17 Views
हिंदू धर्म में व्रत, उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों का संबंध केवल आस्था से ही नहीं, बल्कि चंद्रमा की गति, तिथियों की गणना और मनुष्य की आध्यात्मिक साधना से भी जुड़ा हुआ है। भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा के विराजमान होने की पौराणिक कथा शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के महत्व को समझने का एक सुंदर माध्यम है। हालांकि, यह भी आवश्यक है कि धार्मिक मान्यताएँ, शास्त्रीय नियम और वैज्ञानिक तथ्य तीन अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, जिनका अपना-अपना महत्व है।
शिव और चंद्रमा की पौराणिक कथा का संदेश
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में एक समय दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया था लेकिन चंद्रमा इनमें से एक, रोहिणी के प्रति ही आसक्त थे और बाकियों की अवहेलना करते थे। उन सभी ने अपने पिता दक्ष से बात की और फिर उन्होंने भी चन्द्रमा को समझाया किंतु बात नहीं बनी। इतना ही नहीं, अपने रूप रंग के अभिमान में चंद्रमा ने दक्ष का ही अपमान कर दिया। दक्ष इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
चंद्रदेव ब्रह्माजी की शरण में गए और उनकी सलाह पर महादेव को प्रसन्न करने के लिए गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में समुद्र तट पर शिवलिंग बनाकर घोर तप आरंभ किया। अंतत: महादेव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। चंद्रमा ने पहले तो अपनी पत्नियों को उनके अधिकार से वंचित करने के लिए क्षमा मांगी और फिर पहले जैसे कांति के लिए क्षय रोग से मुक्ति का आग्रह किया। चूंकि महादेव को दक्ष के दिये श्राप का भी मान रखना था, इसलिए उन्होंने चंद्रमा के प्राणों की रक्षा करते हुए उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
साथ ही, कहा कि दक्ष के श्राप से पूरी मुक्ति संभव नहीं है, अपितु एक उपाय अवश्य है । उन्होंने एक माह में दो पक्षों की व्यवस्था की रचना की और कहा कि - अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में तुम मेरे वरदान से तेजस्वी और कांतिमय हो जाओगे और पूर्णिमा पर अपने पूरे आकार को प्राप्त करोगे लेकिन दक्ष के श्राप के प्रभाव से पूर्णिमा के पश्चात कृष्ण पक्ष लगते ही तुम्हारी आभा फिर से फीकी होने लगेगी।
मान्यता है कि कालान्तर में चंद्रमा की वो सताइस पत्नियां ही सताइस नक्षत्र बनीं। यही नहीं, चंद्रमा को मस्तक पर स्थान देने के कारण ही महादेव का एक नाम चन्द्रमौलेश्वर भी पड़ा। चंद्रदेव की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हुए थे, उस स्थान की देवताओं ने पूजा की और वहां चन्द्रमा द्वारा स्थापित शिवलिंग ही देश का प्रथम ज्योतिर्लिंग ‘सोमनाथ’ के नाम से विख्यात हुआ।
शुक्ल पक्ष में व्रत आरंभ करने का धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में शुक्ल पक्ष को चंद्रमा की वृद्धि का काल माना जाता है। अमावस्या के बाद चंद्रमा धीरे-धीरे अधिक प्रकाशित दिखाई देता है और पूर्णिमा को वह पूर्ण रूप से प्रकाशित हो उठता है । इस वृद्धि को शुभता, नवीन आरंभ, सकारात्मक संकल्प और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना गया है। इसलिए अनेक धार्मिक परंपराओं में शुक्ल पक्ष के दौरान व्रत, जप, पूजा-पाठ और नए धार्मिक संकल्प आरंभ करना शुभ माना जाता है।
इसी प्रकार, व्रत का उद्यापन भी धार्मिक संकल्प की पूर्णता का प्रतीक है। यदि किसी व्रत के शास्त्रीय विधान में शुक्ल पक्ष की कोई विशेष तिथि निर्धारित है, तो उसी के अनुसार उद्यापन करना चाहिए। हालांकि, अधिकतर व्रतों का आरंभ और उद्यापन शुक्ल पक्ष में ही होता। कई बार व्रत के प्रकार, संबंधित देवता, परंपरा और संकल्प के अनुसार ये नियम थोड़ा अलग भी हो जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंद्रमा के दोनों पक्ष
वैज्ञानिक रूप से शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य की बदलती प्रकृति के कारण दिखाई देने वाली चंद्र कलाओं पर आधारित हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा का प्रकाशित भाग पृथ्वी से देखने पर क्रमशः बढ़ता हुआ दिखाई देता है, जबकि कृष्ण पक्ष में वह घटता हुआ दिखाई देता है। यह एक नियमित खगोलीय चक्र है।
क्या कृष्ण पक्ष में व्रत रखना निषेध है?

