भारत में पर्व-त्योहारों का महत्व सांस्कृतिक एकता, सामाजिक सद्भाव और आर्थिक विकास में निहित है। यह अवसर उल्लास व सद्भाव का प्रसार करते हैं, परंपराओं को जीवित रखते हैं, लोगों को एकसूत्र में बांधते रहते हैं । पर्व-त्योहार धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के साथ ही अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देते हैं । इन्हीं पर्वों में एक है सकट चौथ, जो माघ माह में मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, सुरक्षा और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। उत्तर भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। सकट चौथ को संकट चौथ, तिल चौथ, तिलकुटा चौथ, माघी चौथ और वक्रतुंडी चतुर्थी भी कहा जाता है।
सकट चौथ 2026 की तिथि
इस वर्ष के पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 06 जनवरी 2026 को सुबह 08:01 बजे शुरू होकर 07 जनवरी 2026 को सुबह 06:52 बजे समाप्त होगी। इस कारण सकट चौथ का पर्व मंगलवार, 06 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।
सकट चौथ की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक गाँव में एक कुम्हार रहता था, जिसकी भट्टी में पात्र पक नहीं पा रहे थे। राजा के कहने पर राजपुरोहित ने भट्टी में बालक की बलि देने का सुझाव दिया। कई परिवारों के बच्चों की बलि दी गई। अंत में एक वृद्ध स्त्री की बारी आई, जिसका केवल एक ही पुत्र था। वह सकट माता की परम भक्त थी। उसने अपने पुत्र को सकट माता की सुपारी और दूर्वा दी और माता से रक्षा की प्रार्थना की। माता की कृपा से वह बालक सुरक्षित रहा और पहले बलि दिए गए सभी बच्चे भी जीवित हो उठे। इस चमत्कार से सकट माता की महिमा पूरे नगर में फैल गई। तभी से सकट चौथ माता सकट के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाने लगा।
क्यों कहते हैं सकट चौथ को तिल-कुटा चौथ ?
सकट चौथ को तिल-कुटा चौथ भी कहा जाता है, क्योंकि इस पावन तिथि पर तिल का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस दिन महिलाएँ श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा के समय तिल से विशेष प्रयोग और प्रतीकात्मक विधि करती हैं, जो जीवन में आने वाली बाधाओं, कष्टों और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक मानी जाती है।
पूजन के दौरान सिक्के से तिल के ढेर को बीच से काटने की या फिर तिल का बकरा बनाकर उसे काटने की परंपरा है। यह क्रिया संतान के मंगलमय जीवन, दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ की जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
सकट चौथ का महत्व और पूजा विधि
सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से संतान की रक्षा, सुख और लंबी उम्र के लिए किया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से जीवन के कष्ट और संकट दूर होते हैं तथा कार्यों में सफलता मिलती है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
सकट चौथ के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और घर के मंदिर में दीप जलाएं। श्रद्धा अनुसार व्रत रखें। भगवान गणेश का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प अर्पित करें। पूरे मन से पूजा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। शास्त्रों में चंद्रमा को मन का कारक और औषधियों का स्वामी माना गया है। महिलाएं चंद्रदेव की पूजा करके अपनी संतान के स्वस्थ, निरोगी और दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए एक पात्र में पानी लेकर उसमें थोड़ा सा दूध मिलाएं और संध्याकाल में चंद्रमा को अर्पित करें। ऐसा करने से मन के नकारात्मक विचार दूर होते हैं, स्वास्थ्य में सुधार होता है और चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। माना जाता है कि चंद्रमा के दर्शन से व्रत पूर्ण फलदायी होता है।
सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि माँ के प्रेम, त्याग और विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व माताओं को अपनी संतान के प्रति आस्था और सुरक्षा की भावना से जोड़ता है। सकट माता और भगवान गणेश की कृपा से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
भारत में पर्व-त्योहारों का महत्व सांस्कृतिक एकता, सामाजिक सद्भाव और आर्थिक विकास में निहित है। यह अवसर उल्लास व सद्भाव का प्रसार करते हैं, परंपराओं को जीवित रखते हैं, लोगों को एकसूत्र में बांधते रहते हैं । पर्व-त्योहार धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के साथ ही अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देते हैं । इन्हीं पर्वों में एक है सकट चौथ, जो माघ माह में मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, सुरक्षा और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। उत्तर भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। सकट चौथ को संकट चौथ, तिल चौथ, तिलकुटा चौथ, माघी चौथ और वक्रतुंडी चतुर्थी भी कहा जाता है।
सकट चौथ 2026 की तिथि
इस वर्ष के पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 06 जनवरी 2026 को सुबह 08:01 बजे शुरू होकर 07 जनवरी 2026 को सुबह 06:52 बजे समाप्त होगी। इस कारण सकट चौथ का पर्व मंगलवार, 06 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।
सकट चौथ की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक गाँव में एक कुम्हार रहता था, जिसकी भट्टी में पात्र पक नहीं पा रहे थे। राजा के कहने पर राजपुरोहित ने भट्टी में बालक की बलि देने का सुझाव दिया। कई परिवारों के बच्चों की बलि दी गई। अंत में एक वृद्ध स्त्री की बारी आई, जिसका केवल एक ही पुत्र था। वह सकट माता की परम भक्त थी। उसने अपने पुत्र को सकट माता की सुपारी और दूर्वा दी और माता से रक्षा की प्रार्थना की। माता की कृपा से वह बालक सुरक्षित रहा और पहले बलि दिए गए सभी बच्चे भी जीवित हो उठे। इस चमत्कार से सकट माता की महिमा पूरे नगर में फैल गई। तभी से सकट चौथ माता सकट के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाने लगा।
क्यों कहते हैं सकट चौथ को तिल-कुटा चौथ ?
सकट चौथ को तिल-कुटा चौथ भी कहा जाता है, क्योंकि इस पावन तिथि पर तिल का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस दिन महिलाएँ श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा के समय तिल से विशेष प्रयोग और प्रतीकात्मक विधि करती हैं, जो जीवन में आने वाली बाधाओं, कष्टों और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक मानी जाती है।
पूजन के दौरान सिक्के से तिल के ढेर को बीच से काटने की या फिर तिल का बकरा बनाकर उसे काटने की परंपरा है। यह क्रिया संतान के मंगलमय जीवन, दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ की जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
सकट चौथ का महत्व और पूजा विधि
सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से संतान की रक्षा, सुख और लंबी उम्र के लिए किया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से जीवन के कष्ट और संकट दूर होते हैं तथा कार्यों में सफलता मिलती है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
सकट चौथ के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और घर के मंदिर में दीप जलाएं। श्रद्धा अनुसार व्रत रखें। भगवान गणेश का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प अर्पित करें। पूरे मन से पूजा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। शास्त्रों में चंद्रमा को मन का कारक और औषधियों का स्वामी माना गया है। महिलाएं चंद्रदेव की पूजा करके अपनी संतान के स्वस्थ, निरोगी और दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए एक पात्र में पानी लेकर उसमें थोड़ा सा दूध मिलाएं और संध्याकाल में चंद्रमा को अर्पित करें। ऐसा करने से मन के नकारात्मक विचार दूर होते हैं, स्वास्थ्य में सुधार होता है और चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। माना जाता है कि चंद्रमा के दर्शन से व्रत पूर्ण फलदायी होता है।
सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि माँ के प्रेम, त्याग और विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व माताओं को अपनी संतान के प्रति आस्था और सुरक्षा की भावना से जोड़ता है। सकट माता और भगवान गणेश की कृपा से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।