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मां सरस्वती का मंदिर, होता है ‘वाणी विकार’ का उपचार

 

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम्।

देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना:॥

(वाणी की अधिष्ठात्री उन देवी सरस्वती को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है।)

 

यूं तो देश में सरस्वती माता के मंदिर कम हैं लेकिन राजस्थान में माता का एक ऐसा मंदिर है जहां पूजा-अर्चना से वाणी विकार दूर हो जाने की आस्था विद्यमान है । वीणावादिनी माता सरस्वती वाणी की देवी हैं । पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के कथनानुसार ब्रह्माजी ने सरस्वती देवी का आह्वान किया और सरस्वती जी के प्रकट होने पर ब्रह्माजी ने उन्हें अपनी वीणा से सृष्टि में स्वर भरने का अनुरोध किया। उन्होंने जैसे ही वीणा के तारों का स्पर्श किया, उससे सहसा 'सा' शब्द फूट पड़ा। यही शब्द संगीत के सप्त सुरों में प्रथम सुर बना। इस ध्वनि से ब्रह्माजी की बनाई मूक सृष्टि में ध्वनि का संचार होने लगा। हवाओं, सागर, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को वाणी मिल गई। नदियों से कल-कल की ध्वनि फूटने लगी। इससे ब्रह्माजी अतिप्रसन्न हुए। उन्होंने सरस्वती को 'वाणी की देवी' के नाम से संबोधित करते हुए 'वागेश्वरी' नाम भी दिया । सरस्वती माता के हाथों में वीणा होने के कारण इन्हें 'वीणापाणि' भी कहा जाता है।

 

इस तरह मां सरस्वती ध्वनि अर्थात वाणी की देवी हैं । अब अगर ऐसे में किसी में वाणी से ही जुड़ा विकार हो तो मां सरस्वती की शरण में जाना उत्कृष्ट उपाय है । राजस्थान में माता सरस्वती का एक ऐसा ही मंदिर है जहां हकलाने, तुतलाने या किसी अन्य तरह का वाणी दोष रखने वाले बच्चों की अक्षमता का चमत्कारिक रूप से निदान होता है । सिरोही जिले के पिंडवाड़ा क्षेत्र में अजारी गांव के करीब स्थित मार्कंडेश्वरधाम में बना मां सरस्वती मंदिर अपनी प्राचीनता, धार्मिक मान्यताओं और विश्वास के कारण देशभर में प्रसिद्ध है।

 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र स्थल पर अनेक महान ऋषियों और विद्वानों ने तपस्या की थी। कहा जाता है कि बालऋषि मार्कंडेय ने यहीं यमराज से रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया था। इसके अलावा, महाकवि कालिदास द्वारा यहीं ज्ञान की प्राप्ति और जैन आचार्य हेमचंद्राचार्य द्वारा मां सरस्वती की आराधना किए जाने की कथाएं भी प्रचलित हैं। वाणी या भाषा ज्ञान, कला, कविता आदि का स्रोत है, इसलिए भारत में सरस्वती को काव्य प्रेरणा, वाक्पटुता, विद्या और कला से जुड़ी देवी के रूप में अधिक महत्व दिया जाता है।

 

मंदिर परिसर भगवान महादेव और देवी सरस्वती को समर्पित है। यहां से जुड़ी विशेष मान्यता कि है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना से वाणी संबंधी विकार दूर होते हैं और बुद्धि का विकास होता है। इसी आस्था के चलते तुतलाने या बौद्धिक विकास से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित भक्त यहां मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर चांदी की जीभ चढ़ाने की परंपरा है। चूंकि माता शिक्षा, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं इसलिए यहां कॉपी, किताब, पेंसिल और पेन अर्पित करने की भी परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

 

23 जनवरी को वसंत पंचमी है और इस अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। इस दिन मां सरस्वती का भव्य श्रृंगार, हवन, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। साथ ही, मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस अवसर पर साधारण श्रद्धालु ही नहीं बड़ी संख्या में छात्र, कलाकार, कवि, संगीतकार और साहित्यकार विशेष रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

मार्कंडेश्वरधाम स्थित मां सरस्वती का यह मंदिर न केवल राजस्थान बल्कि देशभर में विद्या, वाणी और बुद्धि की कामना करने वाले भक्तों के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। आज भी यह मंदिर ज्ञान की देवी मां सरस्वती की उपासना का प्रमुख स्थल माना जाता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव

 

 

 

