथ कई लोककथाएं भी सुनाई जाती हैं, जो श्रद्धा, आस्था और धर्म के प्रति समर्पण का संदेश देती हैं। ऐसी ही एक लोकप्रचलित कथा जाट-भाट की है, जिसे नगर बसेरे की कथा भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से कार्तिक मास और आषाढ़ मास में की जाने वाली एक पारंपरिक और पौराणिक कथा-पूजा है, जिसका प्रचलन ग्रामीण और पारंपरिक परिवारों में ज्यादा है। इसकी कथा में बताया गया है कि किस तरह श्रद्धा से किया गया धार्मिक कर्म जीवन में सुख-समृद्धि और सम्मान का माध्यम बनता है।

 

जाट ने किया नगर बसेरा, भाट ने किया इनकार

 

लोककथा के अनुसार, एक गांव में जाट और भाट नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों के बीच गहरी मित्रता थी। एक बार कार्तिक मास में जाट अपनी बहन के घर जाने के लिए निकला, जबकि भाट अपनी ससुराल जा रहा था। रास्ता एक होने के कारण दोनों साथ चल पड़े।

 

दोपहर के समय वे एक कुएं की पाल पर विश्राम करने के लिए रुक गए। तभी जाट ने अपने मित्र से कहा, “भाई, कार्तिक का महीना चल रहा है। क्यों न हम यहीं बैठकर नगर बसेरा कर लें?”

 

भाट ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उसने हंसते हुए कहा, “मैं अपनी ससुराल जा रहा हूं। वहां मेरा खूब आदर-सत्कार होगा और अच्छे-अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे। मुझे नगर बसेरा करने की क्या जरूरत है? तुम्हें करना है तो तुम कर लो।” यह कहकर भाट अपने मित्र की बात टालने लगा  और अपनी मंजिल की तरफ निकल गया। लेकिन जाट ने बिना किसी बहस के श्रद्धापूर्वक नगर बसेरा करने का निर्णय लिया।

 

जाट ने कुएं की पाल पर बैठकर हाथ में जल से भरी झारी और चावल के दाने लिए। उसने कार्तिक महाराज और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए परंपरागत मंत्र का उच्चारण किया —

 

“नगर बसेरा जो करे, सो मल-मल धोवे पांव।

ताता मांडा तापसी, देगी मेरी माय॥

माय देगी, मावसी देगी, द्वारिका का वास।

मीठा-मीठा ग्रास, वृंदावन का वास॥

पांच कुलटी छठा रास, मेरो जीवड़ो श्री कृष्ण के पास।

डालूं पानी हो जावे घी, झट से निकल जावे मेरा जी॥”

 

इस प्रकार नगर बसेरा करने के बाद जाट भी अपनी मंजिल की ओर चल पड़े। जाट जब अपनी बहन के घर पहुंचा, तो उसका खूब आदर-सत्कार हुआ। बहन ने प्रेमपूर्वक उसका स्वागत किया और उसे चावल-बूरा खिलाया। जाट ने इसे कार्तिक महाराज की कृपा माना और प्रसन्न मन से वहां समय बिताने लगा।

 

दूसरी ओर, भाट जैसे ही अपनी ससुराल पहुंचा, वहां दुर्भाग्यवश घर में आग लग गई। आग बुझाने के प्रयास में उसके हाथ-मुंह काले हो गए और कपड़े भी झुलस गए। घर में मची अफरा-तफरी के बीच किसी ने उसकी ठीक से सुध नहीं ली। वह भूखा-प्यासा और निराश बैठा रहा। आखिरकार, एक पड़ोसन ने दया करके उसे सूखी रोटी और छाछ दे दी। जिस आदर-सत्कार की उम्मीद लेकर भाट ससुराल पहुंचा था, उसके विपरीत उसे परेशानी का सामना करना पड़ा। वह मन ही मन सोचने लगा कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ।

 

शाम को दोनों मित्र दोबारा मिले। जाट ने अपनी बहन के घर मिले प्रेम और सत्कार के बारे में बताया। वहीं, भाट ने अपनी परेशानी सुनाई। दोनों के अनुभवों में अंतर देखकर भाट को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे याद आया कि कार्तिक मास में नगर बसेरा करने की सलाह उसके मित्र ने दी थी, लेकिन उसने इसे महत्व नहीं दिया था।

 

लोकमान्यता के अनुसार, भाट ने अगले दिन से जाट के साथ नगर बसेरा करना शुरू कर दिया। साथ ही भाट ने समझ लिया कि धार्मिक परंपराओं का उपहास करने के बजाय उन्हें श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनाना चाहिए।

 

यह मान्यता है कि कार्तिक या आषाढ़ मास में पीहर या ससुराल आने-जाने के दौरान नगर बसेरा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और बिगड़े काम बनते हैं।यह कथा कार्तिक मास में प्रचलित नगर बसेरे की परंपरा का महत्व बताती है। साथ ही यह भी सिखाती है कि धार्मिक आस्था का पालन विनम्रता और सच्चे मन से करना चाहिए, न कि दूसरों की श्रद्धा का मजाक उड़ाकर चाहिए।

 

:- लता रानी

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कार्तिक मास में नगर बसेरा : महत्व और कथा

 

