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हिंदू धर्म में कार्तिक मास को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। यह महीना भगवान विष्णु की आराधना, तुलसी पूजन, दीपदान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस कारण मास में पड़ने वाली एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस महीने कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात 5 नवंबर (गुरुवार) को रमा एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत, पूजा और भगवान का स्मरण करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है।
रमा एकादशी व्रत कथा
प्राचीनकाल में मुचुकुंद नाम के राजा थे, जो श्रीहरि के अनन्य भक्त थे। मुचुकुंद राजा के राज्य में सभी एकादशी का नियम से पालन करते थे। एकादशी के दिन राज्य में मनुष्य के साथ- साथ पशु-पक्षी भी अन्न ग्रहण नहीं करते थे। राजा की एक पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था। शोभन शारीरिक रूप से दुर्बल था किंतु अधिक समय तक भूखा-प्यासा नहीं रह सकता था।
एक बार शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ ससुराल आया हुआ था। उन्हीं दिनों रमा एकादशी का पर्व आ गया। चूंकि राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी व्रत का कठोर नियम था और एक दिन पहले अर्थात दशमी को ही ढोल बजवाकर घोषणा कर दी जाती थी कि एकादशी के दिन कोई भी अन्न ग्रहण नहीं करेगा।
यह घोषणा सुनकर शोभन चिंतित हो उठा। उसने चंद्रभागा से कहा, "हे प्रिये! मैं शारीरिक रूप से बहुत शिथिल हूं और भूख-प्यास सहन नहीं कर सकता। यदि मैंने व्रत रखा तो मेरे प्राण भी जा सकते हैं। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?"
चंद्रभागा ने समझाया, "स्वामी! मेरे पिता के इस राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। यहां तक कि पशु-पक्षियों को भी अन्न नहीं मिलता। यदि आप व्रत करने में असमर्थ हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए। यहां रहकर तो आपको एकादशी का नियम निभाना ही होगा।" पत्नी की बात सुनकर शोभन ने व्रत करने का निश्चय किया। उसने कहा, "जो भाग्य में लिखा है, वही होगा। मैं भी एकादशी का उपवास करूंगा।"
इस प्रकार शोभन ने रमा एकादशी का व्रत रखा, लेकिन भूख-प्यास के कारण उसकी स्थिति बिगड़ने लगी। दिन ढलने के बाद रात्रि का समय भी उसके लिए अत्यंत कष्टदायक रहा। अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के समय उसके प्राण निकल गए। राजा मुचुकुंद ने विधिपूर्वक उसका अंतिम संस्कार कराया और उसके बाद से चंद्रभागा अपने पिता के पास ही रहने लगी।
व्रत के प्रभाव से शोभन को मिला दिव्य नगर
रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मृत्यु के बाद मंदराचल पर्वत पर एक अत्यंत सुंदर और भव्य नगर प्राप्त हुआ। वह नगर धन-धान्य से संपन्न था। रत्नों से जड़े भवन, स्वर्ण के खंभे और स्फटिक-मणियों से सजी दीवारें उसकी शोभा बढ़ाते थे। वहां हर समय गंधर्व उसकी सेवा में उपस्थित रहते थे और शोभन उस दिव्य नगर में राजा के समान रहने लगा। हालांकि, यह नगर स्थायी नहीं था क्योकि शोभन ने यह व्रत श्रद्धा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण किया था। इसलिए उसे प्राप्त हुआ दिव्य वैभव अस्थायी था।
चंद्रभागा के पुण्य से स्थिर हुआ शोभन का नगर
एक दिन सोम शर्मा नाम के ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए उस दिव्य नगर में पहुंचे। वहां उन्होंने शोभन को पहचान लिया और उससे वार्तालाप किया । शोभन ने उनसे अपने ससुर राजा मुचुकुंद और पत्नी चंद्रभागा का हाल पूछा। साथ ही अपने दिव्य नगर के बारे में बताते हुए आग्रह किया कि वह यह समाचार चंद्रभागा तक पहुंचा दें।
ब्राह्मण ने लौटकर राजा और चंद्रभागा को पूरी बात बताई। पति के बारे में यह समाचार सुनकर वह प्रसन्न हो उठे और उनसे मिलने की इच्छा जताई। चंद्रभागा ने कहा कि वह अपने वर्षों से किए जा रहे एकादशी व्रतों के पुण्य से शोभन के नगर को स्थायी बना सकती है।
इसके बाद सोम शर्मा उसे मंदराचल पर्वत के समीप महर्षि वामदेव के आश्रम ले गए। महर्षि ने पूरी बात सुनकर वेद मंत्रों के साथ चंद्रभागा का अभिषेक किया। ऋषि के तपोबल और मंत्रों के प्रभाव से उसका शरीर दिव्य हो गया और वह अपने पति के पास पहुंच गई।
अपनी पत्नी को देखकर शोभन अत्यंत प्रसन्न हुआ। तब चंद्रभागा ने कहा- “ हे स्वामी! जब मैं आठ वर्ष की थी, तभी से विधिपूर्वक और श्रद्धा के साथ एकादशी का व्रत करती आ रही हूं। आज मैं अपने उन सभी व्रतों का पुण्य आपको अर्पित करती हूं। इसी पुण्य के प्रभाव से आपका यह नगर स्थायी हो जाएगा और प्रलय के अंत तक बना रहेगा। ऐसा हुआ भी और चंद्रभागा के व्रतों के पुण्य से शोभन का दिव्य नगर स्थायी हो गया। इसके बाद दोनों वहां सुखपूर्वक रहने लगे।