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मां सरस्वती का मंदिर, होता है ‘वाणी विकार’ का उपचार

 

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम्।

देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना:॥

(वाणी की अधिष्ठात्री उन देवी सरस्वती को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है।)

 

यूं तो देश में सरस्वती माता के मंदिर कम हैं लेकिन राजस्थान में माता का एक ऐसा मंदिर है जहां पूजा-अर्चना से वाणी विकार दूर हो जाने की आस्था विद्यमान है । वीणावादिनी माता सरस्वती वाणी की देवी हैं । पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के कथनानुसार ब्रह्माजी ने सरस्वती देवी का आह्वान किया और सरस्वती जी के प्रकट होने पर ब्रह्माजी ने उन्हें अपनी वीणा से सृष्टि में स्वर भरने का अनुरोध किया। उन्होंने जैसे ही वीणा के तारों का स्पर्श किया, उससे सहसा 'सा' शब्द फूट पड़ा। यही शब्द संगीत के सप्त सुरों में प्रथम सुर बना। इस ध्वनि से ब्रह्माजी की बनाई मूक सृष्टि में ध्वनि का संचार होने लगा। हवाओं, सागर, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को वाणी मिल गई। नदियों से कल-कल की ध्वनि फूटने लगी। इससे ब्रह्माजी अतिप्रसन्न हुए। उन्होंने सरस्वती को 'वाणी की देवी' के नाम से संबोधित करते हुए 'वागेश्वरी' नाम भी दिया । सरस्वती माता के हाथों में वीणा होने के कारण इन्हें 'वीणापाणि' भी कहा जाता है।

 

इस तरह मां सरस्वती ध्वनि अर्थात वाणी की देवी हैं । अब अगर ऐसे में किसी में वाणी से ही जुड़ा विकार हो तो मां सरस्वती की शरण में जाना उत्कृष्ट उपाय है । राजस्थान में माता सरस्वती का एक ऐसा ही मंदिर है जहां हकलाने, तुतलाने या किसी अन्य तरह का वाणी दोष रखने वाले बच्चों की अक्षमता का चमत्कारिक रूप से निदान होता है । सिरोही जिले के पिंडवाड़ा क्षेत्र में अजारी गांव के करीब स्थित मार्कंडेश्वरधाम में बना मां सरस्वती मंदिर अपनी प्राचीनता, धार्मिक मान्यताओं और विश्वास के कारण देशभर में प्रसिद्ध है।

 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र स्थल पर अनेक महान ऋषियों और विद्वानों ने तपस्या की थी। कहा जाता है कि बालऋषि मार्कंडेय ने यहीं यमराज से रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया था। इसके अलावा, महाकवि कालिदास द्वारा यहीं ज्ञान की प्राप्ति और जैन आचार्य हेमचंद्राचार्य द्वारा मां सरस्वती की आराधना किए जाने की कथाएं भी प्रचलित हैं। वाणी या भाषा ज्ञान, कला, कविता आदि का स्रोत है, इसलिए भारत में सरस्वती को काव्य प्रेरणा, वाक्पटुता, विद्या और कला से जुड़ी देवी के रूप में अधिक महत्व दिया जाता है।

 

मंदिर परिसर भगवान महादेव और देवी सरस्वती को समर्पित है। यहां से जुड़ी विशेष मान्यता कि है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना से वाणी संबंधी विकार दूर होते हैं और बुद्धि का विकास होता है। इसी आस्था के चलते तुतलाने या बौद्धिक विकास से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित भक्त यहां मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर चांदी की जीभ चढ़ाने की परंपरा है। चूंकि माता शिक्षा, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं इसलिए यहां कॉपी, किताब, पेंसिल और पेन अर्पित करने की भी परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

 

23 जनवरी को वसंत पंचमी है और इस अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। इस दिन मां सरस्वती का भव्य श्रृंगार, हवन, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। साथ ही, मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस अवसर पर साधारण श्रद्धालु ही नहीं बड़ी संख्या में छात्र, कलाकार, कवि, संगीतकार और साहित्यकार विशेष रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

मार्कंडेश्वरधाम स्थित मां सरस्वती का यह मंदिर न केवल राजस्थान बल्कि देशभर में विद्या, वाणी और बुद्धि की कामना करने वाले भक्तों के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। आज भी यह मंदिर ज्ञान की देवी मां सरस्वती की उपासना का प्रमुख स्थल माना जाता है।

 

:- वर्तिका श्रीवास्तव