कार्तिक मास को भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और धार्मिक नियमों के पालन के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में पूजा-पाठ के साथ कई लोककथाएं भी सुनाई जाती हैं, जो श्रद्धा, आस्था और धर्म के प्रति समर्पण का संदेश देती हैं। ऐसी ही एक लोकप्रचलित कथा जाट-भाट की है, जिसे नगर बसेरे की कथा भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से कार्तिक मास और आषाढ़ मास में की जाने वाली एक पारंपरिक और पौराणिक कथा-पूजा है, जिसका प्रचलन ग्रामीण और पारंपरिक परिवारों में ज्यादा है। इसकी कथा में बताया गया है कि किस तरह श्रद्धा से किया गया धार्मिक कर्म जीवन में सुख-समृद्धि और सम्मान का माध्यम बनता है।

 

जाट ने किया नगर बसेरा, भाट ने किया इनकार

 

लोककथा के अनुसार, एक गांव में जाट और भाट नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों के बीच गहरी मित्रता थी। एक बार कार्तिक मास में जाट अपनी बहन के घर जाने के लिए निकला, जबकि भाट अपनी ससुराल जा रहा था। रास्ता एक होने के कारण दोनों साथ चल पड़े।

 

दोपहर के समय वे एक कुएं की पाल पर विश्राम करने के लिए रुक गए। तभी जाट ने अपने मित्र से कहा, “भाई, कार्तिक का महीना चल रहा है। क्यों न हम यहीं बैठकर नगर बसेरा कर लें?”

 

भाट ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उसने हंसते हुए कहा, “मैं अपनी ससुराल जा रहा हूं। वहां मेरा खूब आदर-सत्कार होगा और अच्छे-अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे। मुझे नगर बसेरा करने की क्या जरूरत है? तुम्हें करना है तो तुम कर लो।” यह कहकर भाट अपने मित्र की बात टालने लगा  और अपनी मंजिल की तरफ निकल गया। लेकिन जाट ने बिना किसी बहस के श्रद्धापूर्वक नगर बसेरा करने का निर्णय लिया।

 

जाट ने कुएं की पाल पर बैठकर हाथ में जल से भरी झारी और चावल के दाने लिए। उसने कार्तिक महाराज और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए परंपरागत मंत्र का उच्चारण किया —

 

“नगर बसेरा जो करे, सो मल-मल धोवे पांव।

ताता मांडा तापसी, देगी मेरी माय॥

माय देगी, मावसी देगी, द्वारिका का वास।

मीठा-मीठा ग्रास, वृंदावन का वास॥

पांच कुलटी छठा रास, मेरो जीवड़ो श्री कृष्ण के पास।

डालूं पानी हो जावे घी, झट से निकल जावे मेरा जी॥”

 

इस प्रकार नगर बसेरा करने के बाद जाट भी अपनी मंजिल की ओर चल पड़े। जाट जब अपनी बहन के घर पहुंचा, तो उसका खूब आदर-सत्कार हुआ। बहन ने प्रेमपूर्वक उसका स्वागत किया और उसे चावल-बूरा खिलाया। जाट ने इसे कार्तिक महाराज की कृपा माना और प्रसन्न मन से वहां समय बिताने लगा।

 

दूसरी ओर, भाट जैसे ही अपनी ससुराल पहुंचा, वहां दुर्भाग्यवश घर में आग लग गई। आग बुझाने के प्रयास में उसके हाथ-मुंह काले हो गए और कपड़े भी झुलस गए। घर में मची अफरा-तफरी के बीच किसी ने उसकी ठीक से सुध नहीं ली। वह भूखा-प्यासा और निराश बैठा रहा। आखिरकार, एक पड़ोसन ने दया करके उसे सूखी रोटी और छाछ दे दी। जिस आदर-सत्कार की उम्मीद लेकर भाट ससुराल पहुंचा था, उसके विपरीत उसे परेशानी का सामना करना पड़ा। वह मन ही मन सोचने लगा कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ।

 

शाम को दोनों मित्र दोबारा मिले। जाट ने अपनी बहन के घर मिले प्रेम और सत्कार के बारे में बताया। वहीं, भाट ने अपनी परेशानी सुनाई। दोनों के अनुभवों में अंतर देखकर भाट को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे याद आया कि कार्तिक मास में नगर बसेरा करने की सलाह उसके मित्र ने दी थी, लेकिन उसने इसे महत्व नहीं दिया था।

 

लोकमान्यता के अनुसार, भाट ने अगले दिन से जाट के साथ नगर बसेरा करना शुरू कर दिया। साथ ही भाट ने समझ लिया कि धार्मिक परंपराओं का उपहास करने के बजाय उन्हें श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनाना चाहिए।

 

यह मान्यता है कि कार्तिक या आषाढ़ मास में पीहर या ससुराल आने-जाने के दौरान नगर बसेरा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और बिगड़े काम बनते हैं।यह कथा कार्तिक मास में प्रचलित नगर बसेरे की परंपरा का महत्व बताती है। साथ ही यह भी सिखाती है कि धार्मिक आस्था का पालन विनम्रता और सच्चे मन से करना चाहिए, न कि दूसरों की श्रद्धा का मजाक उड़ाकर चाहिए।

 

:- लता रानी