भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय माना गया है। यहां पर्वत, नदियों, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को जीवन का आधार होने के साथ-साथ ईश्वर का स्वरूप भी माना जाता है। गोवर्धन पूजा इसी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला प्रमुख पर्व है। यह दीपावली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस बार गोवर्धन पूजा 10 नवंबर (मंगलवार) को होगी । इस पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की एक अद्भुत लीला से है।
इस पर्व पर घरों के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है और विधि-विधान से उसका पूजन किया जाता है। इसे अन्नकूट उत्सव के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गिरिराज और गोवर्धन गिरधारी की पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहती है। आइए जानते हैं गोवर्धन पूजा का महत्व और गोबर से पर्वत बनाने की परंपरा की महत्ता।
गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा
एक बार गोकुल में सभी लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। यह देखकर बालक श्रीकृष्ण ने अपने पिता नंद बाबा से पूछा कि वे इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? नंद बाबा ने बताया कि इंद्र देव वर्षा करते हैं, जिससे खेतों में अन्न पैदा होता है और पशुओं को चारा मिलता है।
इस पर श्रीकृष्ण ने सभी को समझाया कि ब्रजवासियों का जीवन गोवर्धन पर्वत, वहां के जंगलों, पेड़-पौधों और गौवंश पर निर्भर है। गोवर्धन पर्वत से गायों को हरा चारा और जल मिलता है। इसलिए सभी को पर्वत और गौमाता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। श्रीकृष्ण की बात मानकर ब्रजवासियों ने इंद्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत का पूजन किया और अन्नकूट का भोग लगाया।
यह देखकर देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रज में मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। लगातार बारिश से पूरा ब्रज जलमग्न होने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उनके पशुओं सहित उसके नीचे शरण दी। सात दिनों तक श्रीकृष्ण ने पर्वत को धारण करके सभी की रक्षा की।
अंततः देवराज इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। इस लीला के माध्यम से भगवान ने संसार को संदेश दिया कि प्रकृति और जीवन के आधारों का सम्मान करना ही सच्ची उपासना है। तभी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाने की परंपरा प्रचलित है।
गोवर्धन पूजा की विधि
गोवर्धन पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के आंगन या पूजा स्थल की सफाई करके गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाएं। इसे फूलों, पत्तियों और रंगोली से सजाएं।
इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके विधि-विधान से पूजन करें। गौमाता और बछड़ों का पूजन करें तथा उन्हें हरा चारा, गुड़ और अन्य खाद्य सामग्री खिलाएं। भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाएं। इसी भोग को अन्नकूट कहा जाता है।
परंपरा के अनुसार गोवर्धन जी की सात परिक्रमाएं करें और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें। पूजा के अंत में गिरिराज स्वरूप को हाथ जोड़कर नमन करें तथा गोवर्धनधारी भगवान की स्तुति करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें—
यः गोवर्धनं धारयामास लीलया,
सप्ताहमेकं सह गोपबालकैः।
स त्वं ममापद्भयभीतिनाशकः,
गोवर्धनधारिन् परं नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ:- हे भगवान श्रीकृष्ण ! आपने गोपबालकों सहित सात दिनों तक अपनी लीला से गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। आप मेरे सभी भय और संकटों का नाश करें। हे गोवर्धनधारी! आपको मेरा बार-बार नमन है।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय माना गया है। यहां पर्वत, नदियों, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को जीवन का आधार होने के साथ-साथ ईश्वर का स्वरूप भी माना जाता है। गोवर्धन पूजा इसी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला प्रमुख पर्व है। यह दीपावली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस बार गोवर्धन पूजा 10 नवंबर (मंगलवार) को होगी । इस पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की एक अद्भुत लीला से है।
इस पर्व पर घरों के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है और विधि-विधान से उसका पूजन किया जाता है। इसे अन्नकूट उत्सव के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गिरिराज और गोवर्धन गिरधारी की पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहती है। आइए जानते हैं गोवर्धन पूजा का महत्व और गोबर से पर्वत बनाने की परंपरा की महत्ता।
गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा
एक बार गोकुल में सभी लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। यह देखकर बालक श्रीकृष्ण ने अपने पिता नंद बाबा से पूछा कि वे इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? नंद बाबा ने बताया कि इंद्र देव वर्षा करते हैं, जिससे खेतों में अन्न पैदा होता है और पशुओं को चारा मिलता है।
इस पर श्रीकृष्ण ने सभी को समझाया कि ब्रजवासियों का जीवन गोवर्धन पर्वत, वहां के जंगलों, पेड़-पौधों और गौवंश पर निर्भर है। गोवर्धन पर्वत से गायों को हरा चारा और जल मिलता है। इसलिए सभी को पर्वत और गौमाता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। श्रीकृष्ण की बात मानकर ब्रजवासियों ने इंद्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत का पूजन किया और अन्नकूट का भोग लगाया।
यह देखकर देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रज में मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। लगातार बारिश से पूरा ब्रज जलमग्न होने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उनके पशुओं सहित उसके नीचे शरण दी। सात दिनों तक श्रीकृष्ण ने पर्वत को धारण करके सभी की रक्षा की।
अंततः देवराज इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। इस लीला के माध्यम से भगवान ने संसार को संदेश दिया कि प्रकृति और जीवन के आधारों का सम्मान करना ही सच्ची उपासना है। तभी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाने की परंपरा प्रचलित है।
गोवर्धन पूजा की विधि
गोवर्धन पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के आंगन या पूजा स्थल की सफाई करके गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाएं। इसे फूलों, पत्तियों और रंगोली से सजाएं।
इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके विधि-विधान से पूजन करें। गौमाता और बछड़ों का पूजन करें तथा उन्हें हरा चारा, गुड़ और अन्य खाद्य सामग्री खिलाएं। भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाएं। इसी भोग को अन्नकूट कहा जाता है।
परंपरा के अनुसार गोवर्धन जी की सात परिक्रमाएं करें और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें। पूजा के अंत में गिरिराज स्वरूप को हाथ जोड़कर नमन करें तथा गोवर्धनधारी भगवान की स्तुति करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें—
यः गोवर्धनं धारयामास लीलया,
सप्ताहमेकं सह गोपबालकैः।
स त्वं ममापद्भयभीतिनाशकः,
गोवर्धनधारिन् परं नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ:- हे भगवान श्रीकृष्ण ! आपने गोपबालकों सहित सात दिनों तक अपनी लीला से गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। आप मेरे सभी भय और संकटों का नाश करें। हे गोवर्धनधारी! आपको मेरा बार-बार नमन है।