दीपावली आने से पहले ही घरों और बाजारों में रौनक दिखाई देने लगती है। इसी उत्सव की पहली महत्वपूर्ण कड़ी है धनतेरस। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में धन-दौलत के साथ अच्छा स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली भी उतनी ही जरूरी है। इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं, नई वस्तुएं खरीदी जाती हैं और देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। मान्यता है कि धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है, जबकि माता लक्ष्मी और कुबेर की उपासना से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
धनतेरस कब मनाया जाएगा ?
धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 6 नवंबर, शुक्रवार को पड़ेगा। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह लगभग 10 बजकर 30 मिनट से शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगी।
समुद्र मंथन से जुड़ी है धनतेरस की मान्यता
धनतेरस का सबसे प्रमुख संबंध भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। मंथन के दौरान अनेक दिव्य वस्तुएं प्रकट हुईं और अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर सामने आए। उनके हाथों में अमृत कलश होने के कारण उन्हें आरोग्य और चिकित्सा का देवता कहा जाता है।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक भी कहा जाता है। यही वजह है कि धनतेरस पर उनकी पूजा केवल धन प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि रोगों से मुक्ति और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए की जाती है। इस पर्व का एक संदेश यह भी है कि स्वास्थ्य से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं होती।
लक्ष्मी-कुबेर पूजन और यम दीपदान का महत्व
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का भी विधान है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और सौभाग्य की देवी है, जबकि कुबेर धन के रक्षक और कोषाध्यक्ष के रूप में पूजे जाते हैं। इस दिन उनकी आराधना करके लोग घर में आर्थिक स्थिरता और सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
इस पर्व पर यमराज के नाम से दीप जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, एक राजा के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग था। जब उसकी पत्नी को यह बात पता चली तो उसने पूरी रात दीप जलाए और अपने पति को जगाए रखा। उसने घर के द्वार पर सोना-चांदी और आभूषण भी रख दिए। कहा जाता है कि जब यमराज उसके पति के प्राण लेने आए तो दीपों की चमक और आभूषणों के प्रकाश के कारण उन्हें लौटना पड़ा। इसी मान्यता से धनतेरस की रात यम दीपदान किया जाने लगा।
कैसे करें धनतेरस की पूजा ?
धनतेरस के दिन सुबह घर की साफ-सफाई करें और शाम को पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर की प्रतिमा या तस्वीर रखें। दीपक जलाकर सभी को रोली, अक्षत, फूल, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान धन्वंतरि से परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें और माता लक्ष्मी-कुबेर से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगें। पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद बांटें।
इसके बाद घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाएं। इसे यम दीपदान कहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इससे परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
इस दिन क्या खरीदें और किन बातों का रखें ध्यान ?
धनतेरस पर सोना, चांदी, तांबा और पीतल जैसी धातुओं की वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। लोग इस दिन नए बर्तन, चांदी के सिक्के और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां भी खरीदते हैं। कई घरों में झाड़ू खरीदने की परंपरा है, जिसे स्वच्छता और घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, खरीदारी को लेकर कोई अनिवार्यता नहीं है। अपनी जरूरत और बजट के अनुसार वस्तु खरीदना ही उचित है।
इस दिन घर में साफ-सफाई रखें, दीप जलाएं और जरूरतमंदों की सहायता करें। वहीं, बेवजह खर्च करने, कर्ज लेकर दिखावे की खरीदारी करने और घर में विवाद करने से बचें। धनतेरस पर रुपये उधार देने या लेने से परहेज करना चाहिए।
धनतेरस का पर्व हमें धन के साथ स्वास्थ्य, संयम और संतोष का महत्व समझाता है। भगवान धन्वंतरि की आराधना से जुड़ा यह त्योहार संदेश देता है कि समृद्धि तभी सार्थक है, जब जीवन स्वस्थ, सुखी और संतुलित हो। इसी मंगल भावना के साथ दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव का शुभारंभ होता है। जिनमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजन, भैया दूज शामिल हैं।
दीपावली आने से पहले ही घरों और बाजारों में रौनक दिखाई देने लगती है। इसी उत्सव की पहली महत्वपूर्ण कड़ी है धनतेरस। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में धन-दौलत के साथ अच्छा स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली भी उतनी ही जरूरी है। इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं, नई वस्तुएं खरीदी जाती हैं और देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। मान्यता है कि धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है, जबकि माता लक्ष्मी और कुबेर की उपासना से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
धनतेरस कब मनाया जाएगा ?
धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 6 नवंबर, शुक्रवार को पड़ेगा। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह लगभग 10 बजकर 30 मिनट से शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगी।
समुद्र मंथन से जुड़ी है धनतेरस की मान्यता
धनतेरस का सबसे प्रमुख संबंध भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। मंथन के दौरान अनेक दिव्य वस्तुएं प्रकट हुईं और अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर सामने आए। उनके हाथों में अमृत कलश होने के कारण उन्हें आरोग्य और चिकित्सा का देवता कहा जाता है।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक भी कहा जाता है। यही वजह है कि धनतेरस पर उनकी पूजा केवल धन प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि रोगों से मुक्ति और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए की जाती है। इस पर्व का एक संदेश यह भी है कि स्वास्थ्य से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं होती।
लक्ष्मी-कुबेर पूजन और यम दीपदान का महत्व
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का भी विधान है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और सौभाग्य की देवी है, जबकि कुबेर धन के रक्षक और कोषाध्यक्ष के रूप में पूजे जाते हैं। इस दिन उनकी आराधना करके लोग घर में आर्थिक स्थिरता और सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
इस पर्व पर यमराज के नाम से दीप जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, एक राजा के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग था। जब उसकी पत्नी को यह बात पता चली तो उसने पूरी रात दीप जलाए और अपने पति को जगाए रखा। उसने घर के द्वार पर सोना-चांदी और आभूषण भी रख दिए। कहा जाता है कि जब यमराज उसके पति के प्राण लेने आए तो दीपों की चमक और आभूषणों के प्रकाश के कारण उन्हें लौटना पड़ा। इसी मान्यता से धनतेरस की रात यम दीपदान किया जाने लगा।
कैसे करें धनतेरस की पूजा ?
धनतेरस के दिन सुबह घर की साफ-सफाई करें और शाम को पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर की प्रतिमा या तस्वीर रखें। दीपक जलाकर सभी को रोली, अक्षत, फूल, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान धन्वंतरि से परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें और माता लक्ष्मी-कुबेर से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगें। पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद बांटें।
इसके बाद घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाएं। इसे यम दीपदान कहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इससे परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
इस दिन क्या खरीदें और किन बातों का रखें ध्यान ?
धनतेरस पर सोना, चांदी, तांबा और पीतल जैसी धातुओं की वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। लोग इस दिन नए बर्तन, चांदी के सिक्के और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां भी खरीदते हैं। कई घरों में झाड़ू खरीदने की परंपरा है, जिसे स्वच्छता और घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, खरीदारी को लेकर कोई अनिवार्यता नहीं है। अपनी जरूरत और बजट के अनुसार वस्तु खरीदना ही उचित है।
इस दिन घर में साफ-सफाई रखें, दीप जलाएं और जरूरतमंदों की सहायता करें। वहीं, बेवजह खर्च करने, कर्ज लेकर दिखावे की खरीदारी करने और घर में विवाद करने से बचें। धनतेरस पर रुपये उधार देने या लेने से परहेज करना चाहिए।
धनतेरस का पर्व हमें धन के साथ स्वास्थ्य, संयम और संतोष का महत्व समझाता है। भगवान धन्वंतरि की आराधना से जुड़ा यह त्योहार संदेश देता है कि समृद्धि तभी सार्थक है, जब जीवन स्वस्थ, सुखी और संतुलित हो। इसी मंगल भावना के साथ दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव का शुभारंभ होता है। जिनमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजन, भैया दूज शामिल हैं